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कहानी:होमोफोबिया जैसे अनछुए विषय पर मां-बेटे के रिश्ते में बुनी ख़ूबसूरत कहानी 'ट्रॉफ़ी'

डॉ. नीलकमल कपूर13 दिन पहले
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  • मनुष्य को प्रकृति ने जैसा बनाया, वैसा ही वह सम्पूर्ण है, और उसे मिलने वाली जीवन की ट्रॉफ़ी हमेशा विजेता की होती है उपविजेता की नहीं - इसी बात को यह कहानी एक दिलचस्प सिलसिले में बयान करती है।
  • बॉडी-शेमिंग और होमोफ़ोबिया- ये ऐसे विषय हैं, जिन पर कहानी-लेखन कम ही हुआ है। यह कहानी साहस के साथ एक अनछुए विषय को उठाकर उसे सराहनीय संरचना में बुनती है।

रो हन बहुत ध्यान से अम्मा के चेहरे को देख रहा था और अम्मा का पूरा ध्यान टेलीविज़न की स्क्रीन पर लगा हुआ था। वर्ष था 2005, स्क्रीन पर विम्बलडन लॉन टेनिस प्रतियोगिता का फ़ाइनल चल रहा था- रॉजर फ़ेडरर और आंद्रे अगासी के बीच। एक शोर उठा और अगासी हार गया। पुरस्कार वितरण के समय भी अम्मा की आंखें टीवी से हटी नहीं थीं, लेकिन एक छाया-सी उनके चेहरे पर तैर रही थी, जब रनर्स अप की ट्रॉफ़ी मिली। रोहन से अब न रहा गया। वो बोल ही बैठा- ‘क्या हुआ अम्मा, ऐसे क्यूं देख रही हो। अगासी इतना अच्छा लगता है क्या तुम्हें’? अम्मा ने उसकी ओर नज़रें घुमाईं और कुछ उदास-सी मुस्कान के साथ कहा- ‘हूं, बेचारा अगासी, कुछ भी हो मगर है तो यह हारने की ही ट्रॉफ़ी’। ये सुन कर रोहन को तो हंसी ही आ गई- ‘क्या अम्मा, इस हार के भी अगासी को मिलियंस में डॉलर मिले हैं’। अम्मा भी उसकी तरफ़ देख कर हंस दीं और बालों पर हाथ फेरकर बोलीं- ‘मेरा तो मिलियन डॉलर है तू। — रोहन अपने तीन भाई-बहनों में सबसे छोटा था और मां का सबसे दुलारा। वैसे उसकी दुनिया भी अम्मा ही थीं। लुनाई लिया गोल-सा चेहरा, सांवला मगर चमकता हुआ रंग और चौड़े माथे पर सजी गोल बिंदी वाली अम्मा। अम्मा के बाल भी ख़ूब लम्बे थे, जिन्हें वो बड़े सलीक़े से ढलके हुए जूड़े में संवार के रखती थीं। रोज़ सलीके से बंधी हुई साड़ियां बदल कर पहनने वाली रोहन की प्यारी अम्मा। वैसे तो अम्मा ज़्यादा बोलती नहीं थीं मगर रोहन