आनंद पंचांग:देने का सच्चा सुख प्राप्त करने के लिए पहले यह जानना ज़रूरी है कि क्या दिया जाए और कैसे दिया जाए

पं. विजयशंकर मेहता15 दिन पहले
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  • देने का अपना सुख, बांटने का अपना मज़ा, और लुटाने में तो आनंद ही आनंद है। लेकिन ये सारी बातें अधूरी हैं।
  • हम यदि देने के सुख को ठीक से न समझें तो हो सकता है सुख भी अधूरा ही मिले। पूरा सच तब होगा जब हम यह जान लें कि किसी को दिया क्या जाए। उसके बाद किसको और कैसे दिया जाए।

देने की व्यवस्था को चार भागों में बांटा जा सकता है। तन, मन, धन और जन। इसका मतलब है आप कुछ लोगों का समूह बनाकर भी उनके लिए काम कर सकते हैं। लोगों को जाग्रत करना, उनको सही दिशा देना यह जन के माध्यम से सेवा है। तो तन, मन, धन और जन, ये चार माध्यम हैं सेवा के। यदि इसे ठीक से समझें तो ही देने का सुख मिल सकेगा।

इसमें एक बड़ी बात यह है कि देने में सुख है, लेकिन अकारण देने में आनंद है। सुख का उल्टा दु:ख हो जाएगा, लेकिन आनंद का उल्टा कुछ नहीं होता। जब आप किसी को कुछ दे रहे हों तो उसमें निज-हित और रहित का संतुलन बना लीजिएगा। इसीलिए भारतीय संस्कृति में एक शब्द चलता है- कल्याण। अपने और दूसरे के कल्याण की भावना से सेवा कीजिए। कल्याण यानी वेलफ़ेयर बहुत बड़ा, व्यापक शब्द है। इसके आधार पर यदि हम लोगों की किसी भी प्रकार से सेवा करें, तो सचमुच उसका बहीखाता दुनिया में नहीं लिखा जाएगा, दुनिया बनाने वाले के यहां लिखा जाएगा।

ईश्वर यह सब अच्छी तरह से देख रहा होता है, और जब आप किसी को कुछ देते हैं तो वह भी उससे कई गुना अधिक फिर से आपको लौटाने के लिए तैयार हो जाता है। यहीं से पता चलेगा सच्चा सुख क्या है। आपने दुनिया को दिया, दुनिया ने आपको कुछ लौटाया, उसमें उतना सुख नहीं मिलेगा। मिलेगा भी तो उसमें कहीं न कहीं दु:ख का भी छींटा होगा। लेकिन, आपने दुनिया को दिया और दुनिया बनाने वाले ने आपको लौटाया तो इसमें आनंद मिलेगा। शायद इसी को कहा गया है देने का सुख।

तो चलिए, चार ख़ानों में बांटकर देखते हैं क्या दिया जा सकता है, किसे दिया जा सकता है, हमें क्या करना है और लौटकर क्या आएगा।

तन से सेवा
सेवा का पहला क्षेत्र है तन का। इसमें हम अपने तन से दूसरों की सेवा कर रहे होते हैंं। दुनिया में कई लोग अस्वस्थ हैं, असहाय हैं, विकलांग हैं, लाचार हैं। किसी के भी तन की रोटी-कपड़ा-मकान और सेहत, ये चार मुख्य आवश्यकताएं हैं।
1 दीजिए.. हम अपने तन से ज़रूरतमंद लोगों की सेवा कर सकते हैं। शुरुआत घर से कीजिए। घर में जो बड़े-बूढ़े हों, जिनकी देह थक चुकी हों, उनकी सेवा करें। फिर बाहर निकलने पर तो दुनिया बहुत बड़ी है। करते जाइए।
2 मिलेगा.. आपके तन को तृप्ति मिलेगी। तृप्ति संतोष से ऊपर की स्थिति है। जब आप किसी असहाय के तन को संभालेंगे, उसे सहारा देंगे तो आपके भीतर हॉर्माेनल बदलाव होंगे और अपनी ही देह से संतुष्टि मिलने लगेगी। आप एक परितृप्ति महसूस करेंगे।
3 करिए... तन से सेवा करने निकलें तो सबसे पहले अपने तन को संभालिए। यानी स्वस्थ रहिए। शरीर में जो दस इंद्रियां हैं, यदि इन पर नियंत्रण नहीं पाया, तो ये बीमार कर देंगी। अभी हम तन से ख़ुशी प्राप्त करने के लिए अपनी कामऊर्जा का उपयोग करते हैं। लोग समझते हैं भोग-विलास में डूबकर तन को सुख मिलेगा, यह उनकी भूल है। कामऊर्जा का सदुपयोग करना ही स्वास्थ्य है और इसे समझना होगा।

