सेवा-समर्पण:एक नर्स की डायरी का यह अंश आपको झकझोर कर रख देगा, कोविड का समय उनके लिए किसी युद्ध से कम नहीं था

12 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
  • सिस्टर! जैसा पवित्र संबोधन है, वैसा ही पवित्र है यह पेशा। कोरोना के भयावह काल में जब रोगियों की सेवा-शुश्रूषा करती, उन्हें हौसला बंधाती, उनमें जूझने का उत्साह बढ़ाती नर्सों को देखा तो सबका रोम-रोम कह उठा था...थैंक्यू! सिस्टर।
  • वह आभार अपनी या अपनों की सलामती के बदले था। क्या उसके बाद कुछ बदला? हमने नर्सों की ज़िम्मेदारियों, उनकी चुनौतियों और कामकाज की परिस्थितियों को गंभीरता से समझा? शायद नहीं।
  • एक नर्स की डायरी के ये अंश आपको उनके कार्यक्षेत्र में ले जाकर खड़ा कर देंगे। बताएंगे कि नर्स होना क्या होता है, मानवता के लिए उसकी क्या अहमियत है।
  • 12 मई को अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस पर महिला और पुरुष, सभी नर्सों का सजीव चित्र खींचती यह आमुख कथा।

मैं पिछले दस साल से आईसीयू में हेड नर्स हूं। मैंने बहुत से लोगों की मृत्यु देखी है। पर ये अजीब दौर है। पिछले दो दिनों में अचानक से खांसते-हांफते, सांसों के लिए लड़ते बहुत सारे लोग आ रहे हैं। हमने उन्हें अपना सबसे बेहतर दिया पर कुछ था जो ऑक्सीजन उनके फेफड़ों तक नहीं पहुंचने दे रहा या कार्बन डाइऑक्साइड निकलने नहीं दे रहा है। ये मरीज़ों की संख्या नहीं है जो हमें परेशान कर रही है, ये बीमारी की तीव्रता है, सांसों का रुकना!

एक ‘रेस्पिरेटरी अरेस्ट’ में इमरजेंसी डॉक्टर, अनेस्थेटिक्स, नर्सेस, रेस्पिरेटरी टेक्नीशियन जैसे 6 से 8 प्रोफ़ेशनल की ज़रूरत होती है। एक घंटा तो सेटल होने में लगता है। इतने में दूसरा पेशेंट तैयार हो जाता है। ये अंतहीन सिलसिला चल रहा है। पर ये कोशिशें भी कामयाब नहीं हो रही हैं। हम सब एक अजीब-सी लाचारी और बेबसी महसूस करने लगे हैं। हमें जो सिखाया गया था, जिसके ज़रिए इतने सालों में हमने ना जाने कितनी जानें बचाई थीं, ऐसा लग रहा था जैसे सब बेकार है। ये भयानक बेबसी थी। हम इसलिए नहीं हैं कि उन्हें खड़े होकर अपने सामने जाते हुए देखें। ऐसी बेबसी का सामना हमने पहले कभी नहीं किया था। पूरा दिन बहुत सारा दर्द, अकेलापन और मौत के दरमियान गुज़रा है।

मुझसे दूर भागते लोग!

हमें नए मास्क और शील्ड दिए गए हैं, साथ में कुछ हिदायतें भी कि छूना नहीं है। कल एक मरीज़ के अंदर ट्यूब डालते वक़्त उसकी उलटी जोजफ़ पर गिरी थी। वो घबराई हुई है। उसे लग रहा है कि उसके गले में कुछ हो रहा है। वे मेरे आईसीयू की सबसे क़ाबिल नर्स है। सुबह इतने मरीज़ हैं कि समझ नहीं आ रहा हो क्या रहा है। मैनेजमेंट कह रहा है बराबर के दो कमरों को आईसीयू बना दिया जाए। पर स्टाफ़ कहां है!

