संस्मरण:सबसे सुंदर होता है रिकवरी रूम, एक घातक बीमारी से निकलकर स्वस्थ होने का संस्मरण

किरण सिंह20 दिन पहले
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  • दिल की गंभीर समस्या और ओपन हार्ट सर्जरी की तैयारी। मन:स्थिति कैसी रही होगी उस समय! दिक़्क़त का पता चलने से पूर्ण स्वस्थ होने तक का यह अनुभव कई भाव बताने के साथ कुछ पाठ भी पढ़ाता है।

बात फरवरी, 2006 की है, मेरी तबियत अचानक ख़राब हो गई थी। डॉक्टर को दिखाने के बाद रिपोर्ट आई कि हृदय के वॉल्व में छेद है। घर में देखने वालों की भीड़ लग गई थी। सभी अपने-अपने अनुभवों के आधार पर सुझाव दे रहे थे। इस बीच हमारे पारिवारिक चिकित्सक ने मेरे पति से कहा- ‘आप किसी की मत सुनिए, भारत में तो हर कोई डॉक्टर और वकील बन जाता है। और हां, मैंने तो देख लिया, मेरी सलाह है कि अब आप इन्हें सीधे दिल्ली ले जाइए, क्योंकि डॉक्टर, वकील और ताले को लेकर कभी भी समझौता नहीं करना चाहिए।’

उनका सुझाव मानकर पति मुझे दिल्ली ले गए और डाॅक्टर के कहे अनुसार निर्धारित तिथि पर वहां एक अच्छे हॉस्पिटल में भर्ती करा दिया।

तब वेदना पिघलकर मेरी आंखों से छलकने को आतुर थी। पलकें अश्रुओं को सम्हालने में ख़ुद को असहाय महसूस कर रही थीं। जी चाह रहा था कि मुझे कुछ देर के लिए अकेला छोड़ दिया जाए ताकि मैं जी-भरकर रो लूं। फिर भी अभिनय कला में निपुण मेरे अधर मुस्कराने में सफल हो रहे थे। फिर कैसे कोई समझ सकता था कि मेरे होंठों को मुस्कराने के लिए कितना परिश्रम करना पड़ रहा था। किसी को क्या पता था कि सर्जरी से पहले सबसे हंस-हंस कर मिलते और बच्चों के साथ घूमते-फिरते, रेस्तरां में मनपसंद खाना खाते समय मेरे हृदय के पन्नों पर मस्तिष्क की लेखनी बार-बार एक अधूरा पत्र लिख-लिख कर फाड़ रही थी कि मेरे जाने के बाद...!

11 फरवरी को रात क़रीब 8 बजे बहन का फोन आया। पति ने बात करने के लिए कहा तब आख़िरकार छलक ही पड़े थे नयनों से नीर और उन्होंने रुला ही दिया था मेरे पूरे परिवार को। उस रात मैं बिल्कुल नहीं सो पाई थी। सुबह ही ओपन हार्ट सर्जरी होनी थी। सुबह-सुबह नर्स और एक पुरुष कर्मचारी स्ट्रेचर लेकर आए और उस पर मुझे लिटाकर कुछ दूर ले गए। लेकिन कुछ ही दूर चलने के बाद मुझे वैसे ही वापस लेकर आए कि सर्जरी आज नहीं होगी। उसके बाद तो कुछ लोगों ने अफ़वाह भी फैला दी कि प्रख्यात हृदयरोग विशेषज्ञ डॉ. नरेश त्रेहन भारत-पाकिस्तान का क्रिकेट मैच देखने के लिए पाकिस्तान जा रहे हैं।

मुझे तो सर्जरी से यूं ही डर लग रहा था, इसलिए एक बहाना मिल गया था हॉस्पिटल से भागने का। ग़ुस्सा तो आ ही रहा था, सो मैं चिल्ला पड़ी। उसके बाद मुझे समझाने के लिए डॉक्टरों की पूरी टीम आ पहुंची। इस बीच डॉक्टर त्रेहन भी आए और समझाने लगे कि मुझे इमरजेंसी में बाहर जाना पड़ रहा है और चूंकि आपका मामला काफ़ी पेचीदा है इसलिए मैं चाहता हूं कि मेरी मौजूदगी में ही आपकी सर्जरी हो। तब जाकर मुझे सर्जरी टलने का वास्तविक कारण पता चला और मेरा ग़ुस्सा शांत हुआ।

बहरहाल, 13 फरवरी को सुबह 9 बजे नर्सों ने जब स्ट्रेचर पर लिटाया और ऑपरेशन थिएटर की तरफ़ ले जाने लगीं तो मुझे लग रहा था कि जल्लाद रूपी परिचारिकाएं मुझे फ़ांसी के तख़्ते तक ले जा रही हैं। हृदय की धड़कनें और भी तेज़ हो चली थीं, मन ही मन मैं सोच रही थी शायद यह मेरे जीवन का अंतिम दिन है। स्ट्रेचर पर लेटे-लेटे अपने आसपास की दुनिया को जी-भरकर देख लेना चाहती थी, परंतु परिजनों से नज़रें नहीं मिला पा रही थी कि कहीं मेरी आंखें छलककर मेरी पोल न खोल दें। उस समय मैं ख़ुद को बिल्कुल निर्भीक दिखाने का अभिनय कर रही थी!

