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मरासिम:सबसे अनूठा होता है दोस्ती का रिश्ता, दोस्तों का साथ बीमारी से लेकर बुढ़ापे तक के कष्ट दूर कर देता है

आशीष पिल्लई2 महीने पहले
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  • इस दुनिया में दोस्ती का रिश्ता अनूठा है। दोस्त, जिनके साथ आप हंसते-मुस्कराते हैं, सुख-दु:ख बांटते हैं और समस्याओं से जूझते भी हैं। दोस्त न हों तो ज़िंदगी कितनी नीरस और औपचारिक हो जाए! दोस्त ही हैं जो जीवन में तरह-तरह के रंग भरते हैं।
  • उनका साथ ऐसा मज़ेदार होता है कि आप बीमारी और बुढ़ापे के कष्ट भी भूल जाते हैं।
  • सो, अगस्त की पहली तारीख़ को फ्रेंडशिप डे पर ही नहीं हर दिन पूरे जोश के साथ कहिए- यारी-दोस्ती ज़िंदाबाद

रणक्षेत्र में वह सैनिक अड़ा हुआ था कि अपने मित्र सैनिक की मदद के लिए ज़रूर जाएगा। कमांडर उसे समझा रहे थे कि जिस तरह से गोलीबारी हुई है, उसका जीवित बचना असंभव है, इसलिए जान जोखिम में डालकर उसके पास जाने का मतलब नहीं। लेकिन वह नहीं माना और गोलियों के बीच अपने दोस्त के पास पहुंचकर उसे कंधे पर लादकर ले भी आया। जब उसने मित्र को ज़मीन पर लिटाया तो देखा कि उसकी सांसें उखड़ चुकी थीं।
कमांडर बोले, ‘मैंने पहले ही कहा था कि वहां जाने का कोई मतलब नहीं।’
सैनिक ने रूंधे गले से जवाब दिया, ‘मतलब था सर! जब मैं अपने दोस्त के पास पहुंचा तो उसकी सांसें चल रही थीं। मुझे देखकर उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसने कहा- मुझे मालूम था, तुम ज़रूर आओगे!’
यह भरोसा ही मित्रता का आधार है। घूमना-फिरना, गप्पें लड़ाना, मौज-मस्ती करना भी महत्वपूर्ण है, लेकिन भरोसे के बिना बाक़ी सब व्यर्थ है। इसीलिए दोस्तों के बीच यह जुमला चलता है कि आधी रात को भी आवाज़ देना, मैं हाज़िर हो जाऊंगा।
परिवार जैसे होते हैं दोस्त
मित्रता मानसिक, शारीरिक और सामाजिक स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। आमतौर पर हम पारिवारिक रिश्तों को ही जीवन की सफलता का श्रेय देते हैं। लेकिन मित्रता जीवन का एक ऐसा घटक है, जो हमारे हर व्यवहार को एक दिशा देता है। मनोवैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों ने लगातार इस विषय पर कई शोध किए और अनेक रोचक तथ्यों की पुष्टि की है।
ला ग्रेका और हारिसन ने 2005 में अपने शोध के ज़रिए बताया कि वे बच्चे जिनकी मित्रता की गुणवत्ता कम है, उनमें अवसाद के लक्षण अधिक देखे जाते हैं।
बिशप और इंडरबितजें ने 1995 के शोध में यह पाया कि मित्रता स्वीकार्यता से ज़्यादा प्रभाव आत्मसम्मान पर डालती है। आपराधिक प्रवृत्ति के बालकों पर किए गए अध्ययन में यह पाया गया कि ऐसे बालक अन्य आपराधिक प्रवृत्ति वाले लड़कों से जल्दी दोस्ती करते हैं और यह व्यवहार समय के साथ बढ़ जाता है। इससे और इस क्षेत्र में किए गए अन्य शोधों से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जैसी संगत होती है वैसे ही व्यवहार में परिवर्तन आ जाते हैं। इसलिए बाल्यकाल, किशोरावस्था और युवावस्था में सही मित्र चुनना बहुत महत्वपूर्ण होता है।
ब्लीज़नेर और एडम्स ने 1992 में अपने अध्ययन के ज़रिए बताया कि जीवन के उतरार्द्ध में मित्रता अकेलेपन से लड़ने में सहायक है। मित्रता ऐसी राह है जो हंसने, ख़ुश रहने, स्वास्थ्य के प्रति सजग रहने के लिए और जीवन के कुछ अच्छे पल खोजने वालों के लिए मददगार होती है। वयस्कों में मित्रता कुशलता और सामाजिक सहयोग में वृद्धि करती है। संज्ञानात्मक स्वास्थ्य और शारीरिक संबल के लिए भी मित्रता एक अहम घटक है।

