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कहानी:पिता और पुत्र के कोमल रिश्ते का नज़दीक से अध्ययन करती कहानी 'वॉलेट'

चिरंजीव सिन्हा12 दिन पहले
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  • वॉलेट में सिर्फ़ रुपए नहीं होते, उसमें प्यार और परवाह भी रखी होती है, और कभी-कभी एक टीस भी।
  • रघु को भी अपने पुराने वॉलेट में भी बहुत कुछ मिला। उसमेढेर सारे रुपए तो थे ही, कुछ ऐसा भी था जिसने उसकी आंखों में आंसू ला दिए।
  • अफ़सोस बस यही था कि रघु को उस बेशक़ीमती चीज़ को पहचानने में बरसों लग गए थे...

‘पापा, पापा, देखिए! कितना भरा हुआ वॉलेट है!’ नन्ही हर्षिता दादी के कमरे से निकलकर दौड़ती हुई बरामदे में बैठे अपने पापा रघु के पास आकर उनके गले में झूल गई। ‘अरे! किसी का वॉलेट नहीं लेते। यह गंदी बात है। मैंने आपको बताया है न!’ रघु के पास बैठी उष्मिता ने अपनी सात-आठ वर्ष की बिटिया को हल्का-सा डांटते हुए समझाने की कोशिश की। ‘हां, लेकिन इसमें पापा की फोटो रखी थी, तो मैंने सोचा कि यह उन्हीं का ही होगा, इसलिए ले आई।’ हर्षिता थोड़ी रुआंसी हो उठी। बाबूजी के क्रियाकर्म के बाद लगभग सभी रिश्तेदार वापस जा चुके थे। बस बड़ी बुआ रह गई थीं, जो बरामदे में बैठे रघु के साथ अपने स्वर्गवासी हो चुके भाई के बचपन की यादें साझा कर रही थीं। मां-बेटी के वार्तालाप को सुन रघु ने ज्यों ही उनकी ओर सिर घुमाया, हर्षिता के नन्हे हाथों में उस वॉलेट को देखकर वह चौंक पड़ा, ‘अरे! यह तो सचमुच मेरा ही वॉलेट है।’ इतने वर्षों के बाद भी उस वॉलेट को वह भला कैसे भूल सकता था, जो उसकी ज़िंदगी का पहला वॉलेट था। विस्मित रघु ने हर्षिता को नज़दीक बुलाकर उससे प्यार से पूछा, ‘बेटा, यह आपको कहां से मिला?’ ‘दादू के कमरे से। दादी उनकी अलमारी मुझे दिखा रही थीं, उसी में रखा हुआ था।’ हर्षिता ने भोलेपन से जवाब दिया। ‘क्या यह सच में तुम्हारा ही वॉलेट है?’ रघु की बात सुन उष्मिता भी अब उत्सुक हो चली थी। ‘हां! पर...’ वह शायद कुछ और कहना चाह रहा था, परंतु उस वॉलेट को इतने वर्षों के बाद देखकर हैरानी में उसे अपने भावों को प्रकट करने के लिए शब्द नहीं मिल पा रहे थे। उष्मिता ने वॉलेट को खोलकर देखा। वह क़रीने से रखे गए नोटों से भरा हुआ था। ‘रघु! हर्षिता सच बोल रही है। इसमें तो सच्ची में तुम्हारी फोटो लगी है।’ पर्स के आगे वाले छोटे ख़ाने में प्लास्टिक की पन्नी से रघु की किशोरावस्था की फोटो झांक रही थी। उसने पर्स को थोड़ा और टटोला। ‘अरे, इसमें फोटो के साथ-साथ तुम्हारे ग्रेजुएशन फर्स्ट ईयर का आई-कार्ड भी रखा है। चलो मां जी के पास चलते हैं, जिन्होंने तुम्हारी इतनी पुरानी चीज़ों को अब तक इतने अच्छे ढंग से संभालकर रखा है।’ उष्मिता वॉलेट को लेकर उठ खड़ी हुई। उसके पीछे-पीछे रघु भी चल पड़ा लेकिन उसके क़दम मां-बाबूजी के कमरे की ओर आगे नहीं बल्कि टाइम मशीन पर पीछे की ओर दौड़ने लगे थे। ...