और उनकी बातें और गपशप तो चलती रहती थीं। अम्मा रोहन को आस-पड़ोस के क़िस्से सुनातीं तो कभी अपने बचपन के बारे में बताती थीं। कैसे वे स्कूल के हर एक फ़ंक्शन में हमेशा डांस के लिए चुनी जाती थीं और क्विज़ भी हमेशा उनकी ही टीम जीतती थी। अम्मा ने ही बताया था कि उनके पापा के क्लब में लॉन टेनिस के कोर्ट्स थे और वे वहां नियमित खेलती थीं। वे लॉन टेनिस भी बहुत अच्छा खेलती थीं इसलिए अगर हफ्ता भर भी खेलने ना जाएं तो पार्टनर्स का बुलावा आ जाता था। बस जब रोहन अम्मा से पूछता था कि अम्मा अब क्यों नहीं खेलतीं, तो अम्मा कभी मुस्करा कर चुप लगा जातीं या कभी किसी काम के बहाने इधर-उधर हो लेतीं। रोहन को यूं तो दीदी और भैया के साथ भी बहुत मज़ा आता था मगर जब मुन्नी मासी आती थीं तब तो घर एकदम गुलज़ार ही हो जाता था। मुन्नी मासी यानी अम्मा की छोटी बहन। गोरी-चिट्टी मुन्नी मासी भर-भर के गिफ्ट्स लाती थीं, ढेरों चुटकुले सुनाती थीं। आत्मविश्वास या यूं कहें कि अति आत्मविश्वास का भण्डार थीं वो जिसकी पराकाष्ठा तो दादागिरी या दीदीगिरी की हद तक थी। आप मांगें या न मांगें, उनके पास हमेशा सबके लिए सलाहों का पुलिंदा रहता था। और अगर उन्ही दिनों नानी भी आई हुई हों तो घर में दिन भर जमकर गपाष्टक-गोष्ठी लगी रहती थी। नानी अम्मा और उनके भाई-बहनों के बचपन के क़िस्से सुना-सुना कर ख़ूब हंसाती। हां, उन क़िस्सों में बहुत बार अम्मा और मुन्नी मासी के रूप-रंग के बीच का तुलनात्मक अध्ययन और फिर उससे उपजी हंसी जब कमरे में भर उठती, तब रोहन को होंठों से हंसती अम्मा की आंखों में हंसी नहीं दिखाई देती थी। कुछ कुछ वैसे ही जैसे जब कोई किसी स्पोर्ट्स टूर्नामेंट में रनर्स-अप का इनाम लेने आता था। रोहन जैसे सपनों की दुनिया से चिहुंक कर जागा। उफ़ कितना समय बीत गया उन दिनों को, उन बातों को। आज दो साल हो गए हैं अम्मा से मिले हुए। पहले तो ऐसा हो ही नहीं सकता था। मगर जब से रोहन ने अपने आप को समझना और पहचानना शुरू किया और फिर उसके बाद उसने सबको बताया। नहीं… नहीं, पहले अम्मा को, फिर पापा को, और फिर बाक़ी सब को, तब से मानो सारी सृष्टि ही उलट-पलट हो गई। —

