कवि-स्मृति:काका हाथरसी के काका बनने का क़िस्सा, 1906 में आज ही जन्मे थे हास्य कविताओं के मूर्धन्य कवि काका

14 दिन पहले
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  • हास्य कविताओं की फुलझड़ियां छोड़कर दशकों तक देश काे हंसाते रहे काका हाथरसी जगत काका कैसे बने, बता रहे हैं वे ख़ुद। आज 18 सितम्बर काकाजी की जयंती पर पाठकों के लिए प्रस्तुत है उनकी आत्मकथा ‘मेरा जीवन ए-वन’ से यह रोचक अंश।

दिन अट्ठारह सितंबर, अग्रवाल परिवार।
उन्नीस सौ छ: में लिया, काका ने अवतार।

हाथरस की रसीली हास्यमय धरती पर हमारा अवतरण शुभ मिति आश्विन कृष्ण 15 सं. 1963, दिनांक 18 सितंबर सन् 1906 ई. की मध्यरात्रि को हुआ। यदि 12 बजे से पूर्व हुआ तो 18 तारीख़ और 12 बजकर 1 सेकंड पर हुआ तो 19 सितंबर। ग़रीबी के कारण घर में घड़ी तो थी नहीं। हमारे पड़ोसी पं. दिवाकर जी शास्त्री ने 18 तारीख़ की शुभघड़ी क़ायम करके हमारी जन्मकुंडली बना डाली।

उन दिनों जन्म-मरण की सूचना नगरपालिका म्यूनिसिपैलिटी में घर की महतरानी दिया करती थी। अत: 19 सितंबर 1906 को ही नगरपालिका में ये शब्द अंकित हुए- ‘शिब्बो के लड़का हुआ है।’ मेरे पिताजी का नाम शिवलाल था, जिनको कुछ लोग शिब्बो जी कहा करते थे। जन्मदात्री माताजी का नाम था बर्फीदेवी। इतनी मीठी मैया की कोख से जन्म लेने वाले बालक मधुरस या हास्य रस से ओतप्रोत हुआ तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है!

भरी जवानी में जगत काका

अग्रसेन जयंती के अवसर पर हाथरस में नवयुवक अग्रवाल मंडल की ओर से ड्रामा तथा कवि-सम्मेलन हुआ करते थे। हमने दो छोटे-छोटे नाटकों- ‘आज की दुनिया’ और ‘समाज के आंसू’ में अभिनय किया। एक नाटक में हमको काका नाम के चौधरी की भूमिका मिली, जो विलेन जैसी थी। समाज-सुधारक युवक हमारे पास आकर जब चंदा मांगते थे तो हम उन्हें अपने विरोधी स्वरों के साथ-साथ डंडा दिखाते थे। फिर भी वे भागते नहीं थे, अड़ जाते थे। कहते थे, ‘काकाजी, हम लोगों ने मिल-जुलकर समाज में व्याप्त कुरीतियों और फिज़ूलख़र्ची को दूर करनेे का संकल्प लिया है। आपको पूर्वग्रह छोड़कर हमारी सहायता करके समाज के उद्धार में हाथ बंटाना चाहिए। इस सहयोग के लिए हम सबसे पहले आपके पास आए हैं, क्योंकि आप समाज के चौधरी हैं।’

हम उनसे पूछते, ‘क्या सहयोग दें? कौन-सी कुरीतियां दूर करोगे तुम लोग?’ लड़के कहते, ‘शादी-विवाहों में फूल-टट्‌टी, काग़ज़ी घोड़े और आतिशबाज़ी में जो धन और श्रम की बरबादी होती है, उस पर अंकुश लगाएंगे। किसी-किसी विवाह में जो दो-दो, तीन-तीन बैंड होते है, केवल एक ही बैंड रहेगा। इसके साथ ही साथ मृतक भोज भी बंद कराएंगे। इस देश जैसी मूर्खता अन्यत्र देखने को नहीं मिलेगी, जहां अपने बुजु़र्गों की मौत पर भी लोग जश्न मनाते हों। बढ़िया-बढ़िया दावत देकर सैकड़ों लोगों को बुलाते हों। हम ऐसी कुरीतियों को दूर करके ही रहेंगे।’

