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  • The Past Year Has Taught A Lot, It Is Important To Test This Newness And Change Before Taking New Resolutions For The New Year.

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नवान्न:बीते साल ने बहुत कुछ सिखाया, नए साल के नए संकल्प लेने से पूर्व इस नएपन और बदलाव की परख ज़रूरी है

घनश्याम कुमार देवांश11 दिन पहले
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  • नया साल हमेशा एक नए त्योहार की तरह दिखाई देता है। कैलेंडर बनाने वालों ने जब कभी साल का बदलना तय किया तो वह इंसान के लिए ख़ुशी का मौक़ा बन गया। लेकिन कहने वाले तो ये भी कहते हैं कि कैलेंडर यानी साल बदलने से आख़िर बदलता क्या है?
  • आइए... इस नएपन और बदलाव की थोड़ी परख करते हैं।

ये सवाल तो अपनी जगह पर जायज़ है कि आख़िर साल के इस तरफ़ और उस तरफ़ एक ही दिन में क्या बदल जाता है? ज़ाहिर है कुछ भी नहीं और फिर समय कोई पहिया तो है नहीं जो लौटकर आ जाए। उसकी गति तो हमेशा आगे की तरफ़ जाती है।

लेकिन इस सबके बावजूद नया साल हमें ख़ुश करता है; और ऐसा शायद इसलिए क्योंकि साल के अंक बदल जाते हैं तो समय का एक बहुत बड़ा टुकड़ा हमारी ज़िंदगी से विदा हो जाता है।

ऐसा होना ही हमें नएपन का एहसास कराता है। हमें लगता है कि साल अच्छा-बुरा जैसा भी था, बीत गया। अब नया साल सामने खड़ा है। इसमें कुछ नया हो या न हो, नए की उम्मीद तो रहती ही है। यह उम्मीद ही इंसान को ख़ुश कर जाती है।

पहले के वक़्त में नया साल मौसम और फ़सलों के चक्र से निर्धारित होता था। एक फ़सल का चक्र पूरा होता था तो नया साल शुरू हुआ मान लिया जाता था।

अपने ही देश में नए साल पर आधारित कई त्योहार मनाए जाते हैं जैसे आंध्र व कर्नाटक में उगादी, महाराष्ट्र व कोंकण क्षेत्र में गुड़ी पड़वा, पंजाब में बैसाखी, असम में बीहू, केरल में वीशु, गुजरात में बेस्तु बरस, बंगाल में पोहिला बैशाख, बिहार-झारखंड में जूड़-शीतल, अरुणाचल में लोसर आदि। ये सभी त्योहार नए साल की ख़ुशी में मनाए जाते हैं।

आज हम भले ही अपना नया साल अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार मानने लगे हों लेकिन हमने अभी भी इन त्योहारों को मनाना बिलकुल नहीं छोड़ा।

नए साल पर हम नए और बेहतर की उम्मीद लगाते हैं। हम चाहते हैं कि जीवन में अब तक जो नहीं बदला वो बदले; जीवन में नई सकारात्मकता का संचार हो। यही कारण है कि नया साल क़रीब आते ही हम बहुत कुछ बदलने की योजनाएं बनाने लगते हैं।

नए साल पर नए संकल्प लिए जाते हैं। तो कोविड-19 के भीषण दौर के बीच गुज़रने वाले इस साल के अंत में क्यों न इन नए पांच संकल्पों पर विचार किया जाए :

1. आधा घंटा सेहत का
लोग कहते हैं कि उनके पास सुबह या शाम घूमने-टहलने अथवा कसरत करने का वक़्त ही नहीं है। लेकिन जनाब क्या आपने कभी हिसाब लगाया कि आपने दिनभर में कितना वक़्त बेवजह सोशल मीडिया, टीवी या फोन पर गै़र-ज़रूरी बातचीत करने में गंवाया? हिसाब लगाएंगे तो इसे ज़रूरत से कहीं ज़्यादा ही पाएंगे।

