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स्वाद-आबाद:मैक्सिको से शुरू हुआ चॉकलेट का सफ़र आज सारी दुनिया में अनवरत जारी है, एज्टैक सम्राट सोने के पात्र में चॉकलेट पेय पीते थे

पुष्पेश पंत9 दिन पहले
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  • चॉकलेट का नाम सुनते ही हमें याद आती है...
  • कत्थई रंग की मुंह में रखते ही दूधिया मिठास घोलने वाली ‘विलायती’ मिठाई जिसका चलन शहरी मध्य वर्ग में ही ज़्यादा रहा है...जबकि लेमनचूस, टॉफ़ी जैसी ‘विलायती’ मिठाइयों की पहुंच ज़्यादा बड़े जन-साधारण तबके तक थी... लेकिन समय के साथ चॉकलेटों की लोकप्रियता अखिल भारतीय होती चली गई है।
  • जुलाई के पहले हफ़्ते में विश्व चॉकलेट दिवस आता है, उसी पर केंद्रित है इस बार का स्वाद-आबाद...।

रुपहले काग़ज़ में लिपटी चॉकलेट बरसों तक एक ही कंपनी के उत्पाद का पर्याय बन गई और यह कंपनी भी अपने एकाधिपत्य के कारण एक ही तरह की चॉकलेट बनाकर संतुष्ट रही। दिलचस्प बात यह है कि दुनिया के अन्य देशों में चॉकलेट का वह अवतार देखने को नहीं मिलता। ऐसा लगता है कि इसे मावे से निर्मित बर्फ़ी की तरफ़ ले जाने की प्रेरणा ने ही ईजाद कराया। बहुत बाद में फ्रूट एंड नट्स और कैरमल से भरी चॉकलेट बाज़ार में उतारी गईं, पर वह कहानी दूसरी है- उस बाबत थोड़ा ठहरकर।चॉकलेट का निर्माण होता है कोको नामक पौधे के फल से।

इसका जन्म स्थान मध्य मैक्सिको में है और वहीं हिस्पानी अन्वेषकों-उपनिवेशवादियों का साक्षात्कार इस से हुआ। उस समाज के वृत्तांतों से पता चलता है कि एज़टैक सम्राट मौंतेजूमा चॉकलेट से बना नमकीन पेय सोने के पात्र से पिया करते थे। इसके स्वाद तथा असर ने यूरोपीयन सौदागरों को प्रभावित किया और बहुत सारी दूसरी चीज़ों- जैसे आलू, मिर्ची, तंबाकू, अमरूद, मकई आदि के साथ वे कोको की संतान चॉकलेट को भी नई दुनिया से पुरानी दुनिया में ले आए। कालांतर में जहां-जहां उनके उपनिवेश थे, चॉकलेट और कोको ने पैर पसारे।

आरंभ में लगभग सभी जगह इसका प्रयोग कोको के पेय के रूप में होता था। कोको की कडुआहट को कम करने के लिए दूध तथा शकर मिलाए गए। अगला चरण था इसे जमा के टिकाऊ मिठाई की शक्ल देना।

कोको फ्रूट
कोको फ्रूट

यहां कुछ अन्य बातें साफ़ करना जरूरी है। कोको से सिर्फ़ चॉकलेट ही नहीं बल्कि नशीली कोकीन भी बनाई जाती है। शुरू में इसे अफ़ीम की तरह पीड़ाहर दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। यह तो बहुत बाद में पता चला कि यह मनुष्य को अपनी ज़हरीली लत की ज़ंजीरों में कितनी जल्दी जकड़ लेता है। कोक के आविष्कर्ता ने भी इस शरबत का विज्ञापन शुरू में नज़ला-ज़ुकाम-थकान की घरेलू औषधि के रूप में ही किया था। कोक अपने नुस्ख़े का साझा किसी से नहीं करता पर नाम और तासीर से इस धारणा की पुष्टि होती है कि इसका नाता चॉकलेट के सहोदर कोको से है।

सफ़ेद चॉकलेट
सफ़ेद चॉकलेट

हिंदुस्तानियों की मान्यता है कि स्विट्ज़रलैंड की चॉकलेट सर्वश्रेष्ठ होती हैं पर जानकार शौक़ीनों का कहना है बेल्जियम की चॉकलेटें इन पर भारी बैठती हैं। यूरोप में सफ़ेद चॉकलेट भी चाव से खाई जाती है जो देखने में बिल्कुल मावे की बर्फ़ी नज़र आती है पर उसकी दूधिया मिठास से वंचित रहती है। इसीलिए भारतीय बाज़ार में यह अपनी जगह नहीं बना पाई। दूसरे छोर पर काली-कड़वी चॉकलेटें हैं। वो भी भारतीयों को रास नहीं आतीं। हालांकि पश्चिम का अंधानुसरण करने वाला महानगरीय श्रेष्ठिवर्ग इसे अपनी पहली पसंद घोषित करने लगा है। आज 50% से लेकर 90% तक कड़वी चॉकलेट सुलभ हैं। इनमें चीनी और दूध नाम मात्र को ही होते हैं।