आज का दिन भी लगता है कल का ही एक्सटेंशन है। हमने तीन नौजवानों को खोया है। अजीब बात थी कि रात वे स्टेबल लग रहे थे। अब तक लगता था ये बीमारी सिर्फ़ बुज़ुर्गों को तकलीफ़ देगी क्योंकि उनके फेफड़े मज़बूत नहीं हैं।

ये पहली दफ़ा हो रहा है कि डॉक्टर ये तय कर रहे हैं कौन-सा मरीज़ वेंटीलेटर पर रहेगा, कौन नहीं। प्रोटोकॉल के हिसाब से जवान मरीज़ को अवसर पहले दिया जाएगा क्योंकि उसके बचने की संभावना ज़्यादा है। अगर 24 घंटों बाद भी मरीज़ की हालत में सुधार नहीं आएगा तो हम वेंटीलेटर दूसरे मरीज़ को दे देंगे। किसी मरीज़ को ये बताना कि उसकी ट्यूब हटाई जा रही है या उसके रिश्तेदार को बताना, ये आसान नहीं है।

मुझे सिखाया गया कि किसी को जाते वक़्त अकेला नहीं छोड़ते। मैं उनका हाथ पकड़ना चाहती हूं। पर इजाज़त नहीं है।

हॉस्पिटल की रातें डरावनी हो गई हैं। दु:ख मनाने का वक़्त नहीं है। रात को घर लौट रही हूं। सड़कें सुनसान हैं।

रोज़मर्रा की दुनिया में सड़कों पर लोगों की मौजूदगी कितना मायने रखती है ना। उन लोगों की मौजूदगी जिनसे हम वाकिफ़ नहीं रहते, बात नहीं करते। कोई ख़ाली ट्रेन, ख़ाली बस, ख़ाली सड़क कितनी ख़ाली मालूम होती है ना।

शोर ज़रूरी शय है, उससे दुनिया ज़िंदा मालूम होती है। हमें इसी मामूली दुनिया की आदत है। नई दुनिया डरा रही है। मैं सोसायटी की लिफ्ट में घुसती हूं तो उसमें मौजूद लोग बाहर निकल गए हैं। उन्होंने नमस्ते भी नहीं ली है। मैं बाहर के कमरे में सोती हूं। बेटी को पास आने से मना करती हूं। नहीं समझती तो डांट देती हूं। वो मेरे व्यवहार से हैरान और परेशान है। मैं उसे दूर से प्यार से समझाती हूं। पति बताते हैं कि सोसायटी वाले मेरे हॉस्पिटल में ड्यूटी करने से ख़ुश नहीं हैं।

मैं इतनी थक गई हूं कि गरम पानी से नहाकर बस सोना चाहती हूं।

हम अब थकने लगे हैं
एन-95 नाम का ये मास्क हमारी सुबह शुरू करता है और रात तक हमारे साथ रहता है। सामान्य दिनों में पांच से ज़्यादा गंभीर मरीज़ों को एक साथ एक समय पर दाख़िल करना असामान्य होता है, फिलहाल हमारे पास 90 से भी ज़्यादा मरीज़ हैं। स्टाफ़ की स्थिति और भी डरावनी है।

मैंने जिस सिस्टर की ड्यूटी फोन सुनने और मरीज़ के रिश्तेदारों से बात करने की लगाई थी वो रोने लगी है। कह रही थी कि वो दो रातों से दो घंटे भी सो नहीं पाई है, लोगों के रोने की आवाज़ें उसका पीछा नहीं छोड़ रही हैं। मैं उसे ये कहकर निराश नहीं करना चाहती थी कि मैं भी सोई नहीं हूं। मुझे उसके आगे बहादुरी की मिसाल पेश करनी थी ताकि उसका हौसला बना रहे। मैं उसे नहीं बताती कि मैंने सुबह ही डॉक्टरों को बात करते सुना है, वे अपनी ‘विल’ तैयार करने की बात कर रहे थे। कि उन्हें अगर बीमार होकर वेंटीलेटर की ज़रूरत पड़े तो यह तय करने का अधिकार किसको दें कि उसे कब हटाना है। वे इसकी जि़म्मेदारी एक-दूसरे को देने की बात कर रहे थे।

हमें पीपीई किट पहनने और उतारने की ट्रेनिंग दी गई है। उन्हें लेयर में उतारना है और उतारकर एक विशेष जगह में डिस्पोज़ करना है। आख़िर में ये कहा गया है कि इन्हें ध्यान से इस्तेमाल करें। ज़ाहिर है ये बताने का तरीक़ा है कि इनकी संख्या अभी कम है। ये भी मुश्किल बात है। उनमें लगतार काम करना कठिन है। इस तरीक़े से मास्क पहनना कि वायरस को जगह न मिले, सिर में दर्द होने लगता है।

