यौवन ऊर्जा:नकारात्मकता के दौर में युवाओं के लिए सकारात्मकता की राह

नंदितेश निलय16 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
  • जवानी लपटों का घर है / जवानी पंचम का स्वर है / जवानी सपनों की वय है / जवानी में जाग्रत अरमान / जवानी ख़ुद अपनी पहचान... श्रीकृष्ण सरल ने युवावस्था का क्या सटीक शब्द-चित्र खींचा है! युवा का अर्थ ही उमंग, उत्साह, कर्मठता, प्रयोगधर्मिता और नवोन्मेष है। युवा जो कभी हार न माने, जो कुछ अनूठा और ख़ास करके अपनी अलहदा पहचान बनाने को आतुर हो। जिसकी ओर ज़माना बड़ी आशा से देखता है, उस तरुणाई में निराशा का कोई स्थान नहीं। लेकिन नैराश्य और नकारात्मकता के दौर में युवा भी हताश हो रहा है... इस विकट समय में युवा को राह दिखा रही है इस बार की आमुख कथा।

इस युवा वर्ग ने देश को नई उम्मीदें दी हैं, उसके सपनों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। दुनियाभर में अपनी पहचान बनाने को उत्सुक यही युवा अपनी पहचान के संकट से भी जूझ रहा है। छोटी-छोटी विफलताएं उसे निराशा और अवसाद से घेर रही हैं। यहां तक कि वह बहुत मामूली कारणों से आत्महंता क़दम भी उठा रहा है। ठीक है कि यह दौर अलग है, किंतु जवानी कब लीक पर चली है! वह तो दौर बदलने के लिए जानी जाती है। यौवन के उत्साह को यदि समझदारी की रोशनी मिल जाए तो युवा न सिर्फ़ नकारात्मकता को ख़त्म कर सकते हैं, बल्कि एक सुनहरा भविष्य भी गढ़ सकते हैं।
———
पद नहीं गुण हैं पहचान
इस अशांत समय में युवाओं पर अच्छे प्रदर्शन का काफ़ी दबाव रहा है। उनकी नौकरी और शैक्षणिक उपलब्धियां उनकी पहचान के कार्य को पूरा नहीं कर रही हैं। वे पहचान के संकट की स्थिति में हैं। लेकिन जैसा कि स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि युवा वास्तव में किसी भी देश की आबादी का सबसे गतिशील और जीवंत वर्ग हैं। वे जो सोचेंगे, वही होंगे। अगर वे ख़ुद को कमज़ोर समझते हैं, तो कमज़ोर होंगे; अगर वे ख़ुद को मज़बूत समझते हैं, तो मज़बूत होंगे। इसलिए युवाओं को अपनी स्वाभाविक पहचान याद रखनी होगी। वह है उनकी गतिशीलता, रचनात्मकता, विचार और ऊर्जा।
आज का युवा रचनात्मकता से हर असंभव को संभव बना रहा है। लेकिन उस पर प्रदर्शन का बहुत दबाव भी बना रहता है। और फिर वह अपनी पहचान की उलझन में फंस जाता है। ऐसे समय उसे अंतहीन दौड़ में दौड़ने के बजाय अपनी मूल पहचान के पहलुओं पर ग़ौर करना चाहिए, जो है इंसानियत। युवाओं के रोल मॉडल सचिन तेंदुलकर अपने पिता जी की यह सलाह कभी नहीं भूलते कि सचिन की पहचान सबसे पहले एक अच्छे इंसान की होनी चाहिए और फिर बैट्समैन की। यह समझ ही हम सभी को पहचान के संकट से बचाएगी।