ग्रेजुएशन फर्स्ट ईयर की कक्षाएं शुरू हुए अभी एक-दो महीने हुए थे। उस दिन वह अंदर से ख़ूब भरा हुआ कॉलेज से घर आया था। पैर पटकता हुआ सीधा अपने कमरे में गया और पीछे से भड़ाक से दरवाज़े को लात मारकर बंद कर दिया। ‘क्या हुआ, रघु? कोई बात हो गई क्या?’ दरवाज़े के ज़ोर से बंद होने की आवाज़ सुनकर मां दौड़ी-दौड़ी पीछे आईं। किवाड़ बंद तो था, परंतु अंदर से चटकनी बंद नहीं थी। देखा तो रघु औंधे मुंह बिस्तर पर पड़ा था और उसका कॉलेज बैग एक ओर फेंका हुआ था। ‘क्या हो गया बेटा, किसी से झगड़ा हो गया क्या?’ बैग को मेज़ पर रख वह प्यार से उसके बालों में उंगलिया फिराने लगीं। ‘नहीं, जब मेरी किसी को परवाह नहीं है तो मुझे भी किसी से बात नहीं करनी।’ वह तकिये में मुंह घुसाए ग़ुस्से से बोला। ‘अच्छा, रुक! मैं तेरे लिए गुड़ वाली चाय बनाकर लाती हूं, तब बात करेंगे।’ थोड़ी देर में वह रघु की पसंदीदा काली मिर्च और गुड़वाली चाय बनाकर ले आईं। ग़ुस्से के बावजूद वह अपनी पसंदीदा चाय पीने से ख़ुद को रोक नहीं सका था। चाय के हर घूंट के साथ उसका मौन संकल्प भी कमज़ोर पड़ता गया। आखिर मां ही तो पूरी दुनिया में वह शख़्स है जो जानती है कि अपने रूठे हुए बच्चे को कैसे मनाया जाता है। ‘अब तो बोल दो, क्या हुआ?’ मां ने प्यार से उसका चेहरा अपनी तरफ़ घुमाया। ‘मां, क्या आप लोग इतने ग़रीब हैं कि मुझे थोड़ी-सी भी पॉकेटमनी नहीं दे सकते?’ ‘ओह तो तू इस वजह से नाराज़ है। अरे, बेटा...।’ ‘अब मुझे कोई तर्क-वर्क नहीं सुनना। सारे लड़कों को पॉकेटमनी मिलती है। वे शान से अपने पर्स से पैसा निकाल ऐश करते हैं। एक मैं ही हूं फटीचर, भिखारी की औलाद!’ ‘रघु, ज़ुबान को लगाम दो। तुम्हारे बाबूजी बैंक में चपरासी हैं, कोई कलेक्टर नहीं। वो घर का ख़र्च कैसे चलाते हैं, तुम्हें क्या पता? और तुम्हें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि तुम्हारी बड़ी बहन का ब्याह भी होना है और उसमें कितना ख़र्च आएगा, तुम्हें इसका कोई अंदाज़ा भी है?’ ‘हां, हां। यह मेरी ही ग़लती है, जो मैं ऐसे घर में पैदा हुआ जहां कुछ भी अपने मन का नहीं मिल सकता।’ वह जान रहा था कि उसके शब्दों से उसकी मां दु:खी हो रही होंगी, परंतु कॉलेज में सहपाठियों के सामने नीचा देखने के अपमान की पीड़ा के सामने उसे मां के दु:ख की टीस कमतर ही लगी। वह पैर पटकता हुआ छत पर चला गया। शाम को जब बाबूजी घर आए तो स्याह माहौल को देख उन्हें समझते देर नहीं लगी कि आज ज़रूर यहां कुछ अप्रिय हुआ है। ‘क्या बात है, घर में इतनी ख़ामोशी क्यों है और रघु कहां है?’ दो कमरे के छोटे-से घर में धीमी-सी आवाज़ भी भला कहां पर्दे में रहती है! मां की फुसफुसाहट छत पर भी साफ़ सुनाई दे रही थी, ‘अरे! कोई ख़ास बात नहीं। कॉलेज के लड़कों ने थोड़ा उसे चिढ़ा दिया है।’ उनके बेटे को दूसरे लड़कों ने चिढ़ा दिया और वह इतनी छोटी-सी बात से परेशान हो उठे, ‘क्यों, क्यों चिढ़ाया उन्होंने रघु को?’ ‘अरे, कुछ ख़रीदने, ख़र्च-वर्च करने की बात रही होगी। अच्छा! हम रघु को थोड़ी-सी पॉकेटमनी दे सकते हैं क्या?’ पति की मजबूरी और जवान हो रहे बेटे की पीड़ा में संतुलन बिठाते हुए फिर उन्होंने धीरे-धीरे आज का पूरा घटनाक्रम उन्हें बता दिया। कुछ देर ख़ामोशी छाई रही फिर बाबूजी की आवाज़ उसके कानों में पड़ी, ‘मुझे एक ज़रूरी काम से बाहर जाना है।’ फिर दरवाज़े के चर्र से खुलने और फिर बंद होने की आवाज़ आई। ‘ये देखिए, कितने संवेदनहीन हैं! मां ने बताया फिर भी इन पर कोई फ़र्क नहीं पड़ा। ज़रूरी काम का बहाना बनाकर निकल गए।’ वह मन ही मन बड़बड़ाने लगा।

लगभग आधे घंटे बाद दरवाज़े के फिर से खुलने की आवाज़ आई। पहले कमरे में जाने और फिर सीढ़ियों पर चढ़ने की आवाज़ आई। पिता की पदचाप तो वह पहचानता ही था, उनके पीछे-पीछे मां के पैरों की आहट भी सुनाई पड़ रही थी। ‘हुंह, आ गए, अब फिर से अपनी वही रामकहानी सुनाएंगे। लेकिन इस बार मुझे कुछ नहीं सुनना।’ गोया वह ख़ुद से ही प्रतिज्ञा ले रहा हो। उसने जानबूझकर मुंह थोड़ा और फेर लिया। ‘रघु! कैसे हो बेटा?’ बाबूजी की मिश्री-सी आवाज़ उसके कानों में पड़ी। लेकिन वह उन्हें अनसुना कर बैठा रहा। ‘अरे! बोलोगे नहीं। देखो, तुम्हारे लिए क्या लाया हूं?’ इस बार उनकी आवाज़ सुनकर वह पीछे मुड़कर देखे बिना नहीं रह सका। ‘यह लो, तुम्हें ज़रूर पसंद आएगा।’ उनके हाथ में भूरे रंग का लेदर का नया पर्स था। उन्होंने उसके हाथ में वह पर्स पकड़ा दिया। कहानी में अचानक से आए इस मीठे यू-टर्न से भौंचक्का हो उस पर्स को पकड़े-पकड़े वह पिता को देखता रह गया। ‘अरे! बाबूजी को ही देखते रहोगे या इसको खोलकर भी देखोगे।’ मां ने चुटकी ली। ‘अरे, हां!’ अंदर खोलकर देखा तो सौ-सौ के चार नोट पड़े थे। बाबूजी की संवेदनशीलता पर प्रश्नचिह्न उठा रही उसकी वाणी अब स्वयं अपने ऊपर पछताने लगी, ‘सॉरी बाबूजी! थैंक यू।’ बाबूजी हल्के से मुस्करा दिए, ‘चलो, अब खाना खाया जाए। मुझे बहुत ज़ोरों की भूख लगी है।’ चाहे कुछ भी हो जाए बाबूजी को रात का खाना पूरे परिवार के साथ ही खाना पसंद था। भोजन के बाद बाबूजी के कमरे से मां की धीमी-धीमी आवाज़ आ रही थी, ‘आपने इकट्ठा चार सौ रुपए दे दिए, घर का ख़र्च कैसे चलेगा?’ ‘चिंता मत करो! सब ठीक हो जाएगा। हम लोग अब एक लीटर की जगह आधा लीटर दूध लेंगे। इस तरह थोड़े पैसे बच जाएंगे, और वैसे भी अब दूध मुझे कहां पचता है। मुझे दूध पीने से गैस हो जाती है।’ बाबूजी जैसे मां के इस प्रश्न के लिए पहले से उत्तर तैयार कर बैठे थे। जबकि वह समझ रहा था कि बाबूजी झूठ बोल रहे हैं। बाबूजी के बारे में अपने मन में बनी राय पर उसे थोड़ा दु:ख भी हुआ, लेकिन फिर उसने यह कहकर अपने को समझा लिया कि हर मां-बाप अपने बच्चे के लिए बहुत कुछ त्याग करते हैं। बाबूजी ने उसके मन का अवश्य किया है, किंतु यह कोई अनूठा काम नहीं है, यह तो दुनिया का दस्तूर है। पॉकेट मनी का सिलसिला अब चल पड़ा था। समय के साथ-साथ इसमें महंगाई भत्ते की तरह थोड़ी-बहुत बढ़ोतरी भी हो रही थी। ग्रेजुएशन करने के बाद उसे एमबीए में दाख़िला मिल गया और एमबीए पूरा करने के साथ ही पुणे की एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी भी मिल गई। मां-बाबूजी के क़दम ख़ुशी के मारे ज़मीन पर पड़ नहीं रहे थे। बड़े चाव से उन लोगों ने नौकरी पर उसके नए शहर में जाने की तैयारियां प्रारंभ कर दी थीं। एक-एक चीज़ ऐसे ध्यान से बक्से में रखी जा रही थी, मानो वह अंतरिक्ष यात्रा पर जा रहा हो। और आख़िर वह दिन भी आ ही गया, जब उसके जाने की घड़ी सचमुच में आ गई। ऑटो रिक्शा पर समान रखकर वह घर से लगभग निकल ही पड़ा था कि बाबूजी पीछे से लगभग भागते हुए आए, ‘रघु! बेटा तुम्हारा पर्स तो कमरे में ही रह गया।’ दौड़कर आने से उनकी साँस तेज़ी से फूल रही थी। ‘बाबूजी, इसे रहने दीजिए। अब यह बहुत पुराना हो गया है। वहां सबके सामने इतना पुराना पर्स अच्छा नहीं लगेगा। मैंने नया पर्स ले लिया है।’ पॉकेट से नया पर्स निकालकर उन्हें दिखाते हुए वह फ़ौरन उनके पैर छूकर ऑटो रिक्शा में बैठ गया। उस बूढ़े हो चुके पर्स को उसने पिता के बूढ़े हाथों में वहीं दफ़न कर दिया। बाद में दीदी बता रही थी कि पर्स थामे हुए बाबूजी के क़दम बर्फ़ सरीखे वहीं जमे-से रह गए थे। अचानक मिली इस चुभन से उनका ध्यान हटाने के लिए मां उनसे बोली, ‘अरे, क्या सोचने लगे? आपका बेटा बड़ा आदमी बनने गया है। चलिए भगवान से प्रार्थना कीजिए कि सब अच्छा-अच्छा रहे।’ आंखों में उमड़ आए आंसुओं को कुर्ते की आस्तीन से पोंछते हुए वह बोले, ‘हां-हां, अरे, बस ऐसे ही।’ पहले महीने में ही जब उसे एक लाख सैलरी मिली, तो उसे एकबारगी विश्वास ही नहीं हुआ। उसकी एक महीने की सैलरी उसके बाबूजी की पूरे एक वर्ष की कमाई के लगभग बराबर थी। अब उसे बाबूजी से पॉकेटमनी की ज़रूरत नहीं थी। लेकिन उसके मां-बाबूजी ने कभी उसके रुपयों पर आंख नहीं गड़ाई। शुरुआत में उसने थोड़े-बहुत रुपए उन्हें भेजे लेकिन फ्लैट और गाड़ी के लोन की ईएमआई का चक्कर एक बार क्या शुरू हुआ कि बड़ी सैलरी अब इतनी बड़ी नहीं रही कि मां-बाबूजी को पैसे भेजे जा सकें। फिर जब उन्होंने ख़ुद कभी नहीं मांगा तो उसे लगता कि उन्हें वास्तव में पैसों की ज़रूरत नहीं होगी, अन्यथा वे ज़रूर मांग लेते। समय के साथ सुख पंख लगाकर उड़ता रहा। कभी बादलों के ऊपर,तो कभी उसकी पीठ पर सवार होकर और कभी-कभी बादलों से फिसलकर नीचे भी गिर जाता था। बाबूजी का रिटायरमेंट हो चुका था और मां बाबूजी दोनों बूढ़े हो चले थे। दीदी की शादी हो गई थी। उसकी शादी का अधिकतर ख़र्च बाबूजी ने अपने रिटायरमेंट फंड से पूरा किया था। इधर उष्मिता अब उसकी जीवन-संगिनी बन चुकी थी और कुछ समय बाद हर्षिता के रूप में एक प्यारी-सी कली उसके जीवन की बगिया में सुगंध बिखेरने आ गई थी। पिछले दो-तीन वर्षों से बाबूजी को टीबी रोग ने घेर लिया था। बैंक के द्वारा अपने कर्मचारियों के लिए कराए गए हेल्थ इंश्योरेंस से उनका इलाज चल रहा था। एकाध बार उसने ऊपरी मन से बाबूजी से ज़रूर पूछा कि पैसे भेज दूं, लेकिन जैसे ही उन्होंने कहा कि अभी बीमा के पैसों से काम चल जा रहा है तो उसने भी अपने मन को जल्दी से समझा लिया कि जब काम चल ही रहा है तो पैसे की बरबादी क्यों की जाए? उसने इसके आगे थोड़ा भी ज़ोर नहीं डाला, जबकि उसे अच्छी तरह पता था कि बीमा के बावजूद बहुत सारा पैसा इस प्रकार की बीमारियों में अलग से ख़र्च हो जाता है। उष्मिता ने भी एक-दो बार उसे टोका कि आप उनके एकांउट में कुछ फंड ट्रांसफ़र कर दीजिए, पर नई एसयूवी ख़रीदने के लिए जो लोन उसने लिया था उसकी ईएमआई की बड़ी-सी किस्त के आगे बाबूजी की बीमारी आख़िरकार छोटी पड़ गई। परसों रात को मां का घबराई हुई आवाज़ में फोन आया, ‘बाबूजी की तबियत अचानक से ज़्यादा बिगड़ गई है, पड़ोस वाले रमेश भैया की मदद से उन्हें हॉस्पिटल में भर्ती कराया है। अभी उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया है।’ जब तक वह पुणे से गोरखपुर नहीं पहुंचा तब तक दिल न होने के बावजूद वेंटिलेटर ने हरसंभव प्रयास कर किसी तरह उनकी सांस को उखड़ने नहीं दिया। उसने बाप को बेटे से मिलाकर अपना फ़र्ज़ पूरा कर दिया। पर डॉक्टर ने मिलते ही साफ़-साफ़ बता दिया था कि अब किसी भी समय कुछ भी हो सकता है और सच में अगले ही घंटे में बाबूजी दुनिया से कूच कर गए। मानो अपने बेटे को देखने के लिए ही उनकी सांस रुकी हुई थी। अस्पताल से डिस्चार्ज के समय पता चला कि सारा भुगतान उनके बीमा के पैसों से हो गया है। उन्होंने मरने के बाद भी अपने प्यारे बेटे पर कोई आर्थिक बोझ नहीं डाला था। ...

