पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

नमस्कार:हम सबके भीतर एक कृषक जी रहा है

रचना समंदर13 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
  • कुछ बीज ऐसे होते हैं...मन की माटी में दबे हुए, जिनके होने का एहसास तक नहीं होता।
  • फिर ना जाने कौन-सी परिस्थिति इनको अनुकूल लगती है कि इनमें अंकुरण होने लगता है।
  • भीतर की फ़िज़ां बदल जाती है। हैरानी होड़ लगा भी नहीं पाती कि सुकून जीत जाता है।

ख़ूब तपिश वाला महीना होता है जेठ का। अच्छी वर्षा के सूचक के रूप में हम भारतीय नौतपे में बहुत अधिक गर्मी पड़ने की असहज कामना भी कर लेते हैं। भीतर कहीं कृषक का मन बीज के रूप में जो पड़ा है। ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी साथ-साथ चलता रहा है। इस बीज को अंकुरण के लिए बारिश चाहिए। हम हिंदुस्तानी बारिश का दीवानों की तरह स्वागत करते हैं। भले महानगर की आकाश से होड़ लगाती इमारत में रहते हों, जहां पानी की आवश्यकता महज़ गृह और स्व उपयोग तक सीमित हो या वो जिनके लिए पानी नल से आने वाला या बोतल में भरा द्रव्य मात्र हो, वे सब भी वर्षा के आगमन पर उसी उल्लास का अनुभव करने अपनी बालकनियों के छोर पर झूल जाते हैं, जिसका इत्मीनान-भरी मुस्कानों के साथ कच्ची मिट्‌टी के आंगनों में स्वागत होता है।

हम सबके भीतर एक पुरातन कृषक जी रहा है, जीता आ रहा है। किसी और देश भी चला जाए, तो माटी पर पड़ती बूंदों की सुगंधों को नहीं भूलता। बाने-बानी तो ऊपरी हैं। ऐसा शायद हर देश के इंसान के साथ होता होगा। पीढ़ियों के पन्ने उलटते हुए एक पहचान क़ायम रहती होगी। एक तरंग की तरह मौजूद। जैसा वाद्य के साथ होता है। किसी के नाद में वादियों की गूंज होती है, तो किसी की झनकार में नदियों की लहरियां।

मन के बीज का अहसास केवल अनुकूल वातावरण में होता है। यह संस्कारों से इतर हैं, जिनका हर माहौल में बने रहना ज़रूरी है। अनुकूल या प्रतिकूल। संस्कार अमूमन रीति-नीति के आचरण से जुड़े होते हैं, सो इनके पालन में क्या फ़र्क़ होना चाहिए। कौन मिट्‌टी-कौन देश। बात तो मन की माटी में दबे बीजों की है, जो अपने अंकुरण से अपने मन-मालिक को भी चौंका देते हैं।

साफे को सिर पर जमाते हुए जो गर्दन कड़क हो जाती है, वो उसी अंकुर के सिर उठाने का असर है। गोटे की किनारी वाले रेशमी दुपट्‌टे को ओढ़कर देखने की ललक में भी वही है। चुनरी, दुपट्‌टा नहीं, वो ओढ़नी है। किसी भी माटी में पली हो भारतीय स्त्री, मांग टीके को हाथ में लेकर नहीं देखती, माथे पर सजाकर समझती है उसके रूप को। हाथों की मेंहदी किसी के लिए हथेली का रंग होगा, लेकिन मन का बीज तो उसकी ख़ुशबू से जुड़ा है। हथेलियां उठाकर सूंघ लेना मेंहदी का एक अलग उत्सव है। नाख़ून रंगकर भूल जाएं भले लेकिन आलते से सजे पांव पायल पहनने की याद दिला ही जाते हैं। शिशु को देखकर उसके गालों को छूने की वात्सल्यमयी भारतीय चेष्टा को दुनिया के बहुत सारे लोग अजीब नज़रों से देखते हैं, लेकिन क्या करें, हम शिशु मुस्कान को अपने आनंद का आईना जानते हैं। जाने क्यों तुतलाकर बोलने लगते हैं, जाने क्यों बच्चे को टहलाकर सुलाते हैं। जानें क्यों!

माटी के नाते हैं ये। पानी पड़ता है, तो हरहरा जाते हैं। टिपटिपाती शुरुआती बारिश की बूंदें हथलियों पर महसूस करते हैं। उस समय सबके चेहरे एक-से हो जाते हैं। पूरी खिली हंसी के साथ अधमुंदी आंखों वाले चेहरे।

पावस तो पृथ्वी के हर कोने को भिगोता है, लेकिन मन तक जहां पहुंचता है, वो उसी मिट्‌टी के बने हैं, जहां खेतों पर मेड़ें और पेड़ों पर झूले साथ बंधते हैं। उस मन से पहचान है हमारी सदियों पुरानी। वो मन पहचान है हमारी।

rachana@dbcorp.in

खबरें और भी हैं...