तो इस साल ये तय रहा कि प्रतिदिन आधा घंटा अपनी सेहत के लिए ज़रूर देना है फिर चाहे पूरी दुनिया इधर से उधर क्यों न हो जाए।

2 सैर कर दुनिया की गाफ़िल
कभी आप अकेले बिना किसी को साथ लिए और बिना किसी ख़ास योजना के शहर से दूर घूमने निकले हैं? नहीं न? इस साल ये भी करके देखिए। एकदम शुरू में नहीं तो जब भी अनुकूलताएं निर्मित हों तब, लेकिन कम से कम एक बार तो ज़रूर।

चाहे सिर्फ़ दो दिन के लिए लेकिन अपना छोटा-सा झोला और कुछ पैसे लेकर निकल ही जाइए। जब आप लौटकर आएंगे तो इसके फ़ायदे ख़ुद जान जाएंगे और दूसरों को भी बताएंगे।

3 तेते पांव पसारिए जेती लाम्बी सौर
बुजु़र्गों ने ये कहावत सोच-समझकर ही कही होगी। पांव उतने ही पसारने चाहिए, जितनी लम्बी चादर हो। मतलब यह कि ख़र्चा आमदनी के हिसाब से ही करना चाहिए।

इस एक साल में जब अनेक काम-धंधे चौपट हो गए तो ऐसे में वही पैसे काम आए जो किसी तरह बचा लिए गए थे। लेकिन आज अधिकांश लोगों की ज़िंदगी क़र्ज़ और ईएमआई पर ही कट रही है; ऐसे लोगों को इस साल बहुत तकलीफ़ से गुज़रना पड़ा।

तो क्यों न नए साल में यह प्रण लिया जाए कि हम अपने ख़र्चों को कम करेंगे और उन्हीं चीज़ों पर पैसे ख़र्च करेंगे, जो बहुत ज़रूरी हों। साथ ही साथ आमदनी का कम से कम 5% हिस्सा हर महीने बचाएंगे। ऐसा करना आगे के लिए फ़ायदेमंद होगा।

4 प्राण को प्राण : वृक्षदान
क्या आपने कभी सोचा कि हम अपने प्रियजनों को उपहार में वस्तुएं ही क्यों देते हैं? निष्प्राण वस्तुएं? तो इस साल ये संकल्प भी लिया जाए कि अपने प्रियजनों को हम उपहार में भेंटस्वरूप एक पेड़ की पौध भेंट करेंगे, फिर भले ही आप ज़रूरी समझें तो उसके साथ अन्य कोई वस्तु भी भेंट कर दें।

जब पौध मिल जाएगी तो उस व्यक्ति को अपने आप ही उसे लगाने का ज़िम्मा भी मिल ही जाएगा। वह लगा हुआ पेड़ हमेशा यादगार के रूप में बढ़ता रहेगा और आपकी याद भी दिलाता रहेगा।

5 तो इस साल क्या सीखना है?
हम जब भी कुछ नया सीखते हैं तो हमारे जीवन में बहुत नयापन आता है। कई लोगों की तो जैसे ज़िंदगी ही बदल जाती है।

हमारे पड़ोस में एक आंटी थी। एक बार उन्हें कॉलोनी में साइकिल चलाते बच्चों को देख ख़ुद भी साइकिल सीखने की ज़ोरदार इच्छा हुई। देखते-देखते उन्होने साइकिल सीख भी ली और अब तो उनका घर पर बैठकर पार्टी करने वाला मित्र-समूह साइकिल लेकर हर इतवार निकल जाता है। इस एक कौशल ने मानो उनके व्यक्तित्व को पंख लगा दिए हैं।

तो आप भी इस साल कुछ नया सीखने का संकल्प कर लीजिए। ज़रूरी नहीं कि आप कुछ बड़ा ही सीखें। ये एक मामूली-सी दिखने वाली कुशलता भी हो सकती है।

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