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  • Two And A Half Thousand Years Old Toys Have Also Been Found In Various Excavations, Acharya Charak Has Told How Toys Should Be

क्रीडनक:विभिन्न उत्खननों में भी प्राप्त हुए हैं ढाई हज़ार साल पुराने खिलौने, आचार्य चरक ने बताया है कि खिलौने कैसे होने चाहिए

डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू'एक महीने पहले
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  • बचपन की कल्पना खिलौनों के बग़ैर असम्भव है। बच्चों के मनोरंजन के साथ-साथ उनका शारीरिक और बौद्धिक विकास खेल खिलौनों-से बेहतर कौन कर सकता है! हमारे देश में खिलौनों की प्राचीनता के प्रमाण सिंधु घाटी सभ्यता में भी मिलते हैं। इन्हीं बाल प्रिय खिलौनों के कुछ युग युगीन संदर्भ।

मासूम-सा सच है कि बच्चों के लिए मां के बाद सबसे बड़ा आकर्षण होते हैं खिलौने। भरोसेमंद और रंजक। खेलकं, खेलां, खिलूने या रमकड़े। टॉय अथवा क्रीडनक। दुनिया की हर भाषा में खिलौने की पहचान के लिए कोई न कोई शब्द है यानी कि हर सभ्यता और संस्कृति में खिलूने, रमकड़े रहे हैं। मां ने हर युग में शिशु रंजन के लिए खिलौने दिए।

विभिन्न उत्खनन में प्रायः दो-ढाई हज़ार वर्ष पुराने, जब मौर्यों से लेकर शुंग-कुषाण काल रहा, तक के खिलौने ख़ास तौर पर मिलते हैं। इस काल में खिलौने बने भी बहुत और अनूठे भी रहे। संकटकाल होने पर भी लोग खिलौने ख़रीद लेते थे, शायद बच्चों की संख्या ज़्यादा हो। उस काल में राजा को भी यह अनुमति थी कि वह अपने गुज़ारे के लिए खिलौने बनाए और बेचे। अर्थशास्त्र और महाभाष्य में ये संदर्भ हैं और महाभारत इसकी पुष्टि करता है कि व्यक्ति अपने और पराये जिस भी शिशु से लगाव रखता हो, उसके लिए खिलौने लेकर जाए। उत्तरा ने अर्जुन से अपने खिलौनों के लिए कपड़े मंगवाए थे।

इसी काल को प्रकट करने वाला महान आयुर्वेदिक ग्रंथ है चरक संहिता। चरक ने शिशु रंजन पर बड़ा ध्यान दिया और उनके अनुसार तब अथर्वेदीय विधियां बताकर विद्वान लोग बच्चों के लिए मणियां और औषध की सलाह देते थे। खिलौने बनाने और उनका प्रयोग करने के क्रम में यह निर्देश था- ‘क्रीडनकानि खलु कुमारस्य विचित्राणि...'

1. खिलौने चित्र-विचित्र, अनेक तरह के हों,

2. खिलौने आवाज़ करने वाले हों,

3. सुंदर लगने वाले और हल्के हों,

4. धारदार फलक, जानलेवा न हों,

5. मुंह में घुसने वाले न हों,

6. भयावह नहीं लगने चाहिए।

है न आवश्यक बात! आज खिलौनों का बाज़ार लाखों, करोड़ों का है और बच्चों के लिए महंगे से महंगे खिलौने मिलते हैं, मगर अब चरक की अपेक्षा वाले खिलौने कहां! वैसे बच्चे भी नहीं।

हम इमली के बीज के खेल से लेकर कंचे, लट्टू, चकरी, झुंझने, झूमर, गाड़ी, हाथी-घोड़े, गाय-बकरी और बिल्ली से ख़ुश हो जाते थे, लेकिन अब वह बात नहीं जब निरामय, नीरोग शिशु के साथ निर्भय, निष्कंटक, निरूपद्रव, निस्तेज किंतु निराले खिलौने बनाए, मंगवाए, लाए, सजाए व धजाए जाते थे।

