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  • This Satire On The Procession Returning From A Helicopter To The Rural Landscape Highlights The Many Truths And Quirks Of Society

वक्रोक्ति:ग्रामीण परिदृश्य में हेलीकॉप्टर से लौटी बरात पर यह व्यंग्य समाज की कई सच्चाइयों और विद्रूपताओं को रेखांकित करता है

मलय जैन6 दिन पहले
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  • पहले बैलगाड़ियों, फिर ट्रैक्टर-ट्रालियों और इसके बाद जीप-कारों में जाती बरातों के बाद आज वह दिन आया है जबकि बरात हेलीकॉप्टर से आकर इतिहास बना रही है।

चमचमाती कारों के बेड़े में दुल्हन को ले बरात गांव के बाहर खेत पर आ पहुंची है। भारी चिल्लपों के साथ खेत के चारों ओर गांव के लोगों की भीड़ है। कच्ची-अंडी बच्चों से लेकर बूढ़े तक इस भीड़ का हिस्सा हैं। खेत को ख़ूब ठोक-पीटकर पक्का किया गया है। गचागच गोबर से लीपकर हेलीपैड मान लिए गए इस स्थान पर एक हेलीकॉप्टर शोभायमान है। बरात इसी हेलीकॉप्टर से जाएगी। दूल्हा, नई-नवेली दुल्हन, दूल्हे के मां-बाप सबसे आगे खड़े हैं। बरात के रूप में यही चार जने उड़ने को तैयार हैं। ब्याह के पूर्व की टर्म-एंड-कंडीशन प्रथा के तहत दूल्हे की ज़िद पर बीएमडब्ल्यू नामक लंबी कार दी जा चुकी है। दूल्हे का बाप प्रगतिवादी है। गांव और देश की बदलती तस्वीर देखना चाहता है। ऊंची सोच के साथ वह नाक को भी पहाड़-सी ऊंचाई देना चाहता है। उसकी ज़िद है कि बरातियों का स्वागत गुटके से हो न हो, विदाई वायु मार्ग से ही होना चाहिए। नई-नवेली बहू का हल्ला इतना तो हो कि तीनों लोकों तक ख़बर जाए। लड़के वालों का क्या है, इससे लड़की वालों का ही मान बढ़ेगा सो लड़की का बाप भारी मन से उतना ही भारी भाड़ा चुकाकर हेलीकॉप्टर ले आया है। दूल्हे का सारा परिवार कुछ न कुछ काटता है। बाप का एक पैर राजनीति में तो दूसरा ठेकों में है। वह लीज़ पर पहाड़ काटता है तो लगे हाथ मज़दूरों का पेट भी। दूल्हे की मां चांदी काटती है और दूल्हा समय काटता है। दूल्हे की मां यों दकियानूस है। बेटे की बरात में मां का जाना ठीक नहीं मानती। लेकिन वह आधुनिक सिर्फ़ इस ख़्याल से हो गई है कि समधी के ख़र्च पर चीलगाड़ी में उड़ेगी। यही कारण है कि वह न केवल बरात में आई है वरन ख़ूब नाची भी है। दूल्हा अपने मां-बाप और दुल्हन समेत हेलीकॉप्टर में सवार हो चुका है। उड़नखटोले में बैठते दूल्हे और उसके मां-बाप के दिल बल्लियों उछल रहे हैं मगर हेलीकॉप्टर के ऊपर उठते ही कलेजा मुंह को आने लगा है। मां-बेटा ने रेवा मैया का जाप करते एक-दूसरे को थाम लिया है। हवा में आकर वे संयत होते हैं। आनंद से बाहर झांकते हैं। चींटी-से दिखते लोग और खिलौनों-सी गाड़ियां। वाह... मुंह से निकलता है। दूल्हा पायलट की ओर देख लड़ियाता है– अंकल जी, हवा में एकाध कलाबाज़ी खिलवाओ न। पायलट अंकल