परिचारिकाओं ने ऑपरेशन थिएटर के दरवाज़े के सामने स्ट्रेचर रोक दिया, तभी किसी ‘यमदूत’ की तरह डॉक्टर आ गए। यूं तो डॉक्टर को भगवान कहा जाता है, लेकिन उस समय डर और आशंका के चलते वे कुछ और ही नज़र आ रहे थे। डॉक्टर भी ऑपरेशन थिएटर में स्ट्रेचर के साथ-साथ चल रहे थे। चलते-चलते वे मुझे बातों में उलझाने लगेे, जैसे किसी चंचल बच्चे को रोचक कहानी सुनाकर बातों-बातों में उलझा लिया जाता है!

डॉक्टर ने कहा- ‘किरण जी, लगता है आप बहुत नाराज़ हैं हमसे!’ मैंने कहा- ‘हां, क्यों न होऊं?’

मैं हॉस्पिटल की व्यवस्था को लेकर उलाहने देने लगी थी और इसी प्रकार की कुछ और बातें किए जा रही थी! बावजूद इसके उन्होंने बुरा नहीं माना। शायद वे मरीज़ों की मन:स्थिति समझते हैं।

डर तो मुझे ख़ूब लग रहा था क्योंकि एक स्त्री ने मुझसे कहा था कि दिल का ऑपरेशन होश में रहते ही होगा। मैंने सोचा कि यही वक़्त है डॉक्टर से पूछ ही लूं और मैंने उनसे सीधे पूछा- ‘बेहोश करके ही ऑपरेशन होगा न?’

डॉक्टर ने मज़ाक़िया अंदाज़ में मुझसे कहा- ‘अब मैं आपके होश में रहते ही ऑपरेशन करके आप पर एक नया एक्सपेरिमेंट करता हूं।’

इस दौरान बातों ही बातों में उन्होंने मुझे बेहोशी का इंजेक्शन दे दिया। उसके बाद क्या हुआ मुझे कुछ याद नहीं!

करीब 36 घंटे बाद 14 फरवरी को मेरी आंखें रुक-रुक कर खुल रही थीं! आंखें खुलते ही सामने पतिदेव को खड़ा देखा। मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा था कि मैं सचमुच जीवित हूं या स्वप्न देख रही हूं।

इसी दुविधा में मैंने पति की तरफ़ हाथ बढ़ाया। जब उन्होंने मेरा हाथ थामा तब विश्वास हुआ कि मैं सचमुच जीवित हूं। वाक़ई, मैं भूल गई थी उन सभी शारीरिक और मानसिक यातनाओं को जिन्हें मैंने सर्जरी के पूर्व झेला था। उस समय ज़िंदगी और भी ख़ूबसूरत लगने लगी थी। हॉस्पिटल का वह रिकवरी रूम सबसे सुंदर स्थान लग रहा था मुझे।

भाई-बहनों, सहेलियों, सभी परिजनों का स्नेह, मां का अखंड दीप जलाना, ससुराल में शिवमंदिर में 11 ब्राह्मणों द्वारा महामृत्युंजय मंत्र का जाप; पिता, पति, और पुत्रों के द्वारा किए गए प्रयास कैसे मुझे जाने देते इस सुंदर संसार से! वो सभी स्नेहिल अनुभूतियां मेरे नेत्रों को आज भी सजल कर देती हैं। मैं उस एहसास को शब्दों में अभिव्यक्त नहीं कर पा रही हूं। अब डॉक्टर देव और नर्स देवियां लगती हैं। हॉस्पिटल एक मंदिर लगता है।

समस्या का पता लगने से सर्जरी होने तक, मुझे यही अनुभव हुआ कि समस्याओं से अधिक मनुष्य एक भयानक आशंका से घिरकर डरा होता है। ऐसी स्थिति में उसके अंदर नकारात्मक भाव उत्पन्न होने लगते हैं जो कि सकारात्मक सोचने ही नहीं देते हैं। ऊपर से हिंदुस्तान में सभी डॉक्टर ही बनकर सलाह देने लगते हैं। मैं तो यही कहूंगी कि स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए योग्य डॉक्टर से ही परामर्श लें।

विज्ञान बहुत आगे बढ़ चुका है इसलिए डाॅक्टर पर भरोसा रखें। आत्मविश्वास के लिए ईश्वर पर विश्वास रखें। और सबसे पहले, डॉक्टर और हॉस्पिटल के चयन में कोई भी समझौता न करें।

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