मेरी दूसरी कुलीग की अलग चिंता है। वे दोनों पति-पत्नी इसी हॉस्पिटल में कार्यरत हैं। उन्हें अपनी दो बच्चियों की चिंता है कि हमें कुछ हो गया तो उनका क्या होगा। ---- वो नौजवान डॉक्टर कुछ मिनटों से अकेला बैठा है, किसी से बात नहीं कर रहा। उसे लगता है, पेशेंट उसकी किसी ग़लती से बच नहीं पाया। वो ‘टीम 2’ की तरह यहां काम करने आया है, हमें सपोर्ट देने। ये उसकी ब्रांच नहीं है, उसे इंटेंसिव केयर का ज़्यादा तजुर्बा नहीं है। पर आईसीयू के तमाम डॉक्टर स्टाफ़ के बीमार होने और पेशेंट के लगातार बढ़ते इन्फ़्लो के कारण हमने अलग-अलग ब्रांच के कई डॉक्टरों को बुलाकर ऐसी कई टीमें ट्रेन करके तैयार की हैं।

वो अभी नौजवान है, इसलिए ज़्यादा जज़्बाती है। मैं उससे कहती हूं कि उसने अपना बेहतर दिया है, पर वो मानेगा नहीं। हम सब ‘मोरल इंजरी’ से जूझ रहे हैं। ये इंजरीज़ बढ़ती जा रही हैं। नौजवान नए आइडिया लेकर आ रहे हैं। किसी ने अपनी पीपीई पर अपनी फोटो लगाई है। किसी ने शील्ड पर अपना नाम लिखा है। कुछ लोग अपने सेलफोन को

ज़िप बैग में कवर करके मरीज़ के बेड साइड आकर उसके परिवार वालों से वीडियो चैट करवा रहे हैं।

---- शारीरिक थकान के अलावा मानसिक थकान भी है जो उतर नहीं रही है। हमें सिखाया गया था कि अगर मृत्यु आसानी से भी आए तो भी उसके आदी मत बनो। हम थकने लगे हैं, घंटों उन कपड़ों में जहां आप पानी भी नहीं पी सकते। मुझे अपने साथियों की चिंता होने लगी है। कोई चिड़चिड़ी होने लगी है, किसी को ऐंजायटी होने लगी है।

एक डर भी हम सबको है अपने बीमार होने का। जोजफ़ पॉजि़टिव आई है पर एक ख़बर और है- वो प्रेग्नेंट है। वो पिछले तीन साल से प्रेग्नेंट होना चाहती थी। वीडियो कॉल में उसकी आंखें भरी हुई थीं, डरी हुईं नहीं।

वो कहती है मेरे बच्चे को बचा लेना।

हमें कहा गया है कि हमें घर नहीं जाना, हमारे लिए एक होटल में इंतज़ाम किया गया है। हम सबके सैंपल लिए गए हैं। मैं फोन पर बताती हूं। बिटिया रोने लगी है, उसे लगता है उसकी ममा को कोविड हो गया। आज की रात फिर करवटें बदलते हुए कटेगी।

रोने का अवकाश भी नहीं

ऑक्सीजन की भारी कमी, बुख़ार और कन्फ्यूज़न। उस पेशेंट को इमरजेंसी रूम में आते ही ‘इंटयूबेट’ किया गया। वो महज़ 20 साल का है। हमारी कंैटीन में काम करने वाला लड़का। एक घंटे बाद शोरगुल होता है उसकी हालत ख़राब हो रही है। 4 मिनट का रिदमिक सीपीआर। डॉ. शर्मा वहीं खड़े हैं।

अगले 4 मिनट कोई पल्स नहीं। सीपीआर जारी है। एपिनेफरीन के इंजेक्शन दिए गए हैं। 8 मिनट। कोई पल्स नहीं।

10 मिनट। कोई पल्स नहीं। मैं बैचेन होने लगी हूं।

अगले कुछ मिनटों में भी पल्स नहीं है। डॉ. शर्मा और कुछ मिनट दोबारा देना चाहते हैं। कोई पल्स नहीं।

मैं उन्हें देखती हूं। मैं चाहती हूं कुछ और मिनट दिए जाएं, उन्होंने जैसे मेरा मन पढ़ लिया है, वे और मिनट देते हैं।

कोई पल्स नहीं।

मैं बाथरूम में चली गई हूं, इस मास्क में मेरा दम घुटने लगा है। मैं मास्क हटाकर लगभग रोने लगी हूं। कोई बाहर दरवाज़ा खटखटा रहा है। मैं अपने आंसू पोंछकर बाहर आ गई हूं। अगला पेशेंट भी सीरियस है, 27 साल की गर्भवती लड़की।

---- किसी ने एक दिन अचानक पूछा था, ‘इस टेक्नोलॉज़ी से भरे ताक़तवर संसार में भी ईश्वर क्यों है?’

