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क़िस्सा-कोताह:सफ़र कभी-कभी अंग्रेज़ी का 'सफर' बन जाता है, कुछ ऐसा ही यह क़िस्सा है जो आपको कोरोना से पूर्व की यात्राओं की याद दिला जाएगा

रोहित चेडवाल5 महीने पहले
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  • सफ़र मेरी रुचि का विषय है। काम के सिलसिले में तो कभी यूं ही सफ़र पर रहता हूं।
  • और पूर्व में अक्सर अपने गृहनगर से कार्यस्थल नगर की ओर सफ़र करता पाया जाता था, जिनके बीच फ़ासला इतना अधिक है कि ट्रेन से आवागमन करना अवश्यम्भावी है।
  • ख़ैर कोराेना के कारण यात्रा का रसपान तो नहीं हो पाया है, किंतु कोरोना के आगमन के पूर्व सफ़र का अपना ही मज़ा था। और अक्सर यह सफ़र अंग्रेज़ी के ‘सफर’ में परिणत हो जाया करता था। यह भी एक ऐसे ही ‘सफ़र’ का क़िस्सा है।

फिर से वही सोमवार की अलसाई-सी सुबह। आजकल ट्रेन महू यानी डॉ. अम्बेडकर नगर जंक्शन से आती है तो अक्सर यानी रोज़ इंदौर स्टेशन देर से पहुंचती है, और देर से ही निकलती है। जिसके कारण होता यूं है कि प्लेटफ़ॉर्म पर जनसैलाब आ जाता है और जैसे ही ट्रेन आती है सैलाब ट्रेन को अपनी चपेट में ले लेता है।

आज भी जैसे ही ट्रेन आई, जनसागर ने ऐसा उफान मारा कि जैसे किसी ईनामी प्रतियोगिता में पहले आओ पहले पाओ की तर्ज़ पर पुरस्कार दिए जाएंगे।

डी1, डी2 और डी3 नामक डिब्बे सामने से गुज़र रहे थे, जो कि आरक्षित होते हैं। रेल अभी प्लेटफ़ॉर्म पर लग ही रही थी कि एक सज्जन बिजली की सी गति से दरवाज़े पर लटूम गए। उनके पीछे-पीछे एक और नौजवान लपका।

ग़ौरतलब है कि दोनों का उस डिब्बे में आरक्षण नहीं था। इसका अंदाज़ा यूं लगाया जा सकता है कि यदि उनकी सीट आरक्षित होती तो वे इस तरह का साहसिक कार्य नहीं करते।

मुझे लगता है कि यदि ओलम्पिक खेलों में चलती ट्रेन में चढ़ने का खेल शामिल कर लिया जाए तो प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान के साथ सभी सांत्वना पुरस्कार हम भारतीयों की झोली में आएं।

इंजिन के बाद कोई 5 से 6 डिब्बे सामान्य के लगे थे और उनमें आरक्षित डिब्बों से मात्र इतना भेद था कि उन पर ‘डी’ वग़ैरह जैसा कुछ अंकित नहीं था।

लेकिन भीड़ सारी आरक्षित डिब्बों के दरवाज़े पर और उसके भीतर थी। ‘माना जाता है’ कि आरक्षित डिब्बे में प्रचुर मात्रा में भद्र मनुष्य पाए जाते हैं, लेकिन यह सिर्फ़ गणित में उपयोग किए जाने वाले ‘माना कि’ जितना ही भ्रामक है।

मेरा अनुभव रहा है कि यहां एक से बढ़कर एक बौड़म और नौसिखियों की भी कमी नहीं।

ख़ैर जैसे ही आंच कम हुई और जनउफान कम हुआ मैं डी3 में चढ़ा। जहां मेरी सीट थी वहां एक बच्चा बैठा हुआ था, उसके पास उसकी माताजी और तदुपरांत पिताजी विराजमान थे। मेरी सीट खिड़की वाली थी।

मैंने उन्हें बैठने की अपनी मंशा से अवगत करवाया तो उन्होंने आग्रह किया कि खिड़की के बजाय इस कोने वाली सीट पर बैठ जाइए।

