पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

Install App
  • Hindi News
  • Magazine
  • Aha zindagi
  • This Year Was Also Important In Terms Of Relationships, There Was A Chance To Re manage The Broken Relations Due To Corona

Ads से है परेशान? बिना Ads खबरों के लिए इनस्टॉल करें दैनिक भास्कर ऐप

मरासिम:रिश्तों के लिहाज़ से भी अहम रहा यह साल, कोरोना के कारण टूटते सम्बंधों को फिर से सम्भालने का मौक़ा मिला

डॉ. नंदितेश निलय3 महीने पहले
  • कॉपी लिंक
  • साल 2020 को अगर महामारी के लिए याद रखा जाएगा, तो फिर से जुड़े और नए बने रिश्तों के लिए भी। पिछले बरस तक इस महामारी से पहले तक हमारी ज़िंदगी भागी जा रही थी, हालांकि हम कहीं पहुंच नहीं रहे थे।
  • सांस फूल रही थी, सम्बंधों की डोर टूट रही थी, किंतु हम निरर्थक दौड़ से निकल नहीं पा रहे थे। महामारी ने हमें ठहरकर दम लेने का मौक़ा दिया।
  • जब सांस में सांस आई और चारों ओर निहारा, तो नज़र आए अपनों के आत्मीयता भरे चेहरे। महामारी के बीच यह बीतते बरस का एक ख़ूबसूरत पहलू है।

साल 2020 की शुरुआत हुई ही थी। उसकी आहट को दुनिया के अनेक मुल्कों में थोड़ा-बहुत सुना जाने लगा था। लेकिन अपना देश भारत जो हमेशा से मनमौजी रहा है, अभी भी अनभिज्ञ था। जनता भी अपनी दिनचर्या में खोई हुई थी। सभी बेलौस ज़िंदगी को मानो बेख़ौफ़ जिए जा रहे थे।

शिक़ायत थी भी तो सिर्फ़ इतनी कि काम बहुत कुछ करने को हैं, लेकिन रिश्तों के लिए समय कम पड़ जाता है! अगर समय रहता तो ख़ूब गप्पें करते अपने अपनों से और उन छूटते सपनों से। सभी की शिकायत सुनते और कुछ अपनी भी कहते। आख़िर करें तो क्या करें? न माता-पिता को समय दे पाते हैं और न परिवार में किसी को! न समाज को और न ही कभी ख़ुद को। हां, यह और बात है कि हम सब बस व्यस्त हैं।

अर्नेस्ट हेमिंग्वे की कहानी ‘अनादर कंट्री’ का नायक जब अस्पताल में अपने घुटने दिखाने पहुंचता है तो डॉक्टर उससे पूछते हैं कि युद्ध पर जाने से पहले वो क्या करना चाहता है?’ नायक कहता है, ‘जी, फ़ुटबॉल फिर से खेलना चाहूंगा!’ ऐसा ही कुछ कहता और सुनता वह मनुष्य अपनी धुन में मस्त रहा और उसके आने की आहट नहीं सुनी। वह तो अपनी बेफ़िक्री में खोया हुआ था और तभी एक दस्तक हुई। वो आया और मुस्कराते हुए अपना परिचय भी दे बैठा, ‘मैं हूं कोरोना, कोरोना वायरस! अब कुछ दिन रहूंगा तुम्हारे साथ और बदल दूंगा तुम्हें और तुम्हारे रिश्तों की प्रकृति को भी!’ यह कुछ डरावनी-सी आहट थी और मनुष्य को चुनौती देती हुई भी।

पहली बार साथ-साथ रहने और जीने की आदत को कोई छीनने आ चुका था। लेकिन क्या हमारी आदतों और रिश्तों के स्वरूप को भी कोई इतनी आसानी से बदल सकता है? प्रकृति में तो सभी बदलाव स्वत: होता आया है। लेकिन मनुष्य की आदतों और उसके बरताव को बदलना तो दूर की बात है, सुधारना भी आसान नहीं होता! क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपने सुकून के दायरे से बाहर नहीं निकलना चाहता!

वर्ड्सवर्थ ने कहा है- ‘वाय ऑल दिस ट्रायल एंड ट्रबल!’ महान उपन्यासकार दोस्तोयेव्स्की लिखते हैं, ‘मनुष्य किसी रहस्य से कम नहीं होता। और अगर इस रहस्य को समझने में पूरी उम्र भी निकल जाए तो यह व्यर्थ नहीं।

मैंने इस रहस्य को ढूंढना चाहा, क्योंकि मैं मनुष्य ही बनना चाहता हूं!’ हम भी कोरोना के प्रवेश के बाद रिश्तों में हुए बदलाव के उस रहस्य को ढूंढें और इस प्रक्रिया में दोस्तोयेव्स्की की तरह शायद अपने इनसानी जज़्बात से भी रूबरू हो पाएं और सभी रिश्तों के साथ-साथ अपने अंदर के मनुष्य से कुछ चैन से मुलाक़ात कर पाएं।