मैं ‘गे’ हूं- इन तीन शब्दों में इतना बड़ा भूचाल छिपा होगा, रोहन को नहीं मालूम था। और अम्मा, उसकी प्यारी अम्मा की प्रतिक्रिया तो भयावह थी। हफ्ते भर के अबोले के बाद पहले तो वे रोहन को शहर के सबसे बड़े मनोरोग विशेषज्ञ के पास ले गईं। मगर जब उसने उनके मन मुआफ़िक बात न कही तो चिकित्सक को कोसते हुए उन्होंने रोहन को एक विख्यात धर्म गुरुजी के पास पहुंचा दिया। उनके प्रवचनों से भी जब रोहन का कोई उपचार न हुआ तो वे रोहन को झाड़ने-फूंकने वाले ओझा के पास ले गईं। वहां जो हुआ उसके बाद तो रोहन जैसे पढ़े-लिखे, अच्छी ज़िम्मेदार नौकरी करने वाले पुरुष के लिए घर पर रहना असंभव हो गया। एक झटके में सब टूट गया, सब छूट गया। उसी दम रोहन ने सोच लिया कि बहुत हो गया अब और नहीं। वो सबको छोड़ निकल गया- अम्मा को भी।

— आज रोहन अपने किचन में अनमना-सा सलाद और स्नैक्स के साथ पार्टी की तैयारी कर रहा था। दरअसल आज ही की तारीख़ को क़रीब तीन साल पहले उसने अपने ‘गे’ होने की घोषणा की थी। उसके सब मित्र उसके पीछे पड़ गए थे कि इस तारीख़ को कुछ पार्टी-शार्टी होनी चाहिए। रोहन जब घर छोड़ कर निकला था तब उसे लगा था कि ज़िंदगी पटरी पर आ जाएगी। पिछले महीनों की घुटन कुछ कम हो जाएगी। ऊपरी तौर पर ऐसा हुआ भी लेकिन दिल के भीतर एक अजीब सन्नाटा और सूनापन भी घर किए बैठा था। जैसे आंख के सामने कोई तेज़ चमकदार और धमाकेदार पटाखा फटने के बाद अंधेरा और कान सुन्न होने का अहसास बना रहता है। पिछले दो साल में उसके अपने जैसे नए दोस्त भी बने और पार्टनर भी मिले लेकिन किसी से भी रिश्ता ज़्यादा चल न सका। पता नहीं क्यों सामने वाले को वह रिश्ते की गहराई का भरोसा ही नहीं दिला पाता था। सच बात तो ये है कि जैसे रोहन किसी अदृश्य रस्सी से अपने परिवार से और ख़ासकर अम्मा से बंधा हुआ था। और वो रस्सी उसे ज़रा भी आगे बढ़ते ही वापस खींच देती थी। रोहन की तो आज भी पार्टी करने की कोई इच्छा नहीं थी मगर अब थोड़ी-बहुत दुनियादारी भी निभानी पड़ती है सो वह मान गया। दरवाज़े की घंटी बजी। सामने निशांत खड़ा था। ‘अरे यार मैं थोड़ा जल्दी आ गया, सोचा थोड़ा तुम्हारी मदद कर दूं’, कहते हुए निशांत अंदर आ गया। ‘वेलकम माय डियर’, रोहन ने चेहरे पर मुस्कान चढ़ाते हुए कहा। ‘तुम ये खीरे-टमाटर सम्हालो, मैं थोड़ा-सा खाने की ऑर्डरिंग कर देता हूं और फिर आकर स्नैक्स देखता हूं’। थोड़ी-सी ही देर बाद कॉलबेल फिर बजी। ‘वाह भाई आज तो सुपर फ़ास्ट फ़ूड डिलीवरी हो गई, फ़ाइव स्टार्स देने पड़ेंगे,’ कहता हुआ रोहन दरवाज़े की तरफ़ बढ़ गया। मगर यह क्या- दरवाज़ा खोलते ही देखा कि सामने अम्मा खड़ी थीं। माथे पर वो ही दमदमाती लाल बिंदी, गर्दन पर ढलका-सा जूड़ा और कलफ़ लगी बुर्राक सफ़ेद पर नीले बॉर्डर वाली रोहन की पसंदीदा साड़ी। एक क्षण को तो रोहन को लगा कि वो सपना देख रहा है और दूसरे ही पल वो अम्मा की बांहों में था जैसे कि कभी कुछ हुआ ही नही हो। वो दोनों कब तक दरवाज़े पर खड़े रहे, इसका तो कोई हिसाब उन्हें नहीं मालूम, लेकिन जब निशांत यह देखने निकला कि रोहन खाना अभी तक किचन में क्यों नहीं लाया तब उनकी तंद्रा टूटी। निशांत को समझ में तो कुछ नहीं आया मगर वह फिर से उलटे पैरों किचन को वापस हो गया। — अम्मा अंदर आ गई थीं। रोहन उन्हें सोफे पर बैठाकर उनके पैरों के पास नीचे कालीन पर बैठ गया। अब भी एक चुप्पी पूरे घर पर पसरी हुई थी। अम्मा धीरे-धीरे रोहन के सर पर हाथ फेर रहीं थीं। उन्होंने ही चुप्पी तोड़ी, ‘अच्छा दिख रहा है तू’। रोहन ने मन में सोचा बस बाहर से ही अम्मा। अम्मा फिर बोलीं, ‘आज ही के दिन तूने मुझे बताया था। मुझे याद है।’ रोहन कुछ न बोला, बस टुकुर-टुकुर अम्मा को ताकता रहा। अम्मा बोलती गईं- ‘जब तूने मुझे बताया कि तू ‘गे’ है तो मुझे ऐसा झटका लगा था कि मुझे किसी ने अचानक ही एक अंतहीन कुएं के भीतर धकेल दिया हो। गहन पीड़ा और अवसाद की लहरों के बीच मैं तड़प रही थी। यूं लगता था मानो सांस ही नहीं आ रही हो। मेरा सबसे प्रिय, मेरा बच्चा, मेरे साथ इतना बड़ा विश्वासघात कैसे कर सकता है। मगर पिछले सालों में इन विचारों का उद्वेग जब कुछ ठंडा पड़ा और इन से जूझते-जूझते जब मैं थकने लगी तब मुझे यह समझ में आया कि इसमें तेरा कुछ नहीं था। तू तो वो है जो तुझे ईश्वर ने बनाया। लेकिन मेरे आचरण का यह स्खलन तो मेरे भीतर जमा मेरी ही भावनाओं का वह पहाड़ था जो इस धक्के से ऐसा बिखरा था कि उसने मुझे डगमगा दिया। यह आत्मदया, पीड़ा, निराशा, खिन्नता सब मुझ से उपजी थी, इसमें तेरा कुछ नहीं था। तेरा अपनी बात कहना तो इसका निमित्त मात्र था। तू मुझसे अपनी बात नहीं कहता तो किससे कहता।’ रोहन अम्मा को अब भी ताके जा रहा था। उसे समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि अम्मा क्या कह रही हैं। और अम्मा तो जैसे अपनी रौ में बोलती चली जा रही थीं। पूरी ज़िंदगी मैं सुनती चली आ रही थी अपने सांवले रंग के बारे में, अपने सादे रूप के बारे में। अंदर ही अंदर घुटते हुए और ऊपर से मुस्कराते हुए। मेरे गुण जो मेरे अपने थे उनकी कोई क़द्र नहीं थी और मेरी शक्ल-सूरत जिसको बनाने में मेरा कोई हाथ नहीं था उस पर इतनी चर्चा। अपने मां बाप के लिए तो दोनों बहनों में से मैं रनर्स अप थी- उनकी हार की ट्रॉफ़ी। फिर मेरी शादी हुई और मेरी ज़िंदगी में तुम लोग आए। मेरी शान, मेरे गोरे-चिट्टे बुद्धिमान बच्चे। कभी मुंह से न बोला मगर अब मैं भी विजेता हो गई थी। मेरे इतने सालों के घावों पर शीतल मरहम-सा लग गया था और ज़ख्म भरने से लग पड़े थे। मगर जब तुमने अपने ‘गे’ होने का ऐलान किया तो फिर से वो ही पुराना भय और वो ही भावनाएं वापस आ गईं। मैं डर गई उन्हीं चुटकुलों और मज़ाकों से जो अब तुम्हारे कारण शुरू हो जाएंगे। उस समय मुझे लगा था कि मेरे हाथ में फिर से रनर्स अप ट्रॉफ़ी पकड़ा दी गई और मेरे दिलोदिमाग़ में नगाड़े की थाप जैसा गूंजता गया एक ही शब्द- विश्वासघात। —

अम्मा और रोहन दोनों की आंखों का पानी कैसे उफन-उफन के बाहर आ रहा था इसका उन्हें कोई एहसास ही नहीं था। अम्मा बोलीं- ‘इतना समय लग गया मुझे ये बात समझ में आने में कि ट्रॉफ़ी तो ट्रॉफ़ी होती है- और मिलियन डॉलर तो हर ट्रॉफ़ी के साथ होते हैं, हैं ना। दुनिया के कहे सुने के लिए मैं अपना मिलियन डॉलर क्यों खोऊं।’ —

अब सच में अम्मा होंठों से ही नहीं आंखों से भी मुस्करा रही थीं और रोहन को लग रहा था कि आज सच में ही पार्टी का दिन था- रस्मी नहीं, असली वाली।

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