उनकी बातें सुनकर चौधरी रूप में काका एक ठहाका मारकर रावण जैसी हंसी का गोला छोड़ देते थे। फिर मूंछों पर हाथ फेरते हुए ब्रजभाषा में चौधराना अंदाज़ से बोलते, ‘अरे छोराऔ, चौं बावरे हैं रहे औ’, फिर खड़ी बोली में कहते, ‘तुम लोग अभी बच्चे हो अक़्ल के कच्चे हो। यह बताओ जब असली घोड़े अपने पास न हों तो काग़ज़ी घोड़े न कुछ खाते हैं और न पीते हैं फिर भी प्रभावशाली इतने होते हैं कि इनका रोब-दाब और चमक-दमक देखकर असली घोड़े पूंछ दबाकर भाग जाते हैं। आजकल तो असली से नक़ली का महत्व ज़्यादा है। दूसरी बात बैंड-बाजों की तुमने बताई सो सुनो मेरे भाई, जिसकी गांठ में होंगे पैसे उसे ख़र्च करने से कोई रोक सकेगा कैसे? तीसरी बात मृतक भोज बंद करने की तुम कह रहे हो, अपनी बचपनी भावना में बह रहे हो। जैसे-तैसे तो कोई बूढ़ा-टेढ़ा मरे फिर भी दावत खाने हम न जायं, यह कैसा न्याय? यदि मृतक भोज बंद हो जाएंगे तो हम जैसे चौधरियों को कौन पूछेगा?’

काका आगे बोलते, ‘हम ही तो उनके घर जा-जाकर बताते हैं कि कचौड़ी के आटे में मोयन (घी) कितना पड़ेगा? रायते में दही कितना खपेगा? दही के ऊपर की मलाई उतारकर ले जाने का अधिकार चौधरियों को होता है, क्योंकि दही की मलाई रायते में मिलाएं तो दावत खाने वालों को खांसी हो जाएगी। जनकल्याण के ये उसूल जब तुम समझ लोगे तब फिर विरोध नहीं करोगे।’

चौधरी-समुदाय पर ऐसे व्यंग्य-भरे डायलॉग मारकर काका चौधरी सुधारक युवकों को बिना कुछ दिए ही भगा देते। इसी प्रहसन में हमने लेन-देन के दहेजी लालचियों पर व्यंग्यात्मक तर्क-कुतर्क देकर दर्शनार्थियों को प्रभावित किया था। नाटकीय सफलता में हमको उन दिनों चांदी के मैडल, गिलास, तश्तरी आदि प्राप्त हुए जो ग़रीबी के दिनों में बेच खाए।

बात तो हमारे काका बनने की चल रही थी, उसी विषय पर पुन: आते हैं। ड्रामा सफल होने के बाद जब दूसरे दिन प्रात: हम बाज़ार में निकले तो इधर-उधर से आवाज़ें आने लगी, ‘देखो, वो जा रहा है काका।’ फिर हमें बुलाकर नाटक की प्रशंसा करते।

जो पहले प्रभु जी या गर्ग जी कहा करते थे, वे नाटक की भूमिका में अभिनय के बाद हमको काकाजी कहने लगे। इस प्रकार हमारे मन-मस्तिष्क में भी काका नाम जम गया। मित्रों की सलाह पर हमने उसमें हाथरसी और जोड़ दिया और हम काका हाथरसी के नाम से कविताएं लिखने लगे। फिर तो हाथरस के कवियों-शायरों में नाम के साथ हाथरसी लगाने की ऐसी होड़ लगी कि आज यहां लगभग 25 कवि नाम के साथ हाथरसी जोड़कर इस नगर को धन्य कर रहे हैं। बनारस में भी बहुत से कवि अपने नाम के आगे-पीछे बनारसी लगाते हैं। भारत में ऐसे शहर केवल दो ही हैं जो रस से रससिक्त हैं- हाथरस और बनारस।

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