मनुष्य जब 14 साल या उसके आसपास की उम्र में प्रवेश करता है तो उसकी कामऊर्जा जाग जाती है। यहां संभलकर नहीं रहे तो वह ग़लत रास्ते पर ले जाएगी। 28 साल की उम्र में कामऊर्जा शिखर पर होती है। यह वही उम्र है जब चरित्र को लेकर बहुत संयमित रहना पड़ता है। 45 की उम्र के बाद कामऊर्जा नीचे गिरना शुरू होती है और तब इस गिरती हुई कामऊर्जा को कोई न कोई सहारा चाहिए। वही सहारा है सेवाभाव। 45 की उम्र के बाद तो अपने तन से दूसरों के तन के लिए ख़ूब सेवा करिए।

मन से सेवा
सेवा तन की ही नहीं, मन की भी करना पड़ती है। हमारे पास भी एक मन है। इससे दूसरों के मन की सेवा करें। आज अधिकांश लोग तन से ज़्यादा मन से बीमार हैं। जो मन से बीमार हैं, टूटे हुए हैं, उदास हैं, उन्हें भी पॉज़िटिविटी देना बहुत बड़ी सेवा है और इसमें भी देने का सुख छिपा है। अपने घर के बड़े-बूढ़ों को समय दीजिए, क्योंकि वे मन से उदास हो सकते हैं। बच्चों का मन भटक रहा है। उन्हें भी प्यार की ज़रूरत है।
1. दीजिए.. मन से सेवा का अर्थ होगा लोगों को ख़ूब ख़ुशी दीजिए। जब किसी का बुरा वक़्त आता है तो उसका मन उसे और डराता है। दुर्भाग्य आता है तो लोग हालात को कोसते हैं, कभी-कभी ख़ुद को कोसते हैं। आपके आसपास यदि कोई ऐसी स्थिति में हो तो उनकी मदद करिए। यह जो प्रोत्साहन हम बांट सकते हैं अपने मन से दूसरे के मन को, बड़े काम का हो सकता है उनके लिए।
2. मिलेगा.. जब हम किसी के मन की सेवा करते हैं तो हमें क्या मिलेगा? शांति। मन अशांति का केंद्र है। जैसे ही आपने दूसरे को ख़ुशी दी, लौटकर वह शांति के रूप में आपके भीतर आएगी। आप पाएंगे मन एकदम शांत हो गया, क्योंकि उसने अभी-अभी दूसरे को वह बांटा है जो किसी का मन लेना नहीं चाहता, पर आपने समझा-बुझाकर, प्रेम से उसे पॉजि़टिविटी दी है। उधर उसका मन ख़ुश हुआ, इधर आपका मन शांत होगा।
3. करिए... किसी के मन को ख़ुशी देने से पहले अपने मन पर काम करना होगा। ग़लत विचार इसका भोजन है। इसलिए जब सेवा करने निकलें, किसी को कुछ देने का इरादा हो तो अपने मन को ग़लत विचारों से बाहर निकालिए। वरना अच्छे काम के भी परिणाम बुरे आएंगे।

धन से सेवा
सेवा का तीसरा और विशाल क्षेत्र है धन से सेवा। यह तो सच है कि जीवन की हर गतिविधि पैसे से शुरू होती है, रुपए पर ख़त्म हो जाती है। हम मनुष्यों की सांस-सांस पर रुपया-पैसा अपनी मोहर लगाता है। तो यदि आपके पास धन है, कम है या ज़्यादा है, यह अलग बात है, लेकिन जितना भी है, उसका दस प्रतिशत भाग दूसरों की सेवा में ज़रूर लगाया जाए।
1. दीजिए.. धन से सबसे बड़ी सेवा यह होती है कि आप सामने वाले की ज़रूरत की पूर्ति करते हैं। कई लोग ऐसे हैं जिनको धन की आवश्यकता होती है और उनके पास उतना नहीं होता। फिर या तो वे निराशा में डूब जाएंगे या अपराध में उतर जाएंगे। पर, यदि आपके पास धन है और आप उसका कुछ भाग सेवा के रूप में ख़र्च कर सकते हैं तो सामने वाले की आवश्यकता को जानें और उसे पूरा करें।
2. मिलेगा.. जब धन से किसी की सेवा करते हैं तो मिलेगा क्या? यश, प्रतिष्ठा, और हो सकता है लोकप्रियता मिल जाए। ये चीज़ें मिलेंगी ही, लेकिन फिर इनको ठीक से पचाइए। वरना ये ख़ुद के लिए ज़हर बन जाएंगी।
3. करिए... धन से सेवा के क्षेत्र में उतरें तो सबसे पहला काम तो यह करिए कि ईमानदारी व परिश्रम से धन कमाएं और उससे सेवा करें। फिर जो मिलेगा वह होगा देने का सुख। दौलत से कभी कोई तृप्त नहीं हो पाया। धन अपने साथ कई तरह के दोष भी लेकर आता है। विचार करिए धन मेरे लिए है, क्योंकि मैं मनुष्य हूं। लेकिन, झंझट यहां से शुरू होगी जब आप यह कह दें कि मैं धन के लिए हो जाऊं।

हम जिस तरह से शरीर को संवारते हैं, ऐसे ही धन को भी संवारना पड़ता है और धन का शृंगार है दान। दान का अर्थ है सामने वाले की आवश्यकता की पूर्ति। धन की तीन गति मानी जाती है- दान, भोग और नाश। आप अपने धन को दान की गति दीजिए।