मुस्कराता है। आए दिन बरातें लाता ले जाता है। उसे ऐसी मूर्खताएं सुनने की आदत हो गई है मगर दूल्हे का बाप चीख़ता है– पागल है? पिछली बार तूने जीप को कैसी कलाबाज़ी खिलाई थी। पलटा ही दिया था। दूल्हा खीसें निपोर देता है। दुल्हन दुबककर शांत बैठी है। गांव पास आ रहा है। दूल्हे का बाप चाहता है, गांव को ऊपर से देखे। वह हेलीकॉप्टर मुड़वाता है। बचपन का मेरा गांव कितना बदल रहा है। उसका अपना दिमाग़ कलाबाज़ी खा जाता है। पहाड़ एक-चौथाई तो काट डाला, कुछ साल में साफ़ ही कर देगा। हगिया-तालाब पूर कर वहां बढ़िया घर बना दिए। अब आगे नदी पर नज़र डालेगा। रेत का कारोबार और हाथ आ जावे तो रेवा मैया की पहाड़ जितनी ऊंची प्रतिमा बनवाए। दूल्हे की मैया के दिमाग़ में कुछ और ही चल रहा है। वह चाहती है कि काश, यह चीलगाड़ी अपनी हो जाए। – ड्राइवर साहब, यह चीलगाड़ी कित्ते की आती होगी? वह जानना चाहती है। – बहुत महंगी, सुनकर वह पति की ओर घूमती है, क्यों जी, ये पहाड़ पूरा कट जाए तो हम नहीं ले सकते ऐसी चीलगाड़ी? दूल्हे का बाप विचार में पड़ता है। जीप, ट्रैक्टर और डम्परों के अलावा इतनी ऊंचाई तक सोच गई ही नहीं कभी। वह अपनी टुच्ची सोच पर लज्जित होता है। गोया कि दूल्हे की माता की सोच बहुत ऊंची है। वह जानती है पहाड़ कटने में बरसों लगेंगे। इतनी प्रतीक्षा कौन करे। उसके पास फ़ौरी उपाय है। वह लाड़ले को उलाहना देती है– लल्ला तुमने अपनी ज़िद्द में फालतू में इत्ती लंबी कार मांग ली। गांव के कीचड़-खचा में साइकिल तो चल नहीं पाती, कार कहां से चलेगी? लल्ला चिढ़ते हैं– यार मम्मी, तो क्या साइकल मांगते हम? – साइकल नहीं, चीलगाड़ी मांगनी थी, वह फुसफुसाकर कहना चाहती है लेकिन हेलीकॉप्टर की गड़गड़ में भी आवाज़ बहू के कानों तक चली ही जाती है। – तुम समधी जी को पुटिया लो न, पहली विदा में एक चीलगाड़ी दे दें बस, फिर कुछ नहीं चाहिए। पति के कान में ज्ञान फूंक वह नीचे झांकती है, जहां बदलते भारत की तस्वीर देखने ढेरों रिश्तेदार और गांव वाले जमा हैं। भीड़ आसमान में चक्कर काटती इस चीलगाड़ी को देख तालियां पीट रही है। पहले बैलगाड़ियों, फिर ट्रैक्टर-ट्रालियों और इसके बाद जीप-कारों में जाती बरातों के बाद आज वह दिन आया है जबकि बरात हेलीकॉप्टर से आकर इतिहास बना रही है। उत्साही युवा मोबाइलों से वीडियो बना रहे हैं तो आसपास के मीडिया वाले भी कैमरे आसमान में उठाए चक्कर काटते इस हेलीकॉप्टर की लाइव रिपोर्टिंग कर रहे हैं। गांव में विकास का नया आयाम उतर रहा है। दूल्हा, उसका बाप और मां छाती फुलाए देख रहे हैं इस अद्‌भुत दृश्य को। यों नज़रें नीची किए दुल्हन भी देख रही है चीलगाड़ी में बैठे गिद्धों और बदलते भारत की तस्वीर को। सोच रही है, बैलगाड़ी से चीलगाड़ी तक के सफ़र में बहुत कुछ बदल गया है लेकिन गिद्ध आज भी वही हैं।

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