ईश्वर हमारी आवश्यकता है! आख़िरी उम्मीद। उसका ना दिखना ही दरअसल हमेशा ये उम्मीद देता है कि वो है और कुछ चमत्कार करेगा। मदद मांगने की हमारे पास और कोई जगह नहीं है। जब तक हम सम्पूर्ण मनुष्य नहीं होंगे, हम ईश्वर से मुक्त नहीं हो पाएंगे। जब तक दु:ख होंगे, ईश्वर बना रहेगा। ---- अस्पताल में मैंने देखा है लोग अपने दु:ख आकर कह देते हैं। इकट्ठे होकर, अलग-अलग दु:ख। अनजान लोगों के सामने। कभी-कभी दु:खों को सुनकर कहने की शक्ति मिलती है। बंटकर दु:ख कम होते हैं, उनकी तीव्रता कम हो जाती है।

संवाद, स्पर्श मनुष्यता के संवाहक हैं। किसी मरीज़ का हाथ पकड़कर हम उसे स्पर्श से ही यकीन दिलाते हैं। आपने कभी अपने दु:ख के उस तीव्रतम क्षण को याद किया है जब किसी ने आपको गले लगाया था और आप पिघलकर रोने लगे थे। वो स्पर्श था, स्नेह था, एक अबोला संवाद था। इस बीमारी ने उस स्पर्श को भी छीन लिया है। हम दूर से, शील्ड पहनकर ज़ोर से बोलते हैं। मरीज़ को लगता है हम उनसे डर रहे हैं। वे हमसे निराश हो जाते हैं।

ख़ासतौर से बुज़ुर्ग लोग, उन्हें अस्पताल में अकेले छोड़े जाने की आदत नहीं है। उन्हें लगता है उन्हें जानबूझकर परिवार ने अकेला छोड़ दिया है। इस निराशा में ग़ुस्सा भी शामिल हो जाता है।

वे इस बीमारी से वाकिफ़ नहीं हैं।

----

चौथे बेड पर एक लड़का था जिसके पैरेंट्स रोज़ फोन करते।

‘क्या तुम्हारे कोई बच्चा है?’

‘हमारा एक ही बेटा है।’ वे रोते।

नर्सिंग अब बदल गई है।

वो लड़का भी आज चला गया है।

उसकी आंखें बहुत सुंदर थीं। जैसे बात करती थीं। आख़िरी समय में मैं वहीं थी।

ईश्वर! तुम कहां हो? क्या तुम भी छुट्टी पर गए हो?

पेशा नहीं पैशन है यह
सोसायटी के सेक्रेटरी का फोन है। उनकी पत्नी को कोविड हुआ है, वे चाहते हैं कि मैं हॉस्पिटल में एडमिशन के लिए मदद करूं। वे गिड़गिड़ा रहे हैं कि उनकी पत्नी को डाइबिटीज़ है। उनकी पत्नी को मैं कभी पसंद नहीं थी। उन्हें लगता है नर्सिंग का पेशा सम्मानीय परिवार की लड़कियां नहीं करतीं।

मैं जानती हूं इस समाज में इस सोच के साथ वे अकेली नहीं हैं। मैंने प्रेम विवाह किया है, इनके घरवालों की इच्छा के विरुद्ध। इनकी मां को भी मुझसे ज़्यादा मेरे काम से एतराज़ था। उन्होंने शर्त रखी थी कि शादी करनी है तो काम छोड़ना होगा।

मैंने इनसे साफ़ कह दिया था, मैंने ज़िंदगी बचाने की ट्रेनिंग ली है, मुझसे प्यार करते हो तो मेरे काम का भी सम्मान करना पड़ेगा। मेरे लिए ये सिर्फ़ रोज़गार नहीं था। मैंने वेंटीलेटर से वापस आती हुई कृतज्ञ सांसों को देखा था, कितनी मांओंं के भीगे सच्चे आलिंगन मेरे पास मौजूद हैं।

बहुत कम काम ऐसे होते हैं जिन्हें करते हुए आप लोगों की मदद कर पाते हैं।

मेरे पिता एक शिक्षक थे। उन्हें मुझ पर गर्व था। मैं सोसायटी के सेक्रेटरी को पूरी मदद का आश्वासन देती हूं, हालांकि मैं ख़ुद नहीं जानती कि बेड मिल पाएगा या नहीं।

----

ऑक्सीजन अब सोने से भी ज़्यादा क़ीमती हो गई है। मैं सभी नर्सों को सख़्त हिदायत देती हूं कि ऑक्सीजन को बेकार ना जाने दें, इस बात का ख़ास ख़याल रखा जाए। आईसीयू के बराबर में बनाए गए नए आईसीयू में अचानक हलचल हुई है। डॉ. शर्मा मुझे बुला रहे हैं।

कौन है?

