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लघुकथाएं:बड़े गहरे अर्थ समेटती दो छोटी कहानियां

संजय सिंह4 महीने पहले
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  • छोटी-छोटी कहानियां अकसर बड़ी-बड़ी बातें कह जाती हैं। ये दो छोटी कहानियां भी इसी की मिसाल हैं।

लिंक

फोन पर विक्टर बाबू कह रहे थे- लिंक भेज चुका हूं। उंगली रखकर क्लिक करिएगा, बस सब समझ में आ जाएगा। -विक्टर भाई! ई सब चक्कर छोड़िए, जो कहना है फ़ोन पर ही कह दीजिए... मास्टर साहब ने कहा। वे हंसे- तब कैसे होगा मास्टर साहब? आप पढ़े-लिखे आदमी हैं। इस युग में आपका काम कैसे चलेगा? -नहीं चले, इस युग की चाल में मेरा विश्वास नहीं है। यंत्र-मानव बन गए हैं आप लोग... मैं तो कहूंगा आ जाइए! आम पक रहे हैं। दू-चार दिन रहकर चले जाइएगा... बात भी हो जाएगी। हम लोगों को तो साफ़ भूल गए हैं। आपकी बातों से जी ललचा गया! विक्टर बाबू बोले- अगली बार आएंगे, इस बार काम बहुत है... कोई लड़का होगा, तो उससे किसी तरह लिंक खुलवाइए। इमर्जेंसी है... -आप परेशान नहीं होइए! उन्होंने दु:खी होकर कहा- वह काम तो हो ही जाएगा, मगर आप दिल से कहिए। क्या सचमुच शहर से आने का मन नहीं होता? मन है भी कि मार दिए? विक्टर बाबू को सांप सूंघ गया। क्या कहें, क्या नहीं! मन होने से क्या होता है, एक-एक सांस जब इंगेज हो काम में... वे अपनी व्यस्तता के अहसास में डूबते चले गए। मास्टर साहब हेलो-हेलो करते रह गए। फ़ोन कुछ देर तक चालू रहा, पर आवाज़ ग़ायब। यह क्या हो गया? आख़िर उन्होंने फ़ोन रख दिया- ई विक्टर बाबू भी कितना बदल गए? साफ़ शहरी हो गए। बस काम से मतलब! पता नहीं, लिंक में कौन-सी बात है। फिर कुछ काग़ज़ होगा। साइन करके भेजना होगा। उन्हें मन हुआ कि फ़ोन खोलकर लिंक पर उंगली रखें, मगर फिर सोचा कल स्कूल में किसी लड़के से खुलवाना ठीक होगा। उनसे होगा भी नहीं! वे फिर उसी सोच में डूब गए।

हिसाब

कस्तूरी पूरे शहर में जहां-तहां घूमता रहता था, जैसे कुछ ढूंढ रहा हो। फिर आ गया और बोला- बाबू, दुनिया पर मेरा कुछ निकलता है, कोई हिसाब कर दे। कस्तूरी पागल था, इसलिए कोई उसका हिसाब नहीं करता था। बस खाने-पीने को कुछ दे दिया जाए, तो वह चला जाता। एक दिन मैंने मज़ाक़ में कहा- कस्तूरी आज मैं तुम्हारा हिसाब करूंगा, बोलो क्या बाक़ी है दुनिया पर? निकालो रुक़्क़ा, लालक़िला चाहिए कि ताजमहल? वह ख़ुश हो आया और बोला- मेरे पास एक नदी थी, वह कहां गई? एक जंगल था कौन ले गया? मेरे पाखी-परेबा कहां गए? मैं अकबकाया- यह कोई कैसे बताएगा? फिर मेरा हिसाब रहने दो- वह दु:खी होकर बोला। कुछ पल की चुप्प्पी के बाद मैंने कहा- अच्छा, तुम्हारा घर कहां है कस्तूरी?” -मालूम नहीं, भूल गया हूं। -घर में और लोग थे? -थे। बहुत लोग बाबू। -वे लोग अब कहां हैं? -क्या पता। उसने हाथ हिलाया -पागल कैसे हो गए? मैं असली सवाल पर आया। -दुनिया की चाल से। उसने कुछ सोचकर कहा। -ठीक कैसे होगे? -हिसाब मिलने पर। कस्तूरी एक समय के बाद काफ़ी बूढ़ा होकर मर गया। वह पागल क्यों हुआ, ठीक-ठीक कोई अनुमान नहीं कर सका। वैसे मुहल्ले के बड़े-बुज़ुर्ग आज भी कहते हैं