मैंने यह सोचकर आग्रह स्वीकार किया कि शायद वे अपने लाल को अपनी गोद में बैठा लेंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और हम 4 लोग सीट पर बैठे रहे।

मुझे आग्रह स्वीकार करने के लिए पुरस्कार स्वरूप एक व्यक्ति के बैठने लायक़ जगह का 75% भाग दिया गया।

ट्रेन चली और जैसा कि हर भारतीय बच्चे में एक ख़ास गुण होता है कि वो घर से बाहर निकलते ही या तो रोने लगेगा या धींगा-मस्ती करने लगेगा। ये बच्चा दूसरे प्रकार के वर्ग में शामिल था।

वह ऊधम करने लगा तो पहले उसके माता-पिता ने उसे प्रेम से समझाया, चॉकलेट की रिश्वत देनी चाही, लेकिन वह शांत होने का नाम नहीं ले रहा था और मैं जान चुका था कि इस उपद्रवी बच्चे की सार्वजनिक रूप से पूजा हो न हो, घर पर इसका हवन ज़रूर होगा।

अचानक उसकी माताजी ने उससे कड़क भाव-भंगिमाओं के साथ कहा, ‘चुपचाप बैठ जाओ, नहीं तो ये भैया तुम्हें पकड़कर ले जाएंगे।’ और इतना कहकर तीनों ने मेरी ओर देखा।

बच्चा जड़वत खड़ा मुझे ऊपर से नीचे तक ताकने लगा यह सोचते हुए कि इसमें कुछ डरने जैसा है क्या? मन तो हुआ कि वाक़ई में इसे उठा ले जाऊं और सूखे कचरे की गाड़ी के सुपुर्द कर दूं। लेकिन मैं क्यों बच्चे चुराने लगा? क्या मेरे बड़े-बड़े नाख़ून या दानवी सूरत है या मैंने बच्चे चुराने का कोई नया स्टार्टअप खोला है? मैं फीका-सा मुस्करा दिया।

मैंने देखा कि दोनों पति-पत्नी मेरी ओर आशामिश्रित नज़रों से देख रहे थे कि मैं आड़ी-टेढ़ी भावभंगिमाओं से उनके कुपुत्र को सुपुत्र बना दूं। मैंने स्थिति भांप ली और जैसी मुझसे अपेक्षा की जानी चाहिए मैंने ‘ॐ इग्नोराय नमः’ का जाप किया और खिड़की से बाहर ताकने लगा। ‘धत्त तेरे की’, उनकी यह चाल भी कुछ कमाल न कर सकी।

कुछ ही देर बाद एक लड़की वहां पर आई। उसने कहा, ‘एक्सक्यूज़ मी, 90 इज़ माइन।’ यह तो मेरी सीट संख्या थी। मुझे समझ नहीं आता कि अक्सर अजनबियों को देखकर, ख़ासकर लड़कियाें की अंग्रेज़ी क्यों निकल पड़ती है।

मैंने अनुमान लगाया कि यह उच्च कुलीन वर्ग की प्रतीत होती है और घर में भी शायद ये लोग ‘एक्सक्यूज़ मी, पास मी टिंडे की सब्ज़ी प्लीज़’ जैसा ही कुछ बाेलते होंगे।

मैंने अपनी सीट संख्या की जांच की, वह तो सही-सलामत थी, लेकिन डिब्बा संख्या ने चोट कर दी थी। मेरी सीट डी3 में नहीं डी1 में थी।

मैंने उठकर अपना बस्ता टांगा और डी1 की ओर जाने लगा। हालांकि मैं ख़ुश भी था कि चलो बच्चा चुराने की नई ज़िम्मेदारी इस आंग्लभाषी लड़की को मिल चुकी है।

हालांकि, अपनी सीट तक पहुंचना आसान नहीं था, क्योंकि बीच में बाधा के रूप में विभिन्न आकार-प्रकार के महिला-पुरुष खड़े थे। अन्नानास के आकार के पुरुष आड़े-टेढ़े खड़े होकर जगह बना चुके थे।

