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कहानी:लाॅन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप और नए ज़माने के सम्बंधों का सजीव ब्योरा प्रस्तुत करती कहानी 'आख़िरी मुलाक़ात'

अंकिता भार्गव13 दिन पहले
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  • सोशल मीडिया चैटिंग और लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप के इस ज़माने में सम्बंधों का स्वरूप भी बदला है।
  • इसमें सबसे अहम चीज़ यह हुई है कि —अकसर लड़का और लड़की एक-दूसरे को देखे, जाने और मिले बिना ही भावनाएं जोड़ लेते हैं, फिर बाद में दुविधाओं से घिर जाते हैं।
  • संबंधों की इसी पृष्ठभूमि पर आधारित है यह कहानी, जिसमें नई पीढ़ी के जीवन के सजीव ब्योरे उभरकर आए हैं।

व न्या की नींद सुबह -सुबह फोन की मैसेज ट्यून से खुली। उसने आंखें मलते हुए फोन उठाया, इनबॉक्स में एक हाथ मटक रहा था। ‘ये लड़का भी न! कभी टाइप करने की ज़हमत नहीं उठाता, आधे से ज़्यादा बार तो इमोजी से काम चलाता है।’ वन्या ने बड़बड़ाते हुए गुड मॉर्निंग लिखा, थोड़ी देर में वन्या के स्क्रीन पर गुलदस्ता आ गया। ‘क्या कर रहे हो?’ वन्या ने पूछा तो जवाब में दिल धड़कने लगा। ‘कभी टाइप भी कर लिया करो।’ वन्या ने खीझकर कहा। ‘तुम्हें याद कर रहा हूं यार! इतना भी नहीं समझती। मैं तुमसे बातें करने के लिए तड़प रहा हूं और तुम हो कि मुझसे बात ही नहीं करना चाहतीं, जब देखो चिढ़ती रहती हो मुझ पर।’ इस बार सुमित ने इमोजी नहीं भेजी, बल्कि लिखकर शिकायत की। ‘चिढ़ूं नहीं तो और क्या करूं? बात कहां करते हो तुम, बस अलग-अलग तरह की इमोजी भेजते रहते हो। अनपढ़ तो नहीं हो! टाइप करना जानते हो और यह भी जानते हो कि मुझे इमोजीज़ से कितनी चिढ़ है।’ ‘इमोजी न भेजूं तो क्या करूं? जब भी बात करता हूं तुम मास्टरनी बन जाती हो। मैं तुमसे बात करना चाहता हूं और तुम मुझे वर्तनी की अशुद्धि पर ज्ञान पिलाने लगती हो।’ सुमित का जवाब पढ़ कर वन्या के होंठों पर हंसी आ गई। ‘अरे वाह! वर्तनी की अशुद्धि! क्या बात है, तुम तो सुधर गए।’ वन्या ने शरारत से कहा। ‘देख लो! तुम्हें इम्प्रेस करने के लिए क्या-क्या करना पड़ रहा है। पूरा गूगल छान मारा तब यह एक लाइन सीखी मैंने। अच्छा ये सब छोड़ो, ये बताओ क्या कर रही हो?’ कुछ देर ठहर कर सुमित ने पूछा। ‘हंस रही हूं। कहां तो मैं एक प्रसिद्ध चित्रकार बनना चाहती हूं और एक तुम हो कि मुझे मास्टरनी बना रहे हो।’ वन्या खिलखिलाई। ‘हरकतें तो तुम्हारी मास्टरनी जैसी ही हैं। ख़ैर छोड़ो ये सब चलो कुछ अच्छी बातें करते हैं।’ ‘कौन-सी अच्छी बातें? मुझसे हिंदी की ट्यूशन लेने का मन तो नहीं हो रहा न!’ वन्या ने सुमित को छेड़ा, जवाब में उसने गुस्से वाली इमोजी भेजी तो वह भी ठहाके वाली इमोजी भेजने से ख़ुद को रोक नहीं पाई। ‘बिगड़ रही हो आजकल।’ ‘हां तुम्हारी संगत का असर है।’ वन्या फिर खिलखिला दी। ‘अच्छा ये बताओ! आज की सारी तैयारी हो गई।’ ‘हां! कबकी!’ ‘देखना कहीं कुछ कमी न रह जाए।’ ‘नहीं कोई कमी नहीं रही। पापा ने सब चेक कर लिया, एग्ज़ीबिशन हॉल बुक हो गया। डेकोरेशन हो गया। मेरी पेंटिंग्स भी वहां लग गईं और मेहमानों के लिए जलपान का इंतज़ाम भी है। और….’ ‘वन्या! तुम कुछ भूल तो नहीं रही न?’ ‘नहीं सुमित, कुछ नहीं भूल रही। आज तो मैं कुछ भूल ही नहीं सकती! क्योंकि आज मेरी ज़िंदगी का बहुत बड़ा दिन है। आज... आज ही तो मेरी पेंटिंग्स की पहली एग्ज़ीबिशन लगने वाली है। पता है सुमित इस दिन का सपना मैंने बचपन से देखा है। इस एग्ज़ीबिशन में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।’ वन्या अपनी ही रौ में टाइप करती चली जा रही थी। ‘मैं एग्ज़ीबिशन की नहीं हमारी बात कर रहा था। आज हम भी तो पहली बार मिल रहे हैं! मुझे लगा शायद तुम भी हमारी इस डेट के लिए उतनी ही एक्साइटेड होगी जितना कि मैं।’ इस बार सुमित की ओर से आई इमोजी में ही नहीं उसके टाइप किए शब्दों में भी उदासी तारी थी। ‘हम दोस्त हैं सुमित! और दोस्त हमेशा ख़ास होते हैं! मैंने तुमसे मिलने के लिए आज का दिन चुना भी इसीलिए था क्योंकि मैं चाहती थी कि आज- मेरी ज़िंदगी के सबसे ख़ास दिन- मेरा सबसे अच्छा दोस्त मेरे साथ हो। और देखो हम मिल भी रहे हैं। मैं ख़ुश हूं इस बात से, बहुत ख़ुश। मगर एग्ज़ीबिशन का एक्साइटमेंट अलग है। तुम... तुम समझ रहे हो ना।’ ‘हां! समझ रहा हूं। चलो मैं बाद में बात करता हूं। तुम्हें फंक्शन की तैयारी भी करनी होगी। बाय!’ इसके साथ ही सुमित ऑफ़लाइन हो गया। कुछ पल को वन्या को लगा उसने सुमित के साथ ठीक नहीं किया, ‘वह बहुत ख़ुश था उनकी पहली मुलाकात को लेकर। ज़्यादा न सही, थोड़ा-सा उत्साह तो तुम भी जता ही सकती थीं।’ वन्या के दिल ने जैसे वन्या से कहा। ‘नहीं, मेरा उत्साह सुमित की उम्मीदें बढ़ा देता जो उसके लिए ग़लत होता। फिर आज वह एग्ज़ीबिशन में आ ही रहा है। आज की मुलाकात हमारी दोस्ती का भविष्य भी ख़ुद ही तय कर देगी।’ वन्या ने अपने मन को समझाया और इत्मीनान से लेट गई। इस समय उसकी आंखों में सुमित के साथ होने वाली मुलाकात- जिसे वह डेट कह रहा था- के नहीं बल्कि अपनी पेंटिंग्स की पहली एग्ज़ीबिशन की सफलता का सपना था और होंठों पर उस सपने के सच होते देखने की ख़ुशी मुस्कान बन कर खिल रही थी। उधर वन्या से चैट करके सुमित ने फोन एक तरफ़ पटक दिया। वह उदास था- ‘पता नहीं ये लड़कियां ख़ुद को क्या समझती हैं। ज़रा-सी तारीफ़ कर दो तो भाव खाने लग जाती हैं। मैं यहां ख़ुशी के मारे मरा जा रहा हूं कि आज मेरी और वन्या की पहली डेट है मगर उसे तो जैसे कोई फ़र्क ही नहीं पड़ रहा। अपनी पढ़ाई और हर काम छोड़कर मैं बस उसके बारे में सोच रहा हूं। मैं हमेशा कोशिश करता हूं वह मेरे साथ कंफ़र्टेबल फ़ील करे और हमारा रिश्ता मज़बूत हो सके। मगर उसने तो जैसे मेरी हर कोशिश को नाकाम करने की क़सम खा रखी है। उसे तो मुझसे, मेरी ख़ुशी से, जैसे कोई सरोकार ही नहीं है। उसे सरोकार है तो बस अपनी बनाई उन बेजान तस्वीरों से, जिन्हें देखकर लोग उसकी थोड़ी-सी प्रशंसा कर देते हैं। अगर उसे मेरी परवाह नहीं है तो मैं भी भला क्यों उसकी इतनी परवाह कर रहा हूं!’ सुमित उदास-सा अपने बिस्तर पर लेट गया। कुछ देर बाद वह फोन उठा कर फ़ेसबुक पर टाइम पास करने लगा; यूं ही जस्ट न्यूज़फ़ीड स्क्रोल। तभी उसने वन्या की उसकी एग्ज़ीबिशन से संबंधित पोस्ट देखी। वह वन्या को देखता ही रह गया! कितनी प्यारी-सी है! कितनी मासूम लगती है बिल्कुल बच्ची की तरह। सुमित मुस्करा दिया। वन्या पर उसका ग़ुस्सा धीरे-धीरे कम हो रहा था। उन्हें दोस्त बने दो साल हो गए थे। वह वन्या से एक कॉमन फ्रेंड धीरज के ज़रिए मिला था। बहुत ख़ूबसूरत नहीं है, साधारण-सा रंग-रूप है, मगर फिर भी जाने ऐसी कौन-सी कशिश थी कि सुमित की नज़रें ही नहीं हट रही थीं उसके चेहरे से। उसने भी वन्या को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी और फिर धीरे-धीरे दोनों की दोस्ती गहरी होती चली गई। वह वन्या की भोली-सी सूरत और मासूम मुस्कान का इस कदर दीवाना हो गया कि उसे अपनी ज़िंदगी का हिस्सा समझने लगा। गुज़रते