एक रिश्ता हौसले के साथ
वायरस और इंसान का सम्बंध पुराना है। कई बार वायरस ने इंसान को हराना चाहा पर कभी भी पूरी तरह सफल नहीं हो पाया! ‘ओल्ड मैन एंड द सी’ में अर्नेस्ट हेमिंग्वे लिखते भी हैं, ‘इंसान कभी हार नहीं सकता।’

तभी तो माइक चेन के उपन्यास ‘अ बिगनिंग एट द एंड के’ तीन पात्र एक भयानक महामारी से टूटते देश और आपसी रिश्तों को बचाने निकल पड़ते हैं और अनजाने में ही सैन फ्रांसिस्को शहर में पिता, पॉप स्टार और उस कंसल्टेंट की मुलाक़ात होती है और फिर वो तीनों महामारी से जूझते मुल्क में टूटते रिश्तों में आशा और मानवता के भाव ईंट-दर-ईंट जोड़ते चले जाते हैं।

कोरोना के इस दौर में मनुष्य का पहला रिश्ता उसके हौसले से ही हुआ।

आधुनिक मनुष्य इस महामारी में अपनी विजय सुनिश्चित करने में लगा हुआ है। कुछ ऐसा ही था वह रंगभेद का दौर, जब मनुष्य का रंग मानवता को पराजित करने पर लगा हुआ था। वह रंगभेद का भाव भी किसी महामारी से कम नहीं था।

लेकिन समय का पहिया घूम चुका था।

इंग्लैंड से लौटते वक़्त महात्मा गांधी का जहाज़ में तीसरे दर्जे का टिकट था। लेकिन इस बार गांधी को तिरस्कार नहीं झेलना पड़ा बल्कि जहाज़ के कप्तान ने बहुत आदर के साथ उन्हें विशेष सुविधाएं दीं।

सब कुछ बदल चुका था। गांधी का फ़ौलादी हौसला ट्रांसवाल से लेकर दांडी तक सभी नस्लीय बीमारियाें पर भारी पड़ा।

कोरोना की इस महामारी के वक़्त भी इंसान अपने अंदर के हौसले को ढूंढ रहा है। वह सीख रहा है कि कैसे भावनाओं के संकेतों को नियंत्रित और निर्देशित किया जाए और साहस के साथ एक ऐसा रिश्ता बनाया जाए, जिससे अवसाद जैसे भाव कोरोना के संग चुपके से प्रवेश न पा सकें।

एक सम्बंध मौन के संग

इस महामारी ने सबसे पहले एक व्यक्ति को ख़ुद से रिश्ता बनाने के लिए प्रेरित किया। हमारे इतने सालों की संगत और आदतों का हिसाब-किताब भी हुआ और महामारी ने मानो एक चैलेंज फेंका कि लम्बे समय तक कोई इंसान अकेले भी रह सकता है क्या? यानी ख़ुद ही वक्ता और ख़ुद ही श्रोता।

कितना अनोखा रिश्ता बन बैठा यह। कुछ हमें अपनी सोहबत की सेहत का भी पता चला। मास्क लगाए अपने मौन को सुनना, समझना और वो भी लम्बे वक़्त तक- कुछ कमाल ही हो गया।

महान दार्शनिक सुकरात की मानें तो ऐसी ज़िंदगी किस काम की जिसका मूल्यांकन न किया गया हो! तो यह ख़ुद के मूल्यांकन का समय रहा। और आदतों के संग रिश्तों की परख का भी। रिश्ते जोड़ते ही तो हैं।

शायद इस मुलाक़ात के बाद हम भी अपने मौन के साथ अपनी अच्छाइयों से और जुड़ते चले जाएं और जैसा कि स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि मौन होकर स्व को सुनना और कुछ नहीं बल्कि भगवान से ही भेंट जैसा है!

इस महामारी ने हमें आत्मिक और आध्यात्मिक स्तर पर तैयार किया।

यहां तक कि अपने अकेलेपन में इंसान ने स्वयं को पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों से भी जोड़ा। पहली बार ज़िंदगी का महत्व इस दौर में महसूस किया गया और यह मौन सभी प्रश्नों का उत्तर दे रहा है। पंचतंत्र में आचार्य विष्णु शर्मा ने कहा ही है- ‘मौनं सवार्थं साधनम्!’

