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विरासत:हरिशंकर परसाई की व्यंग्य रचना, फ़ेल होना कुंअर अस्तभान का और करना आत्महत्या की तैयारी

16 दिन पहले
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  • राजा और रंक की दोस्ती की यह कहानी है। राजा अस्तभान है। रंक मुफतलाल है। राजा की बुद्धि का सितारा अस्ताचलगामी है। वह परीक्षा में फ़ेल हो जाता है। मुफतलाल ग़रीब-ग़ुरबा होकर भी पास हो जाता है।
  • तब अस्तभान आत्महत्या की योजना बनाता है और अपने पिता और शिक्षकों के नाम फटकार भरे पत्र लिखता है, जिसमें यह मांग करता है कि धनिकों को परीक्षा की उत्तीर्णता क्रय करने की पात्रता होनी चाहिए।
  • इस योजना में मुफतलाल उसका साथ देता है। कैसे? यह जानने के लिए पढ़िए हिंदी के शीर्षस्थ व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की यशस्वी क़लम से निकला यह धारदार कटाक्ष!

(हरिशंकर परसाई
वर्ष 1924 में होशंगाबाद में जन्म। हिंदी के सर्वश्रेष्ठ व्यंग्यकार। व्यंग्य को विधा का दर्जा दिलाने वाले पहले रचनाकार, जिन्होंने व्यंग्य को समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ा। 'वसुधा' नामक पत्रिका निकाली और समाचार-पत्रों में स्तम्भ लिखे। वर्ष 1995 में निधन।)

फ़ेल होना कुंअर अस्तभान का और करना आत्महत्या की तैयारी

किसी राजा का एक बेटा था, जिसे लोग अस्तभान नाम से पुकाराते थे। उसने अट्‌ठाइसवां वर्ष पार किया था और उनतीसवें में लगा था। पर राजा ने स्कूल में उसकी उम्र चार साल कम लिखाई थी, इसलिए स्कूल रजिस्टर के मुताबिक़ उसकी उम्र चौबीस साल ही होती थी। कुंअर अस्तभान का एक मित्र था, जिसका नाम मुफतलाल था। मुफतलाल उस युग में बड़ा प्रसिद्ध आदमी हो गया है। जब लोगों को ‘जैसा नाम वैसा काम’ का उदाहरण देना होता, तो वे मुफतलाल का नाम लेते थे। कुंअर अस्तभान और मुफतलाल दोनों बचपन के साथी थे। दोनों साथ स्कूल जाते और एक ही बेंच पर बैठते। दोनों कक्षा में बैठे-बैठे साथ मूंगफली खाते, पर पिटता मुफतलाल था। अस्तभान बच जाता, क्योंकि वह राजा का लड़का था। दोनों पुस्तकें बेचकर मैटिनी शो सिनेमा देखते। परीक्षा में दोनों एक-दूसरे की नक़ल करते, इसलिए अक्सर दोनों ही फ़ेल हो जाते। बकरे की बोली बोलना दोनों ने एक साथ ही सीखा था और दोनों लड़कियों के कॉलेज के चौराहे पर साथ-साथ बकरे की बोली बोलते थे। इस प्रकार दोनों की शिक्षा-दीक्षा एक-सी अच्छी हुई थी। पर एक राजकुमार था और दूसरा उसका मुसाहिब। इसी को लक्ष्य करके किसी ने कहा है, ‘दो फूल साथ फूले क़िस्मत जुदा-जुदा।’ मई का महीना है। यह परीक्षाओं के रिज़ल्ट खुलने का मौसम है। दोनों मित्र इस वर्ष बीए की परीक्षा में बैठे हैं। प्रभात का सुहावना समय है। अस्तभान अपने कमरे में बैठा है। पास ही मुफतलाल है। अस्तभान की गोद में चार-पांच अख़बार पड़े हैं। वह एक अख़बार उठाता है और उसमें छपे सब नाम पढ़ता है। फिर आह भरकर रख देता है। तब दूसरा अख़बार उठाता है। उसमें छपे हुए नाम पढ़कर एक आह के साथ उसे भी रख देता है। इस प्रकार वह सब अख़बार पढ़कर रख देता है और खिड़की के बाहर देखने लगता है। मुफतलाल छत पर टकटकी लगाए बैठा है। कमरे में बड़ी भयानक शांति है। शांति को अस्तभान भंग करता है। मुफतलाल की तरफ नज़र घुमाकर कहने लगा, ‘मित्र, तुम पास हो गए और मैं इस बार भी फ़ेल हो गया।’ मुफतलाल की आंखोें से टपटप आंसू चूने लगे। वह बोला, ‘कुमार, मैं पास हो गया, इस ग्लानि से मैं मरा जा रहा हूं। आपके फ़ेल होते हुए मेरा पास हो जाना इतना बड़ा अपराध है कि इसके लिए मेरा सिर भी काटा जा सकता है। मैं अपना यह काला मुंह कहां छिपाऊं? यदि हम दूसरी मंज़िल पर न होते, ज़मीन पर होते, तो मैं कहता- हे मां पृथ्वी, तू फट जा और मैं समा जाऊं।’ मित्र के सच्चे पश्चाताप से अस्तभान का मन पिघल गया। वह अपना दु:ख भूल गया और उसे समझाने लगा, ‘मित्र, दु:खी मत होवो। होनी पर किसी का वश नहीं। तुम्हारा वश चलता तो तुम मुझे छोड़कर कभी पास न होते।’ मुफतलाल कुछ स्वस्थ हुआ। अस्तभान ने अख़बारों को देखा और क्रोध से उसका मुंह लाल हो गया। उसने सब अख़बारों को फाड़कर टुकड़े-टुकड़े कर दिया। फिर पसीना पोंछकर बोला, ‘किसी अख़बार में हमारा नाम नहीं छपा। ये अख़बार वाले मेरे पीछे पड़े हैं। ये मेरा नाम कभी नहीं छापेंगे। भला यह भी कोई बात है कि जिसका नाम अख़बार वाले छापें, वह पास हो जाए और जिसका न छापें, वह फ़ेल हो जाए। अब तो पास होने के लिए मुझ अपना ही अख़बार निकालना पड़ेगा। तुम्हें मैं उसका सम्पादक बनाऊंगा और अब तुम मेरा नाम पहले दर्ज़े में छापना’ मुफतलाल ने विनम्रता से कहा, ‘सो तो ठीक है, पर मेरे छाप देने से विश्वविद्यालय कैसे मानेगा?’ कुंअर ने कहा, ‘और इन अख़बारों की बात क्यों मान लेता है?’ मुफतलाल का हंसने का मन हुआ। पर राजकुमार की बेवक़ूफ़ी पर हंसना क़ानूनन जुर्म है, यह सोचकर उसने गम्भीरता से कहा, ‘कुमार, पास-फ़ेल तो विश्वविद्यालय करता है। अख़बार तो इसकी सूचना मात्र छापते हैं।’ अस्तभान अब विचार में पड़ गया। हाथों की उंगलियां आपस में फंस गईं और सिर लटक गया। बड़ी देर वह इस तरह बैठा रहा। फिर एकाएक उठा और निश्चय के स्वर में बोला, ‘सखा, हम आत्महत्या करेंगे। चार बार हम बीए में फ़ेल हो चुके। फ़ेल होने के बाद आत्महत्या करना वीरों का कार्य है। हम वीर-कुल के हैं। हम राजपुत्र हैं। हम आन पर मर मिटते हैं। हमें तो पहली बार फ़ेल होने पर ही आत्महत्या कर लेनी थी। हमें आत्महत्या कर ही लेनी चाहिए। जाओ, इसका प्रबंध करो।’ मुफतलाल उसके तेज को देखकर सहम गया। वह चाहता था कि अस्तभान कुछ दिन और ज़िंदा रहे। उसने डिप्टी कलेक्टरी के लिए दरख़्वास्त दी थी और चाहता था कि अस्तभान सिफ़ारिश कर दे। वह समझाने लगा, ‘कुमार, मन को इतना छोटा मत करिए। आप ऊंचे खानदान के आदमी हैं। आपके कुल में विद्या की परम्परा नहीं है। आपके पूज्य पिताजी बारह-खड़ी से मुश्किल से आगे बढ़े और आपके प्रात: स्मरणीय पितामह तो अंगूठा लगाते थे। ऐसे कुल में जन्म लेकर आप बीए तक पढ़े, यह कम महत्व की बात नहीं है। इसी बात पर आपका सार्वजनिक अभिनंदन होना चाहिए। कुमार, पढ़ना-लिखना हम छोटे आदमियों का काम है। हमें नौकरी करके पेट जो भरना है। पर आपकी तो पुश्तैनी जायदाद है। आप क्यों विद्या के चक्कर में पड़ते हैं?’ दुविधा पैदा हो गई थी। ऐसे मौक़े पर अस्तभान हमेशा मुफतलाल की सलाह मांगता था। उसे विश्वास था कि वह उसे नेक सलाह देता है। कहने लगा, ‘मित्र, मैं दुविधा में पड़ गया हूं। तू जानता है मैं तेरी सलाह मानता हूं। जो कपड़ा तू बताता है, वह पहनता हूं। जो फ़िल्म तू सुझाता है, वही देखता हूं। तू ही बता मैं क्या करूं। मै तो सोचता हूं कि आत्महत्या कर ही लूं।’ मुफतलाल ने कहा, ‘जी हां, कर लीजिए।’ अस्तभान कुछ सोचकर बोला, ‘या अभी न करूं?’ मुफतलाल ने झट कहा, ‘जी हां, मत करिए। मेरा भी ऐसा ही ख़्याल है।’ कुंअर फिर सोचने लगा। सोचते-सोचते बोला, ‘एक साल और रुकूं। अगले साल कर लूंगा। क्या कहते हो?’ मुफतलाल ने कहा, ‘जी हां, मैं भी सोचता हूं कि अगले साल ही करिए।’ कुंअर फिर बोला, ‘पर फ़ेल तो अगले साल भी होना है। अच्छा है, अभी आत्महत्या कर डालूं।’ मुफतलाल ने कहा, ‘जी हां, जैसे तब, वैसे अब। कर ही डालिए।’ कुंअर अस्तभान बहुत प्रसन्न हुआ। उसने मुफतलाल को गले से लगाकर कहा, ‘मित्र, मैं इसीलिए तो तेरी क़द्र करता हूं कि तू बिलकुल स्वतंत्र और नेक सलाह देता है। तुझ-सा सलाहकार पाकर मैं धन्य हो गया।’ मुफतलाल सकुचा गया। कहने लगा, ‘हें-हें, यह तो कुमार की कृपा है। मैं तो बहुत छोटा आदमी हूं। पर इतना अलबत्ता है कि जो बात आपके भले की होगी, वही कहंूगा- आपको बुरा लगे या भला। मंुह-देखी बात मैं नहीं करता।’ ‘मैं जानता हूं, मैं जानता हूं।’ कुंअर ने कहा। ‘तो अब यह तय हो गया कि हम आत्महत्या करेंेगे। इसके लिए सारा प्रबंध तुम्हारे ज़िम्मे है। प्राचीन काल से लेकर अभी तक आत्महत्या के जितने तरीक़े अपनाए गए हैं, उन सबका अध्ययन करके ऐसा तरीक़ा चुनो, जो अवसर के अनुकूल हो और हमारी प्रतिष्ठा के योग्य हो।’ मुफतलाल ने सिर झुकाकर कहा, ‘जो आज्ञा, कुमार।’ वह वहीं खड़ा-खड़ा कभी अस्तभान को देखता और कभी फ़र्श को। वह कुछ कहना चाहता था। उसके भीतर भावों का तूफ़ान उठ रहा था। उसकी यह हालत देखकर अस्तभान ने कहा, ‘तुम कुछ कहना चाहते हो, मुफतलाल?’ ‘जी,’ मुफतलाल ने कहा। ‘तो बोलो। क्या बात है?’ मुफतलाल बोला, ‘कुमार, मैं भी आपके साथ चलूंगा।’ ‘कहां?’ ‘उस लोक में। मैं भी आत्महत्या करूंगा।’ इस स्नेह से अस्तभान का हृदय भर आया। बड़ी मुश्किल से आंसू रोकर उसने कहा, ‘मित्र, मैं तेरे प्रेम को जानता हूं। पर तू आत्महत्या कैसे करेगा? तू तो पास हो गया है। तेरे लिए यह अवसर नहीं है। तूने डिप्टी कलेक्टरी की दरख़्वास्त दी है। तेरे लिए आत्महत्या का मौक़ा तब आएगा, जब तेरी नौकरी नहीं लगेगी। तू तो जानता है कोई युवक परीक्षा में फ़ेल होने से चाहे बच जाए, पर बेकारी से नहीं बच सकता। तू बेकारी के कारण आत्महत्या करना और मुझसे आ मिलना।’ मुफतलाल ने कहा, ‘सो तो ठीक है, कुमार। पर तब तक यहां कैसे गुज़र होगी? मेरा कोई और सहारा नहीं है। मैंने आपके सिवा किसी को नहीं जाना।’ वह रो पड़ा। कुंअर की भी आंखें भर आईं। उसने मुफतलाल को गले लगाया और कहा, ‘मैं जानता हूं कि मेरे बिना तेरा जीवन दूभर हो जाएगा। मैं तेरी गुज़र-बसर के लिए कोई इंतज़ाम कर जाऊंगा। डिप्टी कलेक्टरी के लिए तेरी सिफ़ारिश भी कर जाऊंगा। लोक-सेवा आयोग मेरी अंतिम इच्छा अवश्य मानेगा।’ मुफतलाल इस बात से बड़ा प्रसन्न हुआ, पर प्रसन्नता को दबाकर रुआंसे स्वर में बोला, ‘मेरा जी यहां कैसे लगेगा? मैं तो आपके साथ ही चलूंगा।’ ‘नहीं मित्र’ अस्तभान ने समझाया, ‘तेरे लिए यहां बहुत काम बाक़ी है। अभी तो तुझे मेरा स्मारक बनवाना है। तू नहीं रहा तो मेरा स्मारक कौन बनवाएगा? मेरी मृत्यु की ख़बर फैलते ही तुझे जगह-जगह शोकसभाएं भी करवाना है। स्मारक के लिए तू चंदा इकट्‌ठा करेगा ही, उसमें से तू कमीशन भी ले सकता है। ठेकेदारों से भी तू कमीशन बांध सकता है। तू चाहे जितने वर्ष स्मारक का काम खींच सकता है। इस तरह तेरी जीविका की समस्या भी हल हो जाएगी और मेरा स्मारक भी बन जाएगा।’ मुफतलाल का मन कुछ हलका हुआ। वह आत्महत्या का प्रबंध करने चला गया। अस्तभान जानता था कि आत्महत्या करने वाला चिटि्ठयां लिखकर छोड़ जाता है। मरने वाले की प्रतिष्ठा इन्हीं चिटि्ठयों पर निर्भर रहती है। कभी-कभी चिट्‌ठी लिखने में इतनी देर लग जाती है कि मरने वाले का मन बदल जाता है और वह इरादा त्याग देता है। यह सोच, अस्तभान जल्दी ही चिट्‌ठी लिखने बैठ गया।