ब्लैक फ़ॉरेस्ट
ब्लैक फ़ॉरेस्ट

चॉकलेट से बनाए जाने वाले पश्चिमी मिष्ठान्नों में चॉकलेट केक प्रमुख है, जिसके दो मुख्य प्रकार भारत में काफ़ी लोकप्रिय हैं- ट्रुफ़ल और ब्लैक फ़ॉरेस्ट। मड पाई केक भी खचाखच चॉकलेट से भरा रहता है। इन्हीं ज़ायक़ों में छोटे आकार की पेस्ट्री भी बनाई जाती हैं। चॉकलेट मूस मुंह में रखते ही हवा-हवाई हो जाने वाला फिरनी से भी हल्का होता है। इसे अंडों की ज़र्दी को चॉकलेट के साथ फ़ैट कर बनाया जाता है। चॉकलेट से ढकी क्रीम से भरपूर एक्लेयर का आकर्षण अलग जादू जगाता है। ईस्टर के पर्व पर ईस्टर एग बनाने का रिवाज़ है, जिसमें चॉकलेट अपना कमाल दिखलाती है। बड़े दिन के एक केक का रूप भी चॉकलेटी होता है।

ईस्टर एग
ईस्टर एग
चॉकलेट आइसक्रीम
चॉकलेट आइसक्रीम

चॉकलेट ब्राउनी केक-पेस्ट्री से अधिक ठोस और भुरभुरी होती है- कम मीठी भी। ‘लावा’ में गोलाकार या अंडाकार जमी भीतर से गरमागरम पिघली चॉकलेट अपना नाम सार्थक करती नज़र आती है। चॉकलेट आइसक्रीम तो किसी परिचय की मोहताज नहीं। हां, इसमें दो राय नहीं कि सादी वनीला आइसक्रीम का आनंद दोगुना कर देता है चॉकलेट सॉस! काह्लुआ चॉकलेट के ज़ायक़े वाली वह मदिरा है जिसका सेवन भोजनोपरांत किया जाता है। इसे मिला के तरह-तरह के श्यामवर्णी कॉकटेल बनाए जाते हैं।

ब्राउनी मूस केक
ब्राउनी मूस केक

‘बौनबौन’ मोतीचूर के आकार के लड्डुओं की शक्ल में होते हैं और इनकी बाहरी परत चॉकलेट की रहती है, भीतर फ़ाइव स्टार की तरह कैरेमल भरा रहता है। आयातित चॉकलेट के दामों में लगातार वृद्धि के कारण छोटे जवाहरात की शक्ल वाले जेम्स, तथा चॉकलेट की पतली परत वाले वेफ़र वाला विकल्प चॉकलेट निर्माता कंपनियों ने ग्राहक के सामने रखा। छोटे क़स्बों में कॉफ़ी और चॉकलेट का मिश्रण नएपन का अहसास कराता है। चॉकलेट ड्रिंक्स को बच्चे ही नहीं बुजुर्ग भी शौक़ से पीते हैं। विज्ञापन व्यापार के विशेषज्ञ मानते हैं कि बच्चे और किशोर चॉकलेट के नाम से ही मुग्ध हो जाते हैं, इसीलिए पौष्टिक पेयों में यह स्वाद डाला जाता है।

चॉकलेट बर्फी
चॉकलेट बर्फी
बौन बौन
बौन बौन

प्रयोग प्रेमी भारतीय शेफ़ चॉकलेट के बहाने अपना जौहर दिखलाने में किसी से पीछे नहीं रहते। हलवाई भी चॉकलेटी बर्फ़ी जाने कब से बनाते आए हैं। फिर प्रकट हुआ चॉकलेटी गुलाब जामुन। तब से आज तक एक लंबा सफ़र तय कर लिया गया है। भारत, न्यूयॉर्क तथा लंदन में इंडियन एक्सेंट नामक रेस्तरां के मनीष मल्होत्रा ने ग़रीबपरवर देहाती मिज़ाज के रामदाना लड्डू पर चॉकलेट की हल्की चादर चढ़ा विदेशी मेहमानों को लुभाया है तो दक्षिण भारत में एक नौजवान ने सोयाबीन के दूध से स्थानीय ऑर्गेनिक चॉकलेट की जोड़ी साधकर वीगन चॉकलेट बनाए हैं।