दीवारों के बीच दौड़ते रिश्ते
सभी तो भागते रहे, पार्क या मैदान में नहीं, बल्कि सड़कों पर। कोरोना ने हमें ज़िंदगी से जोड़ा। हममें सभी के लिए जीने का भाव आया। अब तो घरों में सैर होने लगी।

कमरे तो छोटे थे, पर दिल कुछ बड़े हो गए। पहली बार सामूहिकता में सांस ली गई और क़दमों के ताल से ताल मिलाया गया। ली कोका जो उस समय ऑटोमोबाइल कम्पनी क्रिस्लर के चेयरमैन थे, गोल्फ़ खेलने में व्यस्त थे और खेलते-खेलते वो दौड़ने भी लगते थे।

उनका बेटा उन्हें बार-बार चलने को कहता था, क्योंकि वो चोटिल हो सकते थे। लेकिन पुत्र के साथ वो ख़ासे उत्साहित हो जाते थे और उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा भी है कि मैं जब दौड़ सकता हूं तो सिर्फ़ टहलता ही क्यों रहूं?

ऐसा ही इस महामारी के दौर में भी हुआ। सभी अपने घरों में चलते और दौड़ते नज़र आए। ख़ुद के लिए ईमानदारी से जीना पहली बार सीख रहे थे।

साथ-साथ उन पारम्परिक मसालों से भी एक अनोखा रिश्ता इस महामारी में हुआ। जिन मसालों को ढूंढते हुए पूरा यूरोप भारतीय उपमहाद्वीप आ गया, आज वही हल्दी और वही दालचीनी काढ़ा बनकर हम सबको एक नया जीवन देने लगे।

कभी किसी ने यह सोचा नहीं होगा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस दौर में भारत का युवा कभी मसालों की ड्रिंक पिएगा और ज़िंदगी को पाने की दौड़ लगाएगा!

तीन पीढ़ियों का जुड़ाव
कहां मौक़ा मिलता था हमें भागती-दौड़ती ज़िंदगी में रिश्तों को महसूस करने का? लेकिन हर सकारात्मक बदलाव एक बड़ी मुश्किल की पृष्ठभूमि में जन्म लेता है।

इस महामारी ने जाने-अनजाने सभी को कहीं न कहीं चारदीवारी के अंदर एक नए रिश्ते में क़ैद कर दिया। तीन पीढ़ियां एक साथ ख़ुशियों के संग रहने के लिए उत्साहित हुईं। पिता का स्नेह और मां का प्यार फिर से गूंज उठा। नहीं तो औपचारिकताओं के शहर में फ़ोन पर लिया गया हालचाल मानो प्रेम का एकमात्र रूप बन पड़ा था।

पर कोरोना ने तो सभी को दो गज़ की दूरी रख फिर से मिला दिया। बेटे को फिर से पापा का ख़्याल आया, दवाइयों की लिस्ट याद की गई।

मां को सुनने का अवसर कई बरस बाद आया। पर सबकुछ कुछ ख़ास था। बेटियों-बहुओं ने मां और सास के लिए डिज़ाइनर मास्क भी बना डाले। बस अपने को ज़िंदा रखने की बात नहीं थी, बल्कि मां-पापा के साथ रहने का भाव था।

हाथ धुलते रहते, मन के मैल भी धुल बैठे और दीवारों के बीच फिर से दिल बज उठे। यक़ीन मानिए, दिल बजते भी हैं और तभी तो वो धड़कनें सुनी जाती हैं। बरसों बाद पुत्र पति, पिता या एक कर्मचारी की भूमिका से निकलकर पुत्र की भूमिका में अपने मां-बाप को मिला, जो बहुत संतोषजनक था।

जो कभी साल में कभी-कभार मिल पाते थे, वो सब आंखों के सामने उठते-बैठते नज़र पाए। इस महामारी ने रिश्तों में फैली महामारी को समाप्त किया।

जन से बनता रिश्ता
अगर अपने आप से और परिवार के सदस्यों से मिलना इस महामारी ने और सुलभ कर दिया तो वो दिल मानो फिर से धड़का भी दिया, जो औरों के दु:ख-दर्द के लिए कभी-कभी बेजान-सा हो जाता था।

अब एक नया रिश्ता बनने लगा, जहां आम के लिए वह ख़ास कुछ बेचैन हुआ। यह रिश्ता मानो पूरी सभ्यता को जोड़ बैठा। अमीर अपनी अमीरी के लेखे-जोखे को बही-खाते से निकालकर उनके दरवाज़े पर लेकर आए, जो महामारी के प्रकोप से टूटने लगे थे।

हिंदुस्तान ने भी यह बदला हुआ रूप देखा, जहां सभी के लिए कोई न कोई कोरोना वॉरियर बन बैठा। पुलिस वाला खाना भी खिला रहा है और गीत भी सुना रहा है, जहां ज़िंदगी के बोल छिपे हैं।