पहली चिट्‌ठी उसने अपने पिताजी को लिखी- ‘पूज्य पिताजी, जब यह चिट्‌ठी आपको मिलेगी, तब तक मैं इस असार संसार से कूच कर जाऊंगा। आपके हृदय को थोड़ा आघात अवश्य लगेगा- ऐसी मुझे आशा है। पर आप यह सोचकर शांति प्राप्त करेंगे कि आपके बेटे ने एक महान उद्देश्य के लिए प्राणोत्सर्ग किया है। पिताजी, अपने कुल में विद्या की परम्परा नहीं है। आप बारहखड़ी से आगे नहीं बढ़े और पितामह स्याही का उपयोग केवल अंगूठा लगाने के लिए करते थे। मैंने विद्या की परम्परा डालने की कोशिश की, पर असफल हुआ। मेरे और आपके प्रयत्नों में कमी नहीं रही। मैंने पाठ्यपुस्तकों को कभी नहीं छुआ और न कक्षा में अध्यापकों की बातें कान में भरीं। मैंने केवल उन नोट्स और कुंजियों का अध्ययन किया, जो ‘एन एक्सपीरिएंस्ड प्रोफ़ेसर’ और ‘एक गोल्ड मेडलिस्ट’ लिखते हैं। मैंने इनमें इतना मन लगाया कि परीक्षा कॉपी में लिखा ‘जूलियस सीज़र’ नाटक का लेखक ‘एन एक्सपीरिएंस्ड प्रोफ़ेसर’ है और ‘विनयपत्रिका’ एक गोल्ड मेडलिस्ट ने लिखी है। गोल्ड-स्मिथ के बारे में मैंने लिखा कि वह भी गोल्ड मेडलिस्ट था और कुंजियां लिखता था। मैंने इतने अच्छे-अच्छे और सही उत्तर लिखे, पर परीक्षक कहते कि ये ग़लत हैं। मैंने प्रश्नपत्र ‘आउट’ करने की भी कोशिश की और कुछ अंशों में सफल भी हो गया। फिर मैंने विश्वविद्यालय से कोरी परीक्षा-कॉपियां चुराने की भी कोशिश की, पर पकड़ लिया गया। तब आपने मामले को दबवाया। परीक्षा में मैंने भरसक नक़ल भी की। परीक्षा के बाद परीक्षकों को नम्बर बढ़ाने के लिए आपने मनमाना रुपया भी दिया। कुछ ने नम्बर बढ़ाए, कुछ रुपया खा गए पर नम्बर नहीं बढ़ाए और कुछ तो ऐसे निकले कि साफ़ इंकार कर गए। इन्हीं के कारण मैं फ़ेल हो गया। मेरी और आपकी सारी कोशिशें बेकार गईं। हमारे वीर-कुल के लिए यह बड़ी लज्जा की बात है। मुझसे आठवीं पीढ़ी में हमारे एक पूर्वज एक लड़ाई में हार गए थे, तो उन्होंने आत्महत्या कर ली थी। मैं भी विद्या के क्षेत्र में हार गया। मैं अपने उस यशस्वी पूर्वज का अनुसरण कर रहा हूं। मैं आपकी कोई सेवा नहीं कर सका। अंतिम समय आपको एक भेंट देना चाहता हूं। मेरे कमरे की आलमारी में 100 साल पुरानी शराब रखी है, जो मैंने जंगल महक़मे के फ़र्नाडीज़ साहब के मार्फ़त मंगाई थी। यह बहुत बढ़िया शराब है। इसे आप मेरी तुच्छ भेंट के रूप में स्वीकारें। इसे पीकर आप मेरा दु:ख भूल जाएंगे। अच्छा, अब मुझे आशीर्वाद दें कि उस लोक मंे पढ़ाई के झंझट से मुझे मुक्त रखा जाए। विदा! आपका अभागा बेटा अस्तभान। पुनश्च : आपने मेरी मित्र मिस सुरमादेवी से मेलजोल बढ़ाना चाहा था, जो मैंने नहीं बढ़ने दिया। अब आप बढ़ा सकते हैं। -अस्त.!’