गेंद नाच का खेल

मनोकामना पूर्ति के लिए नृत्य करने की परम्परा उतनी ही पुरानी है जितना शैलाश्रयों में मानव निवास। यह किसी वस्तु की प्राप्ति पर उल्लास का उत्सवी अवसर भी होता है और मनौती का भाव भी, जैसा कि संस्कृत कवियों ने सायास माना है। ऐसा ही एक नृत्य है : कंदुक नृत्य अर्थात गेंद नाच। सर्कस में गेंद घुमाने वाली बालाएं तो याद आती ही हैं जो संतुलन से गेंद के कौतुक दिखाकर दर्शकों की पलकें नहीं गिरने देती, ख़ुद भी पलकों के धनुष तानकर थिरकती हैं।

कोणार्क और कोल्हापुर से लेकर मेवाड़ के नागदा और मध्य भारत के खजुराहो तक मंदिरों के जंघा भागों पर अलस कन्याओं के साथ कंदुक धारिणियों की मूर्तियां मिलती हैं, लेकिन क्यों? गेंद कभी कन्याओं का खेल रहा और खेल ही नहीं, नृत्य भी रहा। कवि दंडी के वर्णन से जान सकते हैं कि गेंद का खेल क्या है? कैसे होता है? कहां होता है और उसके पीछे का मनोगत क्या होता है? प्रत्येक कृतिका नक्षत्र में कंदुक नृत्य होता था और विंध्यवासिनी देवी के मंदिर में होता था। ऐसे आयोजन ‘कंदुकोत्सव' के नाम से जाने जाते थे।

लट्टू पर लट्टू

लट्टू की बात करेंगे तो हमें अपना बचपन याद आ जाएगा। मां अपना और पिता अपना बचपन और लट्टू प्रेम याद दिला देंगे। ताज्जुब होगा कि यह खिलौना दक्षिण एशिया में, जहां हल्की लकड़ी वाले पेड़ बहुत मिलते हैं, लोकप्रिय रहा है। इसको भंवरा, भंवरी, योयो, फरमुक, आदि भी कहा है और भिंगरी भी। कंदुक क्रीड़ा की तरह लट्टू क्रीड़ा भी बालकों और बालिकाओं में लोकप्रिय रही है। मध्य काल में जनसामान्य से लेकर राज परिवार तक लट्टू की पहुंच देखने को मिलती है और तुलसी, सूर, चंद्रसखी आदि के रचे बाल मनोभाव के पदों में लट्टू घूमता मिल जाता है।

ब्रिटिश लाइब्रेरी में एक चित्र संरक्षित है जो कि मध्यप्रदेश के मांडू से प्राप्त हुआ था। यह शादियाबीदी के मितफाह अल-फुजला नामक हस्तलिखित ग्रंथ में है। 1490 ईस्वी के इस चित्र में दो बालक लट्‌टू से खेलते हुए दिखाई दे रहे हैं। एक के हाथ में लट्‌टू और दूसरे के हाथ में योयो जैसा खिलौना है।

प्राचीन गिल्ली-डंडा

गिचपिच, गिल्ली-डंडे का खेल! पहले टेल। फिर पेल! फिर नेल! और, फिर मेल। संक्रांति आती है और खेलों का उत्सव हो जाता है। कहीं पतंग तो कहीं सितोलिया, कहीं मार दड़ी तो कहीं गिल्ली और डंडा। महाभारत में गिल्ली-डंडे का ‘वीटा' नाम से विवरण है लेकिन प्रमाण गिल्ली को शुंगकाल तक ले जाते हैं। यह उस काल का खेल है जबकि मानव ने धातु प्रयोग करना नहीं सीखा था और लकड़ी का बहुत से क्रिया व्यापार में उपयोग करता था। शालभंजन (डालभांग), शाखकाष्ठ (डाल कामड़ी) जैसे कई खेल है न!

गिल्ली यानी डंडे का टुकड़ा, उसका तीसरा प्रमाण (1:3)। डंड यानी एक हाथ = 24 अंगुल। कुछ छोटी भी हो सकती है। मगर, तृतीयांश होने पर पीटे जाने पर उछलती अच्छी है। डाट-पाट में उछलती गिल्ली कहां तक पहुंचाई गई, उस आधार पर खेल स्थल से दंड प्रमाण भूमि का अनुमान लगाया जाता है। यह प्रमाण भूमि ही दूसरे पक्ष को अपनी बारी में खेलकर उतारनी पड़ती है।

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