डिब्बे में खड़ी आबादी की जनसंख्या में भी लिंगानुपात में भारी अंतर था। बीच रास्ते पर अधिकतर पुरुष ही खड़े हुए थे, क्योंकि महिलाओं को सशक्तीकरण के नाम पर अक्सर बैठने भर की जगह तो मिल ही जाती है।

जिस दिशा में मैं जनसागर को चीरता हुआ सरक रहा था, उसी दिशा में मेरे आगे एक महिला भी चल रही थी। वे जिस तरह से जनसागर को चीर रही थीं, वह वाक़ई में सीखने लायक़ कला थी। हालांकि यह भी सम्भव था कि महिला होने के कारण उन्हें अपने आप ही जनता जगह दे रही थी।

वे इतनी धीरे चल रही थीं कि मैंने 2-3 बार उन्हें बिना हॉर्न दिए ओवरटेक करने की कोशिश की। लेकिन सब सिफ़र। वे डी1 तक आईं।

मेरी सीट पर एक वृद्ध सज्जन विराजमान थे। मैंने उन्हें कष्ट नहीं दिया और डिब्बे के बीच में खड़ा रहा। मेरा ध्यान उन महिला पर गया, जो मेरे आगे कलात्मक रूप से जनसागर को चीर रही थीं।

दरअसल, डी1 के बाद वातानुकूलित डिब्बा जुड़ा हुआ था। इन सभी डिब्बाें में अंदर से द्वार होते हैं। वे उस वातानुकूलित डिब्बे के द्वार पर खड़ी कुछ सोच रही थीं।

मुझे पक्का यक़ीन था कि वो महिला इन आरक्षित डिब्बों के भद्र मनुष्यों के बीच एक पल भी नहीं ठहरना चाहती थीं और अपनी जगह उन तथाकथित उच्च वर्ग के सभ्य मानवों में खोज रही थीं। लेकिन जैसा कि प्रकृति का नियम है कि छोटे पशु बड़े पशुओं से डरते हैं, मनुष्यों पर भी यही नियम लागू होता है।

ये और बात है कि मनुष्य आकार-प्रकार में एक से होते हैं और होमो सेपियंस ने बड़ी चतुराई से अपने बड़े नाख़ून और लम्बी पूंछ ग़ायब कर दी है, इसलिए वे एक-दूसरे से धन की उपलब्धता के अनुसार डरते हैं। अधिक माया-सम्पन्न व्यक्ति स्वयं से कम सम्पन्न व्यक्ति को डराने का भरसक प्रयास करता है, उसे हीन भावना से देखता है।

ख़ैर, वे खोजी महिला बहुत समय तक वातानुकूलित डिब्बे के द्वार पर खड़ी रहीं। फिर कुछ सोचकर अंदर घुस गईं। चलो, कम से कम उन्होंने साहस तो किया।

कुछ देर बाद वे उससे बाहर निकल आईं। मैंने अनुमान लगाया कि उन्हें जगह नहीं मिली, इसलिए वातानुकूलित डिब्बे ने उन्हें पुन: प्रतिकूलित डिब्बे में उगल दिया। वे पुन: डी1 से डी3 तक गईं। आश्चर्यजनक रूप से वे कुछ देर बाद पुन: प्रकट हुईं और इस बार उनके साथ उनकी माताजी भी थीं। वे अपनी माताजी को सीट दिखाने लेकर आईं थीं।

प्रतीत हुआ महिला बड़ी मेहनती थीं लेकिन यदि वे अपने स्मार्टफ़ोन से इधर-उधर फ़ोन लगाने के बजाय वातानुकूलित डिब्बे की तस्वीर खींचकर रख लेतीं तो माताजी को इतना कष्ट न होता।

दोनों उच्चवर्गीय प्रतीत होती महिलाएं पुन: वातानुकूलित डिब्बे में घुस गईं। अब वे दोनों उच्चवर्गीय थीं, इसका अंदाज़ा मैंने इस बात से लगाया कि जैसे ही वे डिब्बे के भीतर सार्वजनिक शौचालय वाली गली से गुज़रीं, स्वत: ही उनका पल्लू नाक पर आ टिका और डिब्बे के भीतर जाने तक वह नाक पर ही टिका रहा।