मैं सांस उखड़े पेशेंट की सूरत देखती हूं तो निराश हो जाती हूं। वही नौजवान डॉक्टर है। उसकी सांसें नहीं संभल रहीं। सी पेप मशीन पर भी। सीटी स्कैन स्कोर बहुत ज़्यादा है।

‘मैं उसे ट्यूब नहीं डालना चाहता।’ सीनियर डॉ. शर्मा कहते हैं। उस रात डॉ. शर्मा कार में बैठकर रो रहे थे। मैं ऐसे दिखाती हूं जैसे मैंने उन्हें नहीं देखा। हस्पताल के बाहर शोर है, कोई शव सौंपने वालों पर चिल्ला रहा है।

‘ये मेरे पिता नहीं हैं।’ मोर्चेरी में ढेर सारे शव हैं। वहां काम करने वाले केवल तीन ही लोग हैं, उनके पास अपनी सुरक्षा के लिए पीपीई किट भी नहीं है, ना ढंग के जूते। मुझे नहीं लगता कि वे तीन घंटों से ज़्यादा सोए हैं। यूं भी उनसे दूसरे काम लिए जा रहे हैं। वे शवों को उठाने आते हैं।

बिना डरे उठाते हैं, ऐसे समय में जब ख़ून के रिश्तेदार दूर रहना चाहते हैं।

ये दिन गुज़रने के साथ और लंबे होते जा रहे हैं। सेक्रेटरी की पत्नी एडमिट हो गई हैं। उन्हें सी पेप मशीन लगाई जा रही है। इंसुलिन मैं उन्हें ख़ुद लगाती हूं। वे कुछ कहना चाह रही हैं पर उखड़ी सांसों के साथ बोल नहीं पा रहीं। मैं उन्हें शांत रहने को कहती हूं। उन्हें ज़ोर से बोलकर बतलाती हूं वे घबराएं नहीं। वे ठीक हो जाएंगी।

हम जानते हैं इन शब्दों का इन कठिन समयों में कितना महत्वपूर्ण असर होता है। वे भी दवा का ही हिस्सा होते हैं।

ज़िंदगी में घुली है बीप
एंबुलेंस के ड्राइवर और उसके हेल्पर सब अपने-अपने स्ट्रेस से गुज़र रहे हैं। एक युद्ध जिसके बारे में जानते नहीं कितना लम्बा चलेगा।

वे चाहते हैं मैं मैनेजमेंट से बात करूं कि उन्हें पीपीई किट अधिक संख्या में दी जाए। साथ में एंबुलेंस साफ़ करने के लिए उपकरण। आख़िरकार वे गंभीर संक्रमित मरीज़ों को इसी में अस्पताल ला रहे हैं। वो गर्भवती लड़की स्टेबल है, सेक्रेटरी की पत्नी भी। किसी को ट्यूब डालने की ज़रूरत नहीं पड़ी।

मॉनिटर्स से बीप की आवाज़ हमारी जि़ंदगी का हिस्सा बन गई है। वहां दिन और रात का फ़र्क मालूम नहीं पड़ता। वे मरीज़ तो अपना सर्किडियन रिदम खो बैठते हैं जो कई रोज़ वहां रहते हैं। नेसगेसट्रिक ट्यूब अनपैक कर रही एक सिस्टर बतलाती है कि ट्यूब ख़त्म हो रही है। हमें मंगवानी पड़ेगी।

----

मेरे पिता कहते थे दयालुता सबसे बड़ा धर्म है, क्षमा भी। ये एपिडेमिक जैसे ‘वेक अप कॉल’ है मनुष्य प्रजाति के लिए। जीवन में मौजूद छोटी-छोटी चीज़ें कितनी क़ीमती लगने लगी हैं।

आईसीयू कितने दु:खों का गवाह रहा है बरसों से, कितने शुक्रिया का भी। इसकी बीप मेरी ज़िंदगी का भी हिस्सा है।

लेखक परिचय

डॉ. अनुराग आर्य चिकित्सा विशेषज्ञ और लोकप्रिय लेखक। जीवन के सहज अनुभवों में गहरी अंतर्दृष्टि के साथ झांकने के लिए जाने जाते हैं। मेरठ, उत्तरप्रदेश में निवास।

खबरें और भी हैं...