ज्ञानकोश:कहावतें मज़ेदार तो होती ही हैं लेकिन इनमें पीढ़ियों का संचित ज्ञान समाया होता है इसलिए ये हर समय में प्रासंगिक रहती हैं

2 महीने पहले
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  • पहली नज़र में कहावतें कुछ अटपटी लगती हैं, लेकिन इनमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचित लोक का ज्ञान समाया होता है।
  • अनुभव की भट्‌ठी से तपकर निकलीं कहावतें जहां भाषा को रोचक बनाती हैं, वहीं जीने की राह भी दिखाती हैं। लोक के ख़ज़ाने से ऐसी ही कहावतों के कुछ मोती इस बार ज्ञानकोश में।

छोड़े गांव का नाम क्या?
— जिससे बात का अब कुछ प्रयोजन ही नहीं, उसकी बात की चर्चा से क्या लाभ?

आग खाए मुंह जरे,
उधार खाए पेट जरे

— ऋण चुकाने की चिंता हमेशा ही बनी रहती है, इसलिए कभी क़र्ज़ न लें।

आटा नहीं तो दलिया जब भी हो जाएगा
— गेहूं पीसने से आटा न बने, तो दलिया तो बन ही जाएगा। अधिक नहीं, तो थोड़ा लाभ हो ही जाएगा।
(हिम्मत बंधाने और काम करने की प्रेरणा देने के लिए कहावत।)

आदमी का शैतान आदमी है और आदमी की दवा आदमी
— मनुष्य ही को मनुष्य ही गड्ढे में गिराता है और मनुष्य ही मनुष्य को सुधारता है।

आहारे व्यवहारे, लज्जा न कारे
— भोजन और लेन-देन में संकोच नहीं करना चाहिए।

एक के दूना से सौ के सवाये भले
— अधिक मुनाफ़े पर कम माल बेचने की अपेक्षा कम मुनाफ़े पर अधिक माल बेचना अच्छा। वह कुल मिलाकर अधिक हो जाता है।

जगन्नाथ का भाता,
जिसमें झगड़ा न झांसा

— ऐसा काम जिसमें शंका की गुंजाइश न हो।
( जगन्नाथपुरी मंदिर में भात का प्रसाद बंटता है। उसे जात-पांत का विचार किए बिना सभी स्वीकार करते हैं। कहावत उसी पर।)

ठंडा लोहा गरम लोहे को काटता है
— क्रोधी के सामने शांत प्रकृति वाले मनुष्य की हमेशा जीत होती है।

मौके का घूंसा तलवार से बढ़कर
— समय पर किए गए काम का नतीजा बहुत अच्छा निकलता है।

कपड़ा कहे तू मुझे कर तह,
मैं तुझे करूं शह

— कपड़ा कहता है कि तू मुझे अच्छी तरह तह करके रखे, तो मैं तेरी शान बढ़ाऊंगा।

पहले बो, पहले काट
— जो भी काम करने में शीघ्रता करेगा, उसका फल भी उसे शीघ्र ही मिलेगा।

दर्जी की सुई, कभी ताश में,
कभी टाट में

— दर्जी की सुई कभी रेशम की सिलाई करती है, तो कभी टाट की। परिस्थितियां कभी एक-सी नहीं रहतीं।

पूछते-पूछते तो दिल्ली चले जाते हैं
— स्वयं अपनी सहज बुद्धि से काम लेकर बहुत कुछ किया जा सकता है।

बेटा बनके सबने खाया,
बाप बनके कोई नहीं खाता

— प्रेम से बोलने वाले को सब चाहते हैं, रौब जमाने वाले को कोई नहीं।

कौवों के कोसे से ढोर नहीं मरते
— कोई आदमी अगर अपने स्वार्थवश दूसरे का बुरा चाहे, तो उससे कुछ होता-हवाता नहीं।

घोड़े की दुम बढ़ेगी तो अपनी ही मक्खियां उड़ाएगा
— जब किसी व्यक्ति की उन्नति से दूसरों के हित-साधन की कोई संभावना न हो, तब कहा जाता है।

हल्दी की गांठ हाथ लगी, चूहा पंसारी बन बैठा
— जब कोई थोड़ा धन या थोड़ी विद्या पाकर ही अपने को बड़ा समझ बैठे।

कच्चा दूध सबने पिया है
— सब मनुष्य हैं और भूल सबसे होती है। कच्चा दूध से मतलब मां के दूध से है।
हिंदुस्तानी कहावत कोश से संकलन : एस. डब्ल्यू. फ़ैलन

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