स्क्रीन से परे भी है दुनिया
आधुनिक समय में स्क्रीन से दूर होना आसान नहीं है। ऑनलाइन मोड ने इसे अनिवार्य कर दिया है। लेकिन दिन-प्रतिदिन की पढ़ाई या जि़म्मेदारियों को पूरा करने के बाद किसी भी युवा को किसी काग़ज़ पर छपी किताब से तो गुज़रना ही चाहिए। वह पुस्तक कोई भी हो सकती है।
पढ़ने और लिखने की आदत हमारे हाथ और आंख के संपर्क को बेहतर बनाती है। महात्मा गांधी ने लगभग 35 करोड़ लोगों को ग़ुलामी और औपनिवेशिक क़ब्ज़े से मुक्त करने में मदद की। उनकी सफलता का सबसे बड़ा रहस्य उनकी अविश्वसनीय आदतें थीं। गांधी ने सबकुछ पढ़ा। उन्होंने गीता, क़ुरान, बाइबिल, प्रसिद्ध लेखकों की किताबें, समाचार पत्र और पत्रिकाएं पढ़ीं। ऐसा करके उन्होंने अपने मानसिक क्षितिज को विस्तारित किया। क्या हम हर दिन कुछ नया पढ़ने में 10 मिनट ख़र्च करके शुरुआत कर सकते हैं?
शैक्षिणेतर गतिविधियों का महत्व वास्तव में शौक़ या जुनून से बहुत आगे जाता है। अध्ययनों ने दीर्घकालिक सफलता के लिए बौद्धिक और साथ ही मनोवैज्ञानिक व सर्वांगीण विकास के महत्व को लगातार दर्ज किया है। रचनात्मक कलाओं से जुड़ना विशेष पैटर्न को देखने और लीक से हटकर सोचने की क्षमता को सक्षम बनाता है। यह एक बेहतर सौंदर्य बोध और उच्च अनुशासन को विकसित करता है। कई संगठन भी नए उम्मीदवारों की भर्ती करते समय शैक्षिणेतर दक्षता की पड़ताल करने लगे हैं। इसलिए जो लोग करियर बनाने की योजना बना रहे हैं, उन्हें अपनी नौकरी-विशिष्ट आवश्यकताओं के अलावा इन कौशलों में निवेश करने पर विचार करना चाहिए।

नए-नए क्षेत्रों में मल्टीटास्किंग
आधुनिक दुनिया के युवा तकनीक की समझ रखने वाले हैं। वे इतनी सारी नेटवर्किंग साइटों और गैजेट्स को संभालने की अपनी गति और मल्टीटास्किंग पर गर्व महसूस करते हैं।
गति और मल्टीटास्किंग युवाओं के नैसर्गिक गुण हैं। क्या वे उन्हें अन्य उत्पादक गतिविधियों में भी आज़मा सकते हैं? जैसे- चलना, ध्यान करना, सफ़ाई करना, खाना बनाना, संगीत का आनंद लेना और परिवार के सदस्यों के साथ बातचीत करना। इससे उनकी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा मिलेगी। इस क़िस्म की मल्टीटास्किंग जीवन में संतुष्टि का समावेश करेगी।

मज़बूत बनाता है भूल-सुधार
यौवन यानी नए-नए काम करना। नए कामों में हाथ डाला जाएगा तो ग़लतियां भी होंगी, परंतु कई बार युवा ग़लती को स्वीकार करने से हिचकिचाते हैं। बक़ौल बास्केटबॉल कोच डीन स्मिथ, ‘किसी ग़लती के साथ ये करें: इसे पहचानें, इसे स्वीकार करें, इससे सीखें, इसे भूल जाएं।’
यही आदत युवाओं को मज़बूत और बेहतर इंसान बनाएगी। ग़लतियों को स्वीकारना और उन्हें न दुहराना अंततः उन्हें बेहतर परिणामों की दिशा में अधिकतम ऊर्जा लगाने के लिए प्रेरित करेगा। यह उन्हें अनावश्यक चिंता से बचाएगा।
गांधी ने अपनी आत्मकथा में अपनी ग़लतियों और उनसे सीखने के बारे में विस्तार से लिखा है। भूल सुधार की पूरी प्रक्रिया ने उन्हें मज़बूत और बेहतर इंसान बना दिया। वे स्वीकार करते हैं कि उन्होंने एक बार पैसे चुराए और बाद में इसका पछतावा किया। उन्होंने जीवन में विभिन्न ग़लतियों पर अपनी टिप्पणियों का विश्लेषण किया, जिससे बहुत कुछ सीखा। ग़लतियों को स्वीकार करने और उन पर काम करने से एक युवा बेहतर दृष्टिकोण और सकारात्मक मानसिकता का निर्माण करता है।