जैसा दोस्त चाहिए वैसा बनें
भरोसेमंद दोस्त की तलाश हर किसी को होती है, बुरे लोगों को भी। कोई अकेलापन पसंद नहीं करता, हर कोई एक ऐसा मित्र चाहता है जिसके पास वह अपने दिल का हाल बयान कर सके, अपनी ख़ुशी और दु:ख, प्रतिष्ठा और मान, रोष और सोच बांट सके। मित्रता ऐसा रिश्ता है जो दो व्यक्तियों को बांधता तो है पर बंधन में नहीं डालता। जीवन के विभिन्न पड़ावों पर हम दोस्त बनाते हैं, उनमें से कुछ समय के साथ छूट जाते हैं पर यादों में हमेशा बने रहते हैं। बचपन से ही हम दोस्ती की मिसालें देते हैं।
राल्फ़ वाल्डो इमर्सन कहते हैं कि एक अच्छा दोस्त पाने का एकमात्र तरीक़ा है, एक अच्छा दोस्त बनना। यानी आप जैसा दोस्त खोज रहे हैं या अपने दोस्त से जैसा चाहते हैं, वैसा ख़ुद भी बनें। किसी ने क्या ख़ूब कहा है कि दोस्ती बचत खाते की तरह होती है। निकालते ही रहे तो खाता ख़ाली हो जाएगा, अत: उसमें नियमित रूप से जमा करना भी ज़रूरी है।

दोस्ती से बाहर निकलना
कई बार हम मित्रों के रूप में ऐसे व्यक्तियों को जगह दे देते हैं जो सामने मीठा बोलते हैं, प्रीत दिखाते हैं लेकिन मन में ज़हरीली सोच रखते हैं, पीठ पीछे बुराई करते हैं और मौक़ा पाकर हमारा नुक़सान कर देते हैं। इनकी पहचान कर समय रहते इनको जीवन से दूर कर देना चाहिए। असलियत को स्वीकार करना ही ऐसी मित्रता को ख़त्म करने का प्रथम पड़ाव है।
मित्रता का चुनाव करना आपका अधिकार है। अगर आपका मित्र लगातार आपके साथ दुर्व्यवहार करता है या आपके मान को ठेस पहुंचाता है तो ऐसे मित्र से दूर रहना ही अच्छा है। यह आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। अपने प्रति ग़लत व्यवहार को अनदेखा करना भविष्य में उस व्यवहार को बढ़ावा देगा। इसे वहीं रोकना ही सही है। अपनी भावनाओं को सही समय पर व्यक्त करें। हानिकारक मित्रता से बाहर निकलने के लिए और अपनी गरिमा के लिए उक्त व्यक्ति को स्पष्ट रूप से अवगत कराएं कि इस मित्रता में आप असहज हैं। कई बार ग़लती दोनों ही पक्षों की होती है, अत: जांचें और समझें कि ऐसी दोस्ती में आपका स्थान क्या है। आपसे चूक कहां हुई, इस बात को समझें और मानें।
मित्रता को ख़त्म करने के लिए सही तरीक़ा चुनें, क्योंकि यह आपके ऊपर है कि मित्रता को कड़वे अनुभव और यादों के साथ ख़त्म करना है या परस्पर मंगल कामना के साथ। एक-दूसरे को क्षमा करना और दुर्भावनाएं दूर करना, ऐसी दोस्ती को सकारात्मक मोड़ पर समाप्त करने में सहायक होगा।

दोस्तियां
अरस्तू ने तीन प्रकार की मित्रता के बारे में कहा है —
पहला, इच्छुक मैत्री। इसमें लोग आपस में कुछ प्राप्त करने के उद्देश्य से मित्रता करते हैं। इसमें आपसी सहयोग और जीवन में अलग-अलग लक्ष्यों की प्राप्ति का ध्येय होता है।
दूसरा, आनंदवादी मैत्री। यह आमतौर पर किशोरावस्था या युवावस्था के प्रारम्भिक दौर में देखी जाती है जिसका उद्देश्य मनोरंजन और समय व्यतीत करना होता है। समय के साथ हम ऐसी मित्रता की छंटनी कर देते हैं।
तीसरी, स्थायी मैत्री। इसे आदर्श मित्रता कहा जा सकता है। स्वार्थ से परे, यह ईमानदार और उच्च कोटि की मैत्री होती है जिसे प्राप्त करना मुश्किल है पर असंभव नहीं।