जन की सेवा
सेवा का चौथा क्षेत्र है जन। यानी जनसमुदाय। यह भी सेवा का एक बड़ा अवसर है। आपके आसपास बहुत सारे लोग होंगे। उनको संगठित कर सकते हैं। या आप अकेले बहुत सारे लोगों को कुछ समझा सकते हैं, उनका मार्गदर्शन कर सकते हैं। याद रखिए, कठिन से कठिन काम अकेले सरलता से कर सकते हैं। लेकिन, सरल से सरल काम दूसरों से करवाना कठिन है।
सेवा के इस क्षेत्र में दूसरे लोग जन के रूप में आपके सामने आएंगे। ख़ासकर हमारे देश में तो एक बड़ा जनसमुदाय अशिक्षित है, किसी न किसी रूप में लाचार है। इसलिए यहां जनसेवा और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। इसके लिए आपके पास दो चीज़ें होनी चाहिए। एक तो व्यवहार बहुत विनम्र हो, दूसरा आपके शब्द, आपकी वाणी बहुत मधुर हो। जब जनसेवा के क्षेत्र में निकलें तो आपके शब्द जीभ की कसरत नहीं, हृदय की भावुकता लिए हुए हों और विनम्रता आपका आवरण नहीं, स्वभाव होना चाहिए। तब जाकर आप जन की भावनाओं को जीत पाएंगे और उसे सही दिशा दे पाएंगे।
1. दीजिए.. यदि किसी जनमानस, जनसमुदाय को सही दिशा देते हैं तो यह एक बहुत बड़ी सेवा है और इसके बदले में आपको मिलेगा सुख। देने का सुख। चूंकि शिक्षा के मामले में हमारा देश बहुत पीछे है, इसलिए उस कमज़ोर जनसमुदाय को सही दिशा देना है कि वह साक्षर हो, समझदार हो और भीड़ बनकर न रहे। भीड़ का कोई उद्देश्य नहीं होता। उसे भटकना ही है, पर समूह का एक उद्देश्य होता है। तो भीड़ को समूह में बदलना बहुत बड़ी जनसेवा है।
2. मिलेगा.. जब जनसेवा करेंगे तो आपको क्या मिलेगा? नेतृत्व मिलेगा। महसूस होगा कि आप लोगों के बीच परमात्मा के प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर रहे हैं। यही बड़ा सुख होगा। किसी मनुष्य के भीतर की मनुष्यता को सहलाकर जगा देना मानवता की बहुत बड़ी सेवा है।
3. करिए... जब जन की सेवा कर रहे हों तो ध्यान रखें कि उसमें राजनीति बिलकुल न करें। राजनीति बुरी चीज़ नहीं है। इस राजनीति ने तो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देश को आज़ाद करवाने में बड़ी मदद की है। राजनीति बुरी तब होती है जब इसमें बुरे लोग प्रवेश कर जाते हैं। लेकिन, फिर भी राजनीति में षड्यंत्र, कुटिलता, प्रतिस्पर्धा... ये सब होती है।
जब जनसेवा करने निकलें तो आपके नेतृत्व और मार्गदर्शन में इन चीज़ों का कोई स्थान न हो। इनसे सावधान रहिए। आपके शब्द लोगों को आहत नहीं करें, राहत पहुंचाएं और व्यवहार दूसरों को आश्वस्त करे कि ऐसे लोग भी हैं इस दुनिया में जिनको देखने पर परमात्मा की झलक दिखने लगती है।

समापन
इन चारों क्षेत्रों में इसलिए काम करिए कि कई लोगों को इन सभी क्षेत्रों में कुछ न कुछ ज़रूरतें होती ही हैं।

ज़रूरत हमारी भी होगी, लेकिन यदि अपनी ही ज़रूरत में उलझकर रह जाएं तो हमारी आवश्यकताएं हमारी ही क़ातिल हो जाएंगी। जैसे ही दूसरों की ज़रूरत को समझेंगे, आपकी अपनी ज़रूरतें परेशान नहीं करेंगी। दुनिया का क़ायदा है जब फूल पेड़ से हटता है, टूटता है, गिरता है और यदि सही जगह चढ़ जाए तो काम का होता है। आपका धन यदि दान में, सेवा में बदल जाए, आपका तन-मन यदि दूसरों की आवश्यकताओं को समझने लगे, तब आप जान पाएंगे कुछ ऐसा सुख भी इस दुनिया में है जो केवल भोग-विलास या निज हित से नहीं मिलता।

शहद की मिठास लेने वाले मधुमक्खी के मनोविज्ञान को नहीं जानते। हमें इस मामले में मधुमक्खी की तरह हो जाना चाहिए। एक मीठा छत्ता तैयार करिए और आगे बढ़ जाइए। दूसरे इसका स्वाद लेंगे, हम फिर सेवा की यात्रा पर निकल जाएंगे, जहां लोगों को इतना सुख देंगे कि लौटकर हमारे लिए वह आनंद में बदल जाएगा।

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