सारा घटनाक्रम एक के बाद एक, चलचित्र की तरह उसकी आंखों के सामने तेज़ी से से गुज़रते हुए रील के डब्बे से बाहर रजतपट पर फैल चुका था। ‘मां जी, आपने रघु का वॉलेट इतनी अच्छी तरह से अब तक रखा हुआ हैं! अद्‌भुत हैं आप।’ मां की प्रशंसा में बोलते हुए उष्मिता के गहरे तक भीगे हुए स्वर से चौंककर वह फिर से वर्तमान में वापस आ गया। मां वॉलेट का अर्थ तो नहीं समझ रही थीं लेकिन उष्मिता के हाथ में पर्स देखकर उन्होंने अनुमान लगा लिया था कि बात रघु के पर्स की हो रही है। ‘बेटा, इस प्रशंसा के असली हक़दार तो रघु के बाबूजी हैं। रघु उनकी आंखों का तारा था।’ यह बोलते हुए उन्हें याद कर वह फिर से रोने लगीं। उष्मिता उन्हें चुप कराने लगी। ‘मां, लेकिन इस पर्स में इतने रुपए कहां से आए? मुझे तो याद नहीं कि मैंने इसमें इतने रुपए छोड़े थे।’ रघु अभी भी वॉलेट में रखे हुए रुपयों में ही खोया हुआ था। ‘बेटा, तुम्हारे जाने के बाद यह पर्स तुम्हारे बाबूजी के लिए तुम्हारी निशानी बन गया था। वे हर महीने नियम से इसमें तुम्हारी पॉकेटमनी रख देते थे। कभी बहुत ज़रूरत पड़ी और मैंने इसमें से पैसा निकालना चाहा तो वे साफ़ मना कर देते। नहीं यह रघु की पॉकेटमनी हैं, उसे मत छूना।’ मां के एक-एक शब्द में उसे आज अपने लिए बाबूजी का प्यार पहाड़ी झरने की भांति स्वच्छ, निर्मल और अविरल बहता हुआ साफ़-साफ़ दिख रहा था। उसे पहली बार ख़ुद पर सचमुच ग्लानि हो रही थी कि उसने कभी भी बाबूजी के प्यार और संवेदना को समझने की कोशिश नहीं की, जबकि तमाम मुश्किलों के बावजूद वे मरते दम तक अपने प्यारे बेटे के लिए पूरे जतन से ख़ुशी-ख़ुशी अपना फ़र्ज पूरा करते रहे। उष्मिता से वॉलेट को लेकर उसे अपने सीने से लगाकर वह फूट-फूटकर रोने लगा। बरसों से जमा हुआ स्वार्थ और नासमझी का मैल अब जाकर निकल सका था। रोते-रोते बस यही शब्द उसकी ज़ुबान से निकल रहे थे, ‘बाबूजी, मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं बहुत बुरा हूं। मैं आपको कभी समझ नहीं पाया।’ रोते हुए रघु को उसकी मां समझा रही थी कि तुम मत रोओ, नहीं तो तुम्हारे पिता को दु:ख होगा क्योंकि वे कहा करते थे- रघु हमारी शान है, मैं कभी उसको दु:खी नहीं देख सकता।’ वॉलेट पकड़े-पकड़े वह बाबूजी की सूनी पड़ चुकी चारपाई पर औंधे मुंह गिर पड़ा।

( लेखक परिचय

चिरंजीव सिन्हा
अपर पुलिस उपायुक्त सेंट्रल जोन लखनऊ के पद पर नियुक्त चिरंजीव की ज़िंदगी के विभिन्न रंगों से सराबोर कहानियों की दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा 2019 के नरेश मेहता सर्जना पुरस्कार से पुरस्कृत। )

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