छोटा नहीं होता कोई काम
महामारी के समय में घर में युवा जोड़ों के बीच एक अलग तरह का संघर्ष देखने को मिला है। वे खाना पकाने, पोंछा लगाने, सफ़ाई करने या फ़र्श पर झाड़ू लगाने के बारे में निर्णय लेने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। स्त्री-पुरुष की बराबरी का सवाल खड़ा होने लगा है। कि आख़िर पोंछा-झाडू कौन करे! अन्य वर्गों पर उनकी अत्यधिक निर्भरता ने उनकी मेहनत को उनसे छीन लिया। लेकिन युवा तो शक्ति का प्रतीक हैं। उन्हें घरेलू कामों में भी योगदान करके शक्ति का सदुपयोग करना चाहिए। इससे उन्हें महसूस होगा कि कोई भी कार्य छोटा नहीं होता। यह ज्ञान उन्हें अपने करियर और उपलब्धियों को देखने की नई नज़र देगा।
लाभ और भी हैं। जापान में एक परंपरा है कि छात्र स्वयं अपने स्कूलों की सफ़ाई करते हैं। दिन के अंत में सिर्फ़ 15 मिनट के लिए छात्र कक्षाओं, प्रसाधन कक्षों और स्कूल के अन्य स्थानों को साफ़ करने के लिए झाड़ू, वैक्यूम क्लीनर और कपड़ों का उपयोग करते हैं। यह परंपरा 17वीं शताब्दी के दर्शन पर आधारित है कि निजी स्वच्छता और स्वच्छ वातावरण रखने से ही एक स्पष्ट दिमाग़ आता है। यह लोगों और वस्तुओं के प्रति कृतज्ञता दिखाने का भी एक तरीक़ा है।

टूटने न दें आशा
परवाह करने वाले, दयालु और साहसी युवाओं के बिना कोई देश कैसे जीवित रह सकता है? इसलिए देश के बुज़ुुर्ग और बच्चे युवाओं की ओर देखते हैं। क्योंकि युवा आशा हैं।
एक बूढ़े पिता या मां को ऐसी बेटियों और बेटों की ज़रूरत होती है जो उनके बुढ़ापे को ख़ुशहाल बना सकें। भले ही वे शारीरिक शक्ति खो देते हैं लेकिन वे जानते हैं कि उनके बच्चे उनकी देखभाल करने के लिए हैं। युवाओं की ज़िम्मेदारी है कि चाहे जो भी स्थिति हो, कितनी ही चुनौतियां हों, इस आशा को टूटने न दें। वे हमेशा याद रखें कि उनकी ऊर्जा और जीवन पूरे समाज की पूंजी है। स्वामी विवेकानंद ने भी कहा था, ‘भविष्य की मेरी आशा चरित्रवान युवाओं में है- बुद्धिमान, दूसरों की सेवा के लिए सबकुछ त्याग करने वाले, और आज्ञाकारी।’

बुज़ुर्गों से जुड़ाव का जादू
सभी युवा एक दिन बूढ़े हो जाएंगे और वह ज्ञान निश्चित रूप से युवाओं को अपनी ताक़त और भावनाओं को वरिष्ठों के साथ साझा करने के लिए प्रेरित करेगा। दूसरी ओर, युवाओं से घिरे रहने से वरिष्ठ को युवा महसूस करने के लिए और उस युवा को थोड़ा अधिक परिपक्व होने के लिए प्रेरणा मिलेगी। इससे चक्र पूरा हो जाएगा और लूप बंद हो जाएगा। उम्रदराज़ दुनिया को मन से युवा बनाने की अहमियत भी एक युवा ही समझता है। आख़िर वो युवा जो है।
एक परिपक्व दुनिया में हमें मानव सभ्यता के प्रतिनिधि के रूप में यह सुनिश्चित करना होगा कि युवा जीवन के व्यापक फ़ोकस को न खोएं। साथ ही दुनियाभर के उन सभी वरिष्ठों को यह विश्वास होना चाहिए कि युवा उनके जीवन में ख़ुशियों के वर्षों को जोड़ने के लिए वहां मौजूद रहेंगे। आशा और विश्वास साथ-साथ चलेंगे। इसी से दुनिया में संतुलन बनेगा।
———
आज के युवाओं को समझना होगा कि उनकी पहचान और अस्तित्व का अर्थ अच्छा बनना और बनाना है। जैसा कि विवेकानंद ने कहा, वो जीते हैं, जो दूसरों के लिए जीते हैं। गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर लिखते हैं कि सूरज डूब रहा है और चारों तरफ़ अंधेरा छाने लगा है। और एक वृद्ध बहुत चिंतित हैं कि अब भला कौन उन्हें संभालेगा। तभी एक युवा हाथ में छोटा-सा दिया लिए उठते हुए कहता है, ‘मैं!’
रोनाल्ड रीगन के शब्दों में युवाओं से सवाल है... आप नहीं तो और कौन? अभी नहीं तो फिर कब?

लेखक परिचय

नंदितेश निलय
युवा लेखक, विचारक और वक्ता। बीइंग गुड, आइए इंसान बनें और इथिकोस, ये तीन पुस्तकें प्रकाशित और चर्चित। दिल्ली में निवास।

खबरें और भी हैं...