इसके बाद अस्तभान ने अख़बारों के लिए एक बयान लिखा, जिसमें अपनी मृत्यु के कारणों पर प्रकाश डाला। उस युग की सामाजिक परिस्थतियों पर इस वक्तव्य से अच्छा प्रकाश पड़ता है- ‘...मैं इस दुनिया से बहुत दूर चला गया हूं, जहां, ऐ दुनिया वालो, तुम्हारा अन्याय मुझे नहीं छू सकता। पर मैं पूछता हूं कि क्या तुमने मेरे साथ अच्छा सलूक़ किया? मैं चाहे जितना पैसा ख़र्च कर सकता था, और बदले में एक छोटी-सी चीज़ चाहता था- बीए की डिग्री, जो लाखों को हर साल मुफ़्त मिल जाती है। मैं विश्वविद्यालयों से पूछता हूं, यह कहां का न्याय है कि जिन्हें दोनों जून खाने को नहीं मिलता, उन्हें तो डिग्री मिल जाती है और हम फ़ेल हो जाते हैं। हम, जिन्हें बिना परीक्षा के ही डिग्री दे देनी चाहिए, एक-एक नम्बर के लिए दर-दर भटकना पड़े, और जिनके पास फूटी कौड़ी नहीं है, वे घर बैठे नम्बर पा जाएं। घोर अन्याय है। मैं जानता हूं कि ऊंचे खानदानों के हज़ारों युवक यह अन्याय सहते हैं और चुप रहते हैं। मैं उन्हें धिक्कारता हूं। मेरी नसों में वीर-कुल का रक्त बहता है, इसलिए मैं इस अन्याय के विरोध में आत्महत्या कर रहा हूं। मेरे बलिदान से लोगों की आंखें खुलें और वे आगामी पीढ़ियों के लिए न्यायोचित व्यवस्था करें। मैं इस संबंध में निम्नलिखित सुझाव देता हूं, जिन पर विश्वविद्यालयों की एकेडेमिक कौंसिल विचार करें- 1. एक ख़ास आमदनी के ऊपर वालों के पुत्र-पुत्रियों को बिना परीक्षा लिए सम्मानपूर्ण डिग्रियां दे देने की व्यवस्था हो। 2. प्रति पेपर जो एक ख़ास रकम दे सके, उसे उस पेपर में नक़ल करने का सुभीता दिया जाए। इसके लिए उस विषय के जानकार प्रोफ़ेसरों को नक़ल कराने का काम सौंपा जाए और उन्हें इसका अलग अलाउंस मिले। 3. जिस तरह बाज़ार में और चीजे़ं बिकती हैं, उसी तरह नम्बर भी बिकें और जिसमें सामर्थ्य हो, वह नम्बर ख़रीद ले। अभी जो चल रहा है, वह बड़ा गलत है। सब धान बाइस पंसेरी तौला जाता है, जिसमें कितने ही होनहार युवकों का जीवन नष्ट हो जाता है। मुझे विश्वास है कि मेरा बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा और विद्या के क्षेत्र में न्याय की प्रतिष्ठा होगी। दस्तख़त : कुंअर अस्तभान सिंह।

अस्तभान थककर लेट गया। थोड़ी देर बाद मुफतलाल आया। उसने कहा, ‘कुमार, आत्महत्या के सम्बंध में मैंने जो खोज-बीन की है, उससे इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूूं कि आपको पानी में डूबकर आत्महत्या करनी चाहिए। परीक्षा और प्रेम में फ़ेल होने वाले जल-समाधि लेते हैं। साधारण आदमी तो चुल्लूभर पानी में डूबकर मर जाता है, पर आप जैसे महान व्यक्ति को अधिक पानी चाहिए। आपको भेड़ाघाट के जलप्रपात में कूदकर प्राण त्यागना चाहिए। मैंने नौकरों को हुक्म दे दिया है कि घाट पर कैम्प लगाएं और आवश्यक सामान वहां पहुंचाए। कल सुबह हम लोग वहां चलें और तीसरे पहर आप आत्महत्या कर लें।’ अस्तभान को योजना पसंद आई। वह तैयारी के सम्बंध मंे मुफतलाल से बात करने लगा। फिर उसने पत्र और वक्तव्य मुफतलाल को सौंपे। वह बुरी तरह थक गया था। जम्हाई लेकर कहा, ‘मित्र, मैं बहुत थक गया हूं। रात को अच्छी नींद भी नहीं आई। माथा भारी है। मैं ज़रा सो लूं। वरना तबियत ख़राब हो गई तो कार्यक्रम टालना पड़ेगा।’ मुफतलाल उठ बैठा। प्रणाम करके चला। सोचता जाता था कि ऐसी शांति संतों के लिए भी ईर्ष्या की वस्तु है। कल आत्महत्या करनी है और आज किस शांति की नींद ले रहे हैं। धन्य हो, राजकुमार! महापुरुष ऐसे ही होते हैं।

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