वक़्त के साथ सुमित अपने और वन्या के रिश्ते को लेकर गंभीरता से सोचने लगा था। अब वन्या के प्रति उसकी भावनाएं केवल दोस्ती तक सीमित नहीं थीं बल्कि वह तो वन्या में अपने जीवनसाथी की छवि देखने लगा था। वह इस बारे में वन्या के विचार जानना चाहता था। उसने अपनी ओर से कोशिश भी बहुत की मगर वन्या तो कुछ समझना ही नहीं चाहती थी। कभी-कभी तो सुमित को लगता था कि जैसे वन्या उसकी भावनाओं से अवगत है बस नासमझ होने का दिखावा करती रहती है। मगर क्यों? बहुत सोचने के बाद भी उसे एक कारण नज़र नहीं आया। राजकुमार न सही दिखने में पर इतना बुरा भी नहीं था सुमित और अब तो अगले कुछ महीनों में उसकी अच्छे पैकेज वाली नौकरी भी लगने वाली थी। मल्टीनेशनल कंपनी में कैंपस प्लेसमेंट हो चुका था। बस एम-टेक के बाद ज्वॉइन करना बाक़ी था। एक लड़की को अपने पार्टनर मेंं और क्या चाहिए। मगर वन्या तो जैसे अलग ही दुनिया में रहती थी। उसे किसी से कुछ लेना-देना नहीं था। उसकी दुनिया उसकी बनाई पेंटिंग्स तक सिमटी हुई थी। या फिर यह भी हो सकता है कि वह भी सुमित को पसंद करती है मगर कह न पा रही हो। शायद नहीं, शायद नहीं पक्का यही बात है। कुछ लड़कियां अपनी भावनाएं खुलकर नहीं कह पातीं, डर जाती हैं! कभी परिवार से तो कभी समाज से। लोग क्या कहेंगे की दीवार अपने आसपास खड़ी कर लेती हैं। अब वन्या भी सुमित को कुछ ऐसी ही समस्या की शिकार लग रही थी। फिर सुमित को तो अब तक वन्या ने देखा भी नहीं था। सुमित और वन्या की मित्रता आभासी थी, फिर वह उस पर कैसे विश्वास कर लेती? सुमित ने घड़ी में समय देखा, ग्यारह बज रहे थे। वन्या की एग्ज़ीबिशन का समय हो रहा था। कुछ देर पहले तक तो उसने गु़स्से में एग्ज़ीबिशन में जाने का विचार छोड़ दिया था मगर अब वह वहां जाने को बेताब था। यह सुमित के लिए वन्या का विश्वास जीतने का एक सुनहरा मौक़ा था और इस अवसर को वह किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ना चाहता था।

सुमित जब होटल पहुंचा तो एग्ज़ीबिशन शुरू हो चुकी थी। हॉल में मौजूद लोगों के बीच उसकी आंखें वन्या को तलाश कर रही थीं। कुछ लोग पेंटिंग्स देखते हुए बातें कर रहे थे, ‘कितनी ख़ूबसूरत पेंटिंग्स हैं। हर पेंटिंग ख़ुद अपनी तारीफ़ कर रही है। लगता ही नहीं किसी सेरेब्रल पाल्सी से ग्रस्त लड़की ने बनाई हैं।’ उन लोगों की बातों पर सुमित को विश्वास नहीं हुआ, अब उसे वन्या का इंतज़ार था। जब वन्या मिली तो वह उसे देखकर हतप्रभ रह गया। गुलाबी सूट पहने व्हील चेयर पर बैठी वन्या बहुत प्यारी लग रही थी! हां सच! बहुत... बहुत प्यारी! वन्या ने उसकी ओर हाथ हिलाकर उसका स्वागत किया। सुमित भी उसे देखकर हौले से मुस्करा दिया। कुछ देर पहले तक सुमित वन्या से मिलने को लालायित था मगर अब उसके क़दम उठ ही नहीं रहे थे, किसी तरह ख़ुद को सहज दिखाने की कोशिश करते हुए वह वन्या की ओर बढ़ चला। वन्या उसे एग्ज़ीबिशन दिखाती रही, उससे बातें करती रही और वह बस हां-हूं करता रहा। वन्या जितनी सहज थी, सुमित उतना ही असहज। अब उसे समझ आ रहा था कि क्यों वन्या उसकी बातें सुनकर भी अनसुनी कर दिया करती थी। कुछ देर बाद वन्या ने उसे अपनी एक पेंटिंग गिफ्ट की। उस पर एक चिट लगी थी। सुमित ने उत्सुकता से वह चिट खोली। लिखा था- ‘एक बहुत प्यारे दोस्त के साथ एक ख़ूबसूरत आख़िरी मुलाकात की याद।’ सुमित ने आश्चर्य से वन्या की ओर देखा तो वह मुस्करा दी। वन्या को मुस्कराते देख सुमित सर झुकाकर एग्ज़ीबिशन हॉल से बाहर आ गया।

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