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नमस्कार:बहुत आज़माया इस साल ने, लेकिन इंसानी हौसले कभी कम न होंगे

रचना समंदर3 महीने पहले
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  • इस दशक का आख़िरी पायदान आ चुका है। बड़ा आज़माया इस आख़िरी साल ने।
  • पहली बार हर इंसान अपनी ही कसौटियों पर ख़ुद कसा गया। किसी साल ने इतने हिसाब-किताब नहीं किए होंगे। घट जोड़, गुणा-भाग सबकुछ कर लिया। अब हांफने लगा है।
  • इसकी क़लम थक जाएगी, इंसानी हौसलों के सफ़े कभी ख़त्म नहीं होंगे।

2020 जा रहा है।

कभी-कभी जिन उम्मीदों के साथ हम साल की शुरुआत करते हैं, एक-दूसरे को दुआएं देते हैं, वो उस तरह पूरी नहीं हो पातीं। हम आशाएं बांधते हुए कहते हैं- कड़ा वक़्त है, गुज़र जाएगा। लेकिन ऐसा ही पूरी दुनिया से कहना पड़ेगा, ये किसी ने गुज़री शताब्दी तक में नहीं सोचा होगा। पर ऐसा हुआ।

साल 2020 के महज़ दो महीने ही बीते थे कि जैसे किसी अदृश्य हाथ ने सबको ठेलकर घरों में समेट दिया। एक इंसान, एक शहर, एक देश नहीं, पूरी दुनिया को मानना पड़ा- आज़माइश का दौर है, आज़माएगा, सिखाएगा और गुज़र जाएगा।

और यह कहना अभी भी मौज़ू है। शायद कुछ समय तक और ये आज़माना चलता रहेगा। आज़माने के मायने अलग-अलग नहीं हैं, साझे हैं। जिसके घर, आस-पड़ोस या नज़दीकी रिश्तों पर महामारी ने दस्तक दी है, आज़माइश केवल उनकी नहीं रही। दुनिया के हर इंसान की रही है, यूं कहें कि है।

श्रीश्री रविशंकर के उद्‌बोधन में एक प्रश्न और उससे जुड़ी कहानी जानी। बड़ी कारगर है और सदा प्रासंगिक रहेगी।

उन्होंने घटना के माध्यम से एक प्रश्न पूछा- ‘आप कॉफ़ी का प्याला लेकर खड़े हैं कि तभी कोई आकर आपसे टकराता है और कॉफ़ी छलक जाती है। क्यों? कॉफ़ी क्यों छलकी?’ उत्तर हो सकता है- ‘क्योंकि कोई टकराया, क्योंकि शायद आप उसके रास्ते में खड़े थे, शायद वह व्यक्ति लड़खड़ा गया या शायद आपने प्याले को ठीक से नहीं पकड़ा था, आप असावधान थे’ आदि आदि।

सही जवाब है कि प्याले में कॉफ़ी थी, सो वही छलकी। यानी प्याले के भीतर जो भी होता, वही छलकता। ठीक इसी तरह जीवन में कभी हालात हमें इसी तरह के सदमे, झटके से मिलाते हैं, तो जो कुछ मन में भरा होता है, छलक जाता है। नाराज़गी, क्षोभ, असंतोष, हादसे से मिली सीख, कुछ बचा पाने का इत्मीनान, सर्वशक्तिमान के प्रति आभार, नम्रता- जो कुछ भी मन में होगा, बाहर आएगा।’

कुछ ऐसा ही हुआ है 2020 में आई महामारी के दौर के नतीजेस्वरूप। पूरी दुनिया को कोविड का धक्का लगा। और असंख्य मन, समाज, देश छलके। जो भीतर था, बाहर आ गया। आंख मूंदकर, अपने सुखों की छाया में चलते लोग भी जाग गए।

आभास हुआ कि ऐसे भी बहुत सारे लोग हैं, जिनके प्याले में कुछ था ही नहीं। ख़ालीपन था, सो वही छलका और सबको दिखा। शुरुआती दौर में दु:ख, चिढ़, कड़वाहट, असंतोष और बेसब्री छलकी और ख़ूब छलकी।

सबने एक-दूसरे के प्याले के इन कसैले, काले द्रव्यों को देखा, पहचाना। समानता पाकर चुप्पी साध गए, तो कुछ और अधीर हो उठे।

फिर इन अधीरों ने प्याले दोबारा भरे, परवाह से, स्नेह से, समानुभूति से कि अब जो छलके तो ये सुनहरे द्रव्य छलकें। ये बहुत जल्दी सम्भल गए। जान गए कि इस समय किस भाव को सामने रखकर महामारी से मुक़ाबला करना है। इन लोगों की गिनती नहीं की जा सकती, इसीलिए दुनिया ख़ूबसूरत बनी हुई है, महामारी के ख़ौफनाक रुख़ के बावजूद।

घर में भी प्याले ख़ूब छलके। पहले इत्मीनान दिखा, फिर कुछ निजता पाने की उत्कंठा और फिर चिड़चिड़ाहट। जल्द ही ये प्याले भी भर गए, इस बार साथ रहने के सुख, सुकून और एक-दूसरे के भरोसे से। कहीं कुछ टूटन भी दिखी, लेकिन हालात ख़ुशगवार ही रहे।

मूक प्राणियों के प्रति भी लोगों के प्यालों से स्नेह और परवाह छलकी। बहुत सारे लोगों ने अपने आसपास घूमते-रहते उन प्राणियों की सुध ली, जिनको कभी पहले दुत्कारा होगा। सन्नाटा, अकेलापन, डर, भूख और नाउम्मीदी से घिरे इंसानों ने अपने दिल को सबके लिए समानुभूति से भर लिया।

महामारी की आज़माइश दस महीनों से जारी है। कैलेंडर बदलने का समय आ गया। एक दशक का पटाक्षेप हो रहा है। वक़्त अभी भी ठहरा हुआ है। इसकी करवट के इंतज़ार के साथ शुरू होगा 2021, अगले दशक का पहला साल। हौसलों के तस्मे बंधे हुए हैं। हर कसौटी पर खरा उतरने की पूरी तैयारी है। राहें निकलीं, तो दौड़कर इस जंजाल से बाहर आ जाएंगे, सब। सारे जहान के लोग। और महामारी इस साल की तरह इतिहास का हिस्सा बनकर रह जाएगी। अंधेरे छंट जाएंगे।

नया साल सुनहरा होगा।

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