डॉक्टर तो अवतार ले ही चुके हैं। किसी को कोई ग़रीब या ग़ैर नज़र नहीं आ रहा था, सभी ख़ुद मास्क पहनकर औरों को बचाने में लगे रहे। कितनी आसानी से मानवता के मूल्यों से कोरोना ने हम सब को जोड़ दिया।

ऐसा ही बदलाव नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद युनूस की भी ज़िंदगी में आया था, जब वो बांग्लादेश में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर थे।

एक तरफ़ पूरा बांग्लादेश ग़रीबी और भुखमरी से बदहाल था, वहीं दूसरी ओर प्रोफ़ेसर युनूस क्लास में युवाओं को जीडीपी पढ़ा रहे थे। तभी खिड़की से बाहर उन्हें दूर एक बच्ची नज़र आई, जो ज़मीन से कुछ घास-पात चुन रही थी।

बस यहीं से एक रिश्ता बन बैठा और वह प्रश्न फूट पड़ा, जिसने प्रोफ़ेेसर युनूस को एक ही पल में सभी की पीड़ा से जोड़ दिया, ‘क्या है इस पढ़ाई का औचित्य, जब बांग्लादेश भुखमरी से जूझ रहा है और वो लड़की पेट भरने के लिए ज़मीन से घास चुन रही है? क्या है सिलेबस के इस जीडीपी का महत्व, अगर लोग ग़रीबी रूपी महामारी से मर रहे हैं?’

इसके साथ ही माइक्रोफ़ाइनेंस एक साधन और साध्य दोनों बन बैठा। ग़रीबी की महामारी ने युनूस जैसे हज़ारों युनूस को तैयार किया और समाज ने एक नए मानवीय रिश्ते को जन्म दिया, जहां परायों के लिए अपनेपन का भाव पैदा हुआ। कोरोना ने भी कुछ ऐसा ही हिंदुस्तान में किया।

अनगिनत घरों में दूसरों के लिए मास्क बनने लगे, कहीं कोई किसी के घर में खाना पहुंचाता नज़र आया तो कोई किसी के खेत में थके बैल की जगह ट्रैक्टर। अपने जीवन की सार्थकता सभी इस नए रिश्ते में ढूंढते व्यस्त दिखे। लेकिन हौसला किसी का नहीं टूटा।

ख़ुद से जुड़ता हुआ इंसान समाज के अनजानों से जुड़ता चला जाएगा, यह क्या किसी ने सोचा था? और वह भी कोरोना के समय। पर इस रिश्ते को सबने महसूस किया।

महान मनोवैज्ञानिक एरिक्सन यह मानते हैं कि हमारी प्रकृति एक ऐसी परिस्थिति पैदा करती है, जहां युवा अपने आप को वयस्क होने से पहले ही पहचान लेते हैं। ऐसी परिस्थिति को उन्होंने ‘मोरेटरियम’ कहा।

एक ऐसा समय जो हमें अचानक बड़ा और ज़िम्मेवार बना देता है। कोरोना ने भी हमे ख़ुद के प्रति और समाज के उन जाने-अनजानों के प्रति मानवीय भावों के साथ जोड़ कुछ बड़ा बना दिया।

हम भी आशा करते हैं कि महामारी की समाप्ति के बाद बच्चे, युवा और तमाम जन फिर से ज़िंदगी का स्वागत आशा और आत्मविश्वास से करेंगे और इन रिश्तों को आजीवन यथावत रखेंगे।

चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी ‘उसने कहा था’ का नायक लहना सिंह युद्ध के मैदान में जख़्मी गिरा पड़ा हुआ था, लेकिन तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी उस वादे को बचाने और सुनने में लगा हुआ था, जो उसने कहा था।

इस महामारी ने हमें भी रिश्तों को कुछ ज़्यादा सम्भालने लायक़ बना दिया है। शायद हमने भी ज़िंदगी को सुन लिया है हमसे कुछ कहते!

(लेखक परिचय:

डॉ. नंदितेश निलय

लेखक, गांधीवादी विचारक और जीवन-मूल्यों के चिंतक। अंग्रेज़ी पुस्तक ‘बीइंग गुड’ और उसका हिंदी अनुवाद ‘आइए, इंसान बनें’ चर्चित रहा है। आईआईटी दिल्ली में रिसर्च स्कॉलर।)

खबरें और भी हैं...

    आज का राशिफल

    मेष
    Rashi - मेष|Aries - Dainik Bhaskar
    मेष|Aries

    पॉजिटिव- ग्रह स्थिति अनुकूल है। मित्रों का साथ और सहयोग आपकी हिम्मत और हौसले को और अधिक बढ़ाएगा। आप अपनी किसी कमजोरी पर भी काबू पाने में सक्षम रहेंगे। बातचीत के माध्यम से आप अपना काम भी निकलवा लेंगे। ...

    और पढ़ें