रामदाना लड्डू
रामदाना लड्डू

हमारे मित्र संजीव भार्गव उस परिवार से हैं, जो गणेश मार्का सरसों के तेल के उत्पादक के रूप में कभी देश भर में मशहूर था। उन्होंने अतिविशिष्ट ग्राहकों के लिए ख़ालिस भारतीय स्वाद वाली चॉकलेटेें सीमित संस्करणों में बनाई हैं, जिनमें पान, केसर, गुलाब, खस के फ़्लेवर प्रमुख हैं। कुछ में आप को सोने का वरक़ भी नज़र आता है। यह पेशकश उस पश्चिमी दावे को झुठलाती है कि चॉकलेट की जुगलबंदी कुछ ही स्वादों के साथ साधी जा सकती है जैसे दालचीनी, किशमिश, संतरे का छिलका, बादाम वग़ैरह।

लखनऊ की ईजाद की नक़ल में आज कई जगह चॉकलेटी ज़ायक़े का पान भी पेश किया जाने लगा है। बीकानेर में एक उद्यमी ने ऊंट के दूध की चॉकलेट बनाने का प्रयोग किया है। यदि पहले बताया न जाए तो यह फ़र्क़ करना कठिन है कि इसे भैंस के दूध से नहीं बनाया गया है। ऐसा ही अजीबोग़रीब प्रयोग मिर्ची के ज़ायक़े वाली चॉकलेट बनाने वालों ने किया है। वैसे ठंडे दिमाग़ से सोचें तो इसमें कुछ भी विचित्र नहीं- चॉकलेट तथा मिर्ची दोनों ही दक्षिणी अमेरिकी भूभाग की संतान हैं और जैसा पहले कहा जा चुका है महाराज मौंतेजूमा नमकीन मसालेदार चॉकलेट पीते थे।

भारत में चॉकलेटी सफ़र
भारत में चॉकलेट की तरफ़ आम जनता का ध्यान खींचने में अमिताभ बच्चन की भूमिका महत्वपूर्ण है-
कुछ मीठा हो जाए और पप्पू पास हो गया वाले इश्तहारी अभियानों के क्लाइमेक्स में चॉकलेट की ही ताजपोशी होती थी। आलम कुछ ‘आपने याद दिलाया तो हमें याद आया’ सरीखा था। उत्तराखंड में खोया ख़ूब भूनकर ‘चॉकलेट’ नाम की मिठाई बनाई जाती है- पक्के कत्थई रंग की, जो याद दिलाती है भिंड-मुरैना के जले खोये के पेड़ों की, पर इसमें असली चॉकलेट का लेशमात्र भी पुट नहीं होता। ऐसा जान पड़ता है कि चॉकलेट को वर्जित समझने वाले पहाड़ियों ने यह विकल्प तलाशा था!

भारत में हाल ही में देशी स्वाद वाली फ़रमाइशी चॉकलेटें बनाने वालों ने मंच पर पदार्पण किया है। कुटीर उद्योग के रूप में आज भारत के कई हिस्सों में शौक़िया चॉकलेट बनाने वाले कारीगरों की तादाद तेज़ी से बढ़ रही है। इनका प्रमुख आकर्षण यह है कि वे चॉकलेट की एकरूपता तोड़ने वाले ज़ायके लेकर आए हैं। हमारे परिचितों में ही कुछ ऐसे शौक़ीन हें जिन्होंने कुटीर उद्योग के रूप में यह कारोबार शुरू करने के लिए विदेश में जाकर चॉकलेट निर्माण का प्रशिक्षण प्राप्त किया है। भुवनेश्वर में अजवाइनी चॉकलेटें बनाई जाती हैं। गुलाब, नारियल आदि से तो बहुत लोग खिलवाड़ कर चुके हैं।

लेखक परिचय

पुष्पेश पंत
जेएनयू से अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्राध्यापक के रूप में सेवानिवृत्त हुए पुष्पेश पंत की गहरी पकड़ यों तो इतिहास, संस्कृति और विदेश नीतियों पर है, भोजन-रसिक और भारतीय पाक-कला के विशेषज्ञ के रूप में उनका एक अलहदा अंदाज़ नज़र आता है। उनकी पुस्तक ‘इंडिया : द कुकबुक’ को न्यूयॉर्क टाइम्स ने साल की बेहतरीन किताबों में शुमार किया था।

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