स्त्री और पुरुष की दोस्ती
एक सर्वे में पाया गया कि 75 फ़ीसदी ‘अच्छे दोस्त’ समान लिंग वाले थे। यानी पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री।
विशेषज्ञ मानते हैं कि समान लिंग वालों के बीच गहरी दोस्ती होने की संभावना ज़्यादा होती है। एक तो यह प्रवृत्ति की बात है, दूसरे, ऐसी दोस्ती समाज के मानकों के हिसाब से ‘नैतिक’ भी होती है।
— दरअसल, दोस्ती से स्त्री और पुरुष की ज़रूरतें अलग होती हैं। महिलाएं अपनी सखी से ‘साथ’ चाहती हैं, जबकि पुरुष अपने दोस्त से ‘सहायता’ चाहते हैं। महिलाओं को ज़रूरत होती है कि कोई उन्हें सुने। पुरुष समाधान प्रधान होते हैं, इसलिए वे मदद की पेशकश करते हैं या समाधान सुझाने लगते हैं। दोनों की दोस्तियों में यह बुनियादी अंतर है।
— महिलाओं को नियमित संपर्क की दरकार महसूस होती है, इसलिए वे फ़ोन और सोशल मीडिया के ज़रिए अधिक जुड़ी होती हैं। पुरुषों को नियमित रूप से हाय-हैलो करते रहना अनावश्यक लगता है। इसके अलावा, प्रगाढ़ता में भी फ़र्क़ होता है। पुरुष संक्षिप्त मुलाक़ात में मित्र बन सकते हैं परंतु जल्दी ही एक-दूसरे को भूल भी सकते हैं। महिलाएं दोस्ती के रिश्ते में समय और भावना का ज़्यादा निवेश करती हैं।
मित्रता एक नेमत है।
इस रिश्ते की अच्छी बात है कि इसमें चुनाव हम स्वयं करते हैं। दोस्तों के साथ हम अपने सहज रूप में होते हैं, एकदम बिंदास। इस दुनिया में जहां बनावटीपन का अंबार है, इस बेतकल्लुफ़ी से ज़्यादा क्या चाहिए! इसलिए दोस्त बनाएं, सच्चे दोस्त बनें, दोस्तों का साथ दें, उनके साथ मेल-मुलाक़ात करते रहें।

सच्ची दोस्ती की पहचान
सच्ची दोस्ती को पहचानना भी एक कला है जो हर कोई नहीं कर सकता।
हम सभी ने आदर्श मित्रता की कहानियां पढ़ी हैं – कृष्ण और सुदामा, कर्ण और दुर्योधन, कृष्ण और द्रौपदी, सीता और त्रिजटा नि:स्वार्थ मित्रता का अनुपम उदाहरण हैं। एक अच्छा मित्र औषधि के समान होता है जो लगातार हमें स्वस्थ और सुखी जीवन का मूल्य दर्शाता रहता है।

आचार्य चाणक्य के अनुसार...
मित्रों का चुनाव करते समय इन बातों का ध्यान रखना चाहिए :
— मित्रता की नींव विश्वास और समर्पण है। सच्चे मित्र का चुनाव जीवन में सफलता के लिए अति महत्वपूर्ण है।
— मित्रता नि:स्वार्थ होनी चाहिए, इसमें स्वार्थ, ईर्ष्या और लालच नहीं होने चाहिए।
— मित्रों के चुनाव में यह आवश्यक है कि ऐसे मित्र बनाएं जो स्पष्टवादी हों, सही को सही और ग़लत को ग़लत कह सकें, अर्थात साफ़ हृदय का व्यक्ति ही सच्चा मित्र बन सकता है।

महाकवि तुलसीदास जी ने कहा है...
‘जिन्ह कें असि मति सहज न आई।
ते सठ कत हठि करत मिताई।’
इससे उनका तात्पर्य ऐसे लोगों से प्रश्न करना है जो अपनी मूर्खता और हठ से मित्रता तो कर लेते हैं पर उन्हें मित्र धर्म का पालन करना नहीं आता। वे कहते हैं कि सच्चा मित्र वही है जो अपने मित्र को कुमार्ग से सुपथ पर ले आए और अवगुणों को छुपाकर गुणों को प्रकट करके प्रोत्साहित करे।

लेखक परिचय

आशीष पिल्लई
रिहैबिलिटेशन काउंसलर और प्रेरक वक्ता। बच्चों, किशोरों और युवाओं से जुड़ी मानसिक समस्याओं और जीवनशैली से संबंधित दिक़्क़तों के समाधान में विशेषज्ञता रखते हैं।

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