कुछ देर बाद दोनों डिब्बे से बाहर निकल आईं। उनके चेहरे पर संतुष्टि के भाव विद्यमान थे। लेकिन मैं समझ नहीं पाया कि वे डिब्बे से बाहर क्यों निकल आईं? क्या इन प्रतिकूलित डिब्बे के यात्रियों को अपने मुख से झड़ती प्रसन्नता दिखाना उद्देश्य था?

वे दोनों पुन: डी1 तक गईं। कुछ देर बाद दिखाई दिया दोनों महिलाएं अपने भारी-भरकम बैग उठाकर ला रही थीं। इतनी ठसाठस भीड़ में वे जिस कौशल से अपने आप को आगे धकेले जा रहीं थी, वह दर्शनीय था।

खोजी महिला के हाथ में दो बैग थे और कंधे पर एक बैग लटका था। उनके पीछे माताजी के पास में उनसे भी बड़ा बैग था। जिसे उन्हाेंने कमर पर इस तरह रखा था, जैसे कोई स्त्री पनघट से कमर पर मटकी रखकर मटकती हुई चली आती है।

एक तरफ़ बैग झुका हुआ था और दूसरी तरफ़ माताजी, जिस कारण वे अंग्रेज़ी के अक्षर ‘वाय’ की तरह प्रतीत हो रही थीं।

अब चूंकि मैं रास्ते में खड़ा था और वे दोनों महिलाएं मेरी ही ओर आ रही थीं तो मैं उन्हें जगह देने के लिए सरका। लेकिन मेरी सरकने की गति धीमी थी और उनकी आगे बढ़ने की गति तेज़।

उनका टाइटैनिक-सा बैग़ अंतत: मुझ हिमखंड से टकराया और मैं इतना ज़्यादा झुक चुका था कि गुरुत्वाकर्षण बल ने मुझे अपनी चपेट में ले लिया। मैं लोगों के बैठने वाली जगह के बीच रखे अलग-अलग माप के बस्तों पर आ गिरा।

अकस्मात हुई इस दुर्घटना ने सभी का ध्यान मेरी ओर खींचा। सीट पर चिपके एक सज्जन बोले, ‘भिया, चक्कर आ रिये क्या?’

‘नहीं-नहीं, यूं ही गिरने का अभ्यास करता रहता हूं। यह मेरा पसंदीदा कार्य है। कभी दौड़ते हुए, कभी यूं ही खड़े-खड़े, जैसे अभी आपके चरणों में गिरा, कभी बैठे-बैठे और एक बार तो मैं लेटे-लेटे गिर गया था। चक्कर तो बहाना है, यूं ही गिरते रहो तो कमज़ोर समझकर कोई भी आप जैसा अपने पास बैठा लेता है।’

मैं ग़ुस्से में यह सब बाेलने वाला था और पहला शब्द ‘नहीं’ तो हाेंठों से प्रस्फुटित भी हो चुका था, लेकिन मैंने तुरंत हाव-भाव बदले। ‘नहीं, वो संतुलन बिगड़ गया था।’ और फीका-सा मुस्करा दिया।

मैंने तुरंत खड़े होकर अपने कपड़े झटकारे और उन माताजी की ओर मुख़ातिब हुआ। लेकिन जैसा कि आप आशा कर सकते हैं, वे भी मेरे ही उठने की प्रतीक्षा में थीं और मुझे घूरकर देख रही थीं।

मैं ही उनकी शांति से जा रही रथयात्रा के बीच झंझावात बनकर आया था।

अब चूंकि महिला होने के नाते उन्हें ही घूरने, डांटने, टल्ला मारकर आगे बढ़ जाने का सामाजिक हक़ था, तो उन्होंने उसका भरपूर दुरुपयोग किया और मुझे तब तक घूरती रहीं, जब तक वे वातानुकूलित डिब्बे के अंदर समा नहीं गईं।

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