कहानी:बिटिया की शादी के प्रश्न और ग्रामीण जीवन का रेखाचित्र खींचती कहानी 'पंडित जी की बिटिया'

सुनीता मिश्रा6 महीने पहले
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  • एक परम्परागत परिवार में जहां अनेक प्रश्न होते हैं, वहीं एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी होता है कि बिटिया को कहां और कैसे ठीक से ब्याहें।
  • यही इस कहानी की भी अंतर्वस्तु है।
  • किंतु इसके माध्यम से एक ब्राह्मण परिवार के घर-संसार के आत्मीय ब्योरे और सम्बंधों के अनेक आयाम कहानी पंडित जी की बिटिया में खुलकर सामने चले आए हैं...

पंडित त्रिलोकी प्रसाद मिसिर स्त्री जाति का बहुत सम्मान करते थे। वे उनके लिए कभी अपशब्द का प्रयोग नहींं करते। स्त्री जाति को वे देवी का रूप मानते। इस बात पर उनका पूरा विश्वास था जिस घर में नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं।

वे अक्सर बनवारी माली, रघु खटीक, ठाकुर हरिसिंग को समझाते कि बात-बेबात औरतों पर हाथ उठाना ठीक नहींं। गाली तो भूल के भी बको मत। ये बात दीगर कि इन मर्दों ने पंडित जी की समझाइश हमेशा इस कान सुनी उस कान निकाली। पंडित जी के घर मेंं भी तीन स्त्रियां थीं। उनकी अन्नपूर्णा, पतिव्रता पत्नी पार्वती। सुघड़ सलोनी, बेटे विक्रम की पत्नी, उनकी बहू लक्ष्मी। और सबकी दुलारी सरस्वती का रूप, बिटिया पूनम।

पंडित जी ने कभी भी इन तीनोंं से ऊंचे सुर में भी बात नहींं की, मारपीट और गाली-गलौज तो दूर की बात। उन्हें इन तीनों से कोई शिकायत भी नहींं थी। पत्नी कुशल गृहिणी थी। बहू, सास-ससुर की सेवा में कमी नहींं रखती थी, और बिटिया कुशाग्र बुद्धि की, गृहकार्य में दक्ष, दसवीं में अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण, आगे पढ़ने की इच्छुक लड़की थी। लेकिन पंडित जी ने उसे आगे पढ़ने न दिया। क़स्बे में एक ही इंटर कॉलेज था, वो भी को-एड। लड़के लड़की सह शिक्षा लें, पंडित जी को पसंद नहींं था। ज़्यादा दिन न हुए होंगे, दीनानाथ हलवाई की बिटिया कॉलेज के सहपाठी के साथ भाग गई। राम-राम! दीनू का पूरा परिवार मारे शर्म के कई दिनों तक किसी से सर उठा के बात न कर पाया। पढ़ाई होती है कि प्रेम का पाठ सिखाते हैं मास्टर लोग लड़के-लड़किन को?

यही कारण रहा कि पूनम घर बिठा ली गई।

पंडित जी को शिकायत थी अपने बेटे विक्रम से। ग्रेजुएट क्या हुआ, दिमाग़ ही सड़ गया उसका। पुश्तैनी काम में उसे शर्म आती है। बताए कोई, पूजा-पाठ करवाना शर्म की बात है। अरे मिसिर ख़ानदान के पुरखे यही तो करते आ रहे हैं। इसी की बदौलत ईश्वर की उन पर कृपा रही। आज तीन मंज़िल हवेली तनी है उनकी। चार-चार दुधारी गाएं बंधी हैं आंगन मेंं। कोठार भरा है अनाज से।

उनकी पंडिताई को पूरा क़स्बा क्या आसपास के गांव के लोग पूजते हैं। कितना आदर-मान है उनके ख़ानदान का। सतनरायन पूजा, जन्म, जनेऊ, शादी-ब्याह सारे संस्कार, सब जगह पंडित त्रिलोकी प्रसाद की गुहार लगती।

भागवत कथा बांचने में तो उनके जैसा कोई नहींं। इसीलिए उनकी दक्षिणा आसपास के दस गांव के भागवत कथावाचकों मेंं सबसे ऊंची है। जब झूमकर भावविभोर हो श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन करते हैं तो पूरा भक्त समुदाय उस रस में सरोबार हो जाता है। रुक्मणी विवाह में महिलाएं छप्पन भोग बनाकर लाती और अर्पित करती हैं कन्हैया को। एक उंगली में उठा लिया था गोवर्धन। भक्तों की रक्षा को दौड़ पड़े थे गिरिधर। श्रोतागण कथा के नवरस के भाव-समुद्र में ग़ोता खाते। आसान नहींं है कथा के रंग मेंं विशाल भक्तजनों के समूह को रंग देना। यूं ही भागवत कथा के लिए कोई इतनी मोटी रक़म नहींं दे देता। भीड़ जुटाने और भक्तों का मनोविज्ञान समझने की क्षमता हर किसी के बस की नहींं।

विक्रम के कहां समझ में आई ये बात। वो तो रट लगाए रहा कि बिज़नेस करेगा। अगर ज़ोर-ज़बरदस्ती की तो घर से भाग जाएगा। आख़िर की उसने अपने मन की ही। केबल का बिज़नेस शुरू कर दिया। क़स्बे में घर-घर टीवी था। उसका बिज़नेस तरक़्क़ी करने लगा। वो ख़ुश था, मनपसंद काम था। पंडित जी ने उसकी ओर से चुप्पी साध ली। बाप-बेटे एक-दूसरे से कटे-से रहते। विक्रम का पहनावा, बालों की स्टाइलिश कटिंग... चुटिया तो कॉलेज जाते ही कटवा ली थी... देखकर बेबस रह जाते पंडित जी। जानते थे जवान बेटे से उलझना ठीक नहींं। …

समय अपनी गति से चल रहा था। अचानक एक मोड़ ने दिशा बदली। विक्रम ने एलान कर दिया कि वो पत्नी को लेकर कानपुर छोटी बुआ के यहां चला जाएगा। इस बार लक्ष्मी की प्रेग्नेंसी को लेकर कोई रिस्क नहींं लेना चाहता। पिछली बार जो हुआ, उसने पूरे परिवार को तोड़कर रख दिया था। लक्ष्मी तो बिल्कुल टूट गई थी। चुपचाप, गुमसुम-सी रहती।

पहली-पहली प्रसव पीड़ा, शिशु का जन्म से पूर्व कोख में ही दम तोड़ लेना, यह उसका कोमल मन बर्दाश्त नहींं कर पाया था। इस बार वह बहुत डरी हुई थी। कानपुर बुआ सास के यहां जाने की ज़िद पकड़े थी।

हुआ यूं था कि पहली बार जब लक्ष्मी गर्भवती हुई, उस समय भी छोटी बुआ ने कहा था पार्वती से- भाभी, यहां क़स्बे के अस्पताल में कोई डाक्टरनी नहींं है। बहू को कानपुर के अस्पताल में ही दिखा देते हैं। डिलीवरी भी वहीं हो जाएगी। घर है अपना, सब इंतज़ाम हो जाएगा।

कानपुर के बड़े मकान में रहने वाले दो प्राणी, बाल-बच्चे हुए नहींं। बड़ी इच्छा थी बुआ की विक्रम या पूनम किसी एक को गोद लेने की। पर न पार्वती राज़ी हुई न पंडित जी। तय हुआ लक्ष्मी के जैसे ही नौवां महीना लगेगा, डिलीवरी के लिए विक्रम, लक्ष्मी और पार्वती कानपुर चले जाएंगे। लेकिन आदमी सोचता कुछ है और विधना के मन कछु और। अचानक रात के समय लक्ष्मी दर्द से तड़पने लगी। अनुभवहीन लक्ष्मी की असहनीय पीड़ा देख सभी घबरा गए। ऐसे समय क्या करें, किसी की समझ नहींं आ रहा था। उधर लक्ष्मी पेट पकड़े दर्द से छटपटा रही थी। कुछ न सूझा तो पंडित जी पार्वती से बोले- विक्रम से कहो रामदेई अम्मा को बुला लाए।

विक्रम हिचकिचाया- बाबूजी, वो दाई है, डॉक्टर नहींं।

– बहुत अनुभवी है। तुम और पूनम उसी के हाथ के जन्मे हो। अब सोचने-समझने का टाइम नहींं है मुन्ना। दौड़ जा, इस आधी रात के बखत उसी का आसरा है। अनुभवी रामदेई मौक़े की गम्भीरता पहचान गई। बहू का सतमासा है। बहुत सावधानी बरती उसने, किसी तरह बहू को तो बचा लिया पर बच्चे को न बचा पाई। विक्रम ने अपना सारा बिज़नेस समेट लिया। उसने तय कर लिया कि वो और लक्ष्मी कानपुर ही रहेंगे। वो अपना कारोबार कानपुर में ही डाल लेगा। ये फ़ैसला उसने पार्वती और पंडित जी को भी सुना दिया।

बेटे और बहू के जाने के बाद पार्वती का मन भी उचाट हो गया। अकेली पार्वती क्या, पूनम और पंडित जी का भी यही हाल था। भले ही प्रकट में कोई किसी से कुछ न कहता हो। पंडित जी ने अब कथा, पूजापाठ के आमंत्रण भी स्वीकारना कम कर दिए थे। बस अब उनकी इच्छा थी कि कोई सुपात्र खोज पूनम के हाथ पीले कर दें। पर सुपात्र पाना इतना सरल नहींं। कहीं पूनम की कुंडली मेल नहींं होती थी। कहीं पूनम का मांगलिक होना आड़े आता। अगर सब ठीक होता तो दहेज़ की मांग इतनी ऊंची होती कि पंडित जी के बस के बाहर रहती। चलिए किसी तरह दहेज़ की रक़म का जुगाड़ कर भी लें तो वर-ख़ानदान भी तो इस लायक़ हो। …

आज भी पंडित जी जब पूनम के सम्बंध के बारे में एक जगह से निराश हो घर लौट रहे थे तो उन्होंने देखा कि उनके मकान से पचास मीटर की दूरी पर सुबोध सहाय की हवेली में बड़ी रौनक़ थी। ये हवेली पिछले पांच सालों से सुबोध जी और उनकी पत्नी के देहांत के बाद से बंद पड़ी थी। सुबोध जी के एक ही बिटिया थी ऋतु, जिसकी शादी पार्वती के पीहर के गांव में किसी राय ख़ानदान में हुई थी।

– पार्वती, आज सहाय हवेली में बड़ी रौनक है। क्या बात है पता है तुम्हें? पंडित जी ने घर पहुंचते ही पत्नी से पूछा।

– हां, ऋतु और उसके दूल्हा अब यहीं आकर रहेंगे। दोनों ही हैं। एक बेटा है जो लखनऊ में नौकरी करता है। किसी दफ्तर में अफसर है। बनवारी भइय्या आय रहे थे आज, बगिया बुहारने, वोई बताय रहे। पार्वती ने कहा।

– चलो, भूतन-सी हवेली में इन्सानन का डेरा हुई जाई, कहते हुए पंडित जी हाथ-मुंह धोने घिनौची की ओर बढ़े, उन्हें तौलिया पकड़ाते हुए पार्वती ने रसोई में जा चाय का पानी चूल्हे पर रख दिया।

चाय और तश्तरी में मठरी ले, आंगन में खटिया पर बैठे पति के सामने, छोटी-सी टेबल खींच, उस पर नाश्ता रख वहीं ज़मीन पर बैठ गई। बोली, कुछ जमा क्या? – अरे कहां पूनो की मां। लड़के तो बहुत हैं पर पूनम के लायक नहींं।

– ऋतु और उसके दूल्हा आ जाएंगे तो सहाय हवेली के भाग जग जाएंगे, पार्वती ने बात दूसरी ओर मोड़ दी।

– सो तो है, शंभूनाथ राय तुम्हारे पड़ोसी रहे न।

– पड़ोसी तो नहींं, पर गांव के हैं। हां, कारज में बुलौआ-चलौआ जरूर होत रहा।

– ऋतु का दूल्हा सज्जन आदमी है।

– एलो, आप कैसे कह रहे हैं, मिले रहे का उन से?

– ऋतु के बियाह में देखे रहे, तुम्हूं तो रही न सहाय के हियां शादी में।

– हम कहां जाय पायी, अम्मां जी गई रहीं। विक्रम हथे न पेट मेंं, पर आप कैसे कह रहे कि ऋतु के दूल्हा शंभूनाथ सज्जन आदमी हैं?

– अरे पार्वती, काय से की तुमाये गांव का नाम सज्जनपुर है न, कहते हुए पंडित जी हो-हो करके हंस पड़े।

-आपौ न, अब बुढ़ऊती में ठिठोली! शर्मा गई पार्वती, गाल में पड़ते हुए गड्ढों पर डूबते सूरज की किरणें पड़ रही थीं। पंडित जी ने धीरे-से पार्वती के गालों को छू लिया। कुछ देर पहले की उबाऊ नीरसता, फीकी हो गई। …

ऐसी बात नहींं कि पार्वती, शंभूनाथ से अपरिचित हो। एक ही पाठशाला मेंं पढ़ते थे दोनोंं। शंभू अनाज देकर कृपा चच्चा की दुकान से लेमनचूस लाता और पार्वती को देता। जेब में भरकर ख़ूब सारी बेरी, इमली लाकर उसे देता। उसकी स्लेट-पट्टी साफ़ कर देता। सवाल पार्वती से नहीं बनते तो मास्टर जी की नज़र बचाकर सवाल हल कर देता। पार्वती को भी बहुत बुरा लगता, जब शंभू की किसी ग़लती पर मास्टर जी उसके कान खींचते या मुर्ग़ा बनाते। ऐसे समय वो भगवान से मन ही मन प्रार्थना करती कि मास्टरजी को ताप आ जाए, नहींं तो भूरा कुत्ता काट ले।

मास्टर जी और भूरे कुत्ते में ख़ासी दुश्मनी थी। भूरे का उन पर भौंकना और मास्टर जी का दूर से उसे लाठी दिखाकर दुर-दुर करना बच्चों के मनोरंजन का साधन था। आज भी उन भूली-बिसरी यादों को याद कर पार्वती मुस्करा दी।

प्रेम के भावों को जब तक पार्वती समझ पाती त्रिलोकी प्रसाद के साथ उसके सात फेरे लग गए।

सुबह-सुबह ही ऋतु और शम्भूनाथ ने पंडित जी के दरवाज़े पर दस्तक दी। सामान्य शिष्टाचार के बाद दोनोंं ने बताया कि उन्हें घर पर पूजा-अर्चन करवाना है। इस समय बेटा राजेश भी आया है। दो दिन बाद पूरनमासी भी है, उसी दिन सत्यनारायण की कथा, पूजा और रिश्तेदारों, परिचितों का भोजन प्रसाद भी हो जाए।

– तो तय रहा दादा, आपको ही पूजा करवानी है, ऋतु ने त्रिवेणी प्रसाद को परिवार सहित निमंत्रण और पूजा का कार्य सौंप दिया। ऋतु ने त्रिवेणी प्रसाद को दादा कहा तो शम्भूनाथ ने भी उन्हें बड़े भाई का सम्मान दिया। और ये मुलाक़ात दोनों परिवारों में घनिष्ठता ले आई। …

जब भी राजेश सहाय हवेली आता, पंडित जी के घर ज़रूर जाता। पूनम के लिए, कभी शरत, बंकिम साहित्य, कभी प्रेमचंद, की किताबें लाता। पार्वती ने नोटिस किया, जो बिटिया मुरझाई-सी रहती थी, अब राजेश के आने पर खिली-खिली रहती है। बेटी का मन मां ने पढ़ लिया था। उस पर पक्की सील तब लगी, जब ऋतु ने पार्वती से एक दिन कहा- भाभी, राजेश को पूनम अच्छी लगती है। आप और दादा की आज्ञा हो तो पूनम को हम अपने घर की लक्ष्मी बना लें।

– ऋतु, मैं तुम्हारे दादा से बात करूंगी, पार्वती ने उस समय बात टाल दी।

पूनम की बढ़ती उम्र, उसकी हमउम्र सभी लड़कियां अपने-अपने घर-बार की हो गई थीं। कुछ की गोद में तो बच्चे भी खेलने लगे थे। लेकिन पूनम का रिश्ता कहीं तय नहींं हो पा रहा था। पार्वती को उसकी चिंता सताने लगी थी।

पूनम उम्र के उस पड़ाव पर थी, जब किसी लड़की का मन और देह दोनों ही एक साथी का सामीप्य चाहते हैं। आख़िर मां से बढ़कर बेटी के मन को कौन टटोल सकता है।

एक दिन समय को अनुकूल देख वो पति से बोली- सुनो जी, आज सहाय हवेली से ऋतु आई रही।

– अच्छा, कोई काम रहा क्या?

– हां, कह रही थी कि राजेश, पूनम को बहुत पसंद करता है। वो दोनोंं भी इस रिश्ते के लिए तैयार हैं। बड़ी बात ये कि राजेश भी मांगलिक है, डरते-डरते पार्वती ने ऋतु का सहारा ले अपने मन की बात रखी।

– वो बोली और तुम चुप रहीं? तुमने सोचा हम तैयार हो जाएंगे? सठिया गईं क्या। जात-कुजात का ज्ञान ही नहीं रहा। अरे हम तो कनोजियों से बाहर भी न बिटिया ब्याहें, फिर वो लोग तो... मारे क्रोध के पंडित जी की कनपटी तक लाल हो गई।

धक रह गई पार्वती। इतना क्रोध और इतना ऊंचा बोलते उसने कभी पति को नहींं सुना था। इतने साल का साथ, और वो अपने पति को जान न पाई। उनको इतना कष्ट पहुंचाया। पार्वती सारी रात करवटें बदलती रही। बड़ा अपराध हुआ उससे।

सुबह पंडित जी अपने नियत समय पर उठे। असनान-ध्यान किया। पूजा-पाठ कर बैठके में पहुंचे। पार्वती गरम दूध का गिलास ले उनके पास गई। पंडित जी ने पार्वती का विवर्ण मुख देखा तो जान गए कि वह रात भर सोई नहींं। नींद तो उन्हें भी रात भर नहींं आई। कल का व्यवहार उन्हें सारी रात क्षोभ और ग्लानि देता रहा। पश्चाताप की आग में उनकी आत्मा झुलसती रही।

पार्वती दूध का गिलास उनके हाथ में देकर जैसे ही जाने को मुड़ी, उन्होंने हाथ पकड़ लिया। पास बिठाया। बोले- पार्वती, कल अपने व्यवहार के लिए मैं तुम्हारा अपराधी हूं। क्षमा मांगता हूं। मुझे उत्तेजित नहींं होना चाहिए था, तुमने तो अपनी बात रखी थी।

पार्वती थोड़ा संयत हुई।

– नहींं आप ऐसा बोलकर काहे हमें पाप का भागी बना रहे हैं, वो आपकी परेशानी, पूनो का उदास चेहरा देख हमारा मन बहुत दु:खी हुआ तो हम बोल दिए। फिर पति के चेहरे की ओर देखा, हिम्मत कर आगे बोली- ऋतु ने जब पूनो के रिश्ते की बात की तो हम पहिले मुन्ना, बहू और बीबी रानी को बताए, उनकी मंसा जानी। वे तीनों इस रिश्ते को तैयार थे। पर आपसे आज्ञा लेने की कोई हिम्मत न कर पा रहा था। वो जाने कैसे हमई कल आपसे बोल दिए।

थोड़ी देर दोनों के बीच ख़ामोशी छाई रही।

– पार्वती, त्रिलोकी प्रसाद ने ख़ामोशी तोड़ी- अब तक गलत हम ही रहे। हमने स्त्री जाति को देवी माना, उसे देवी समझ पूजा, यही गलती रही हमारी। फिर थोड़ा ठहरकर बोले- स्त्री को बराबर का दर्जा देना, उसके मन को पढ़ना, उसकी भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। वो कोई पत्थर की मूरत नहींं कि उसे पूजें।

पार्वती ने अपने पति का ऐसा रूप तो कभी नहींं देखा था। आज त्रिलोकी प्रसाद उसे पति देवता नहींं, जीवनसाथी लगे।

– अब खड़ी न रहो, जाके तैयार हो के आओ, सहाय हवेली चलना है। बिटिया का रिश्ता पक्का करना है न, पंडित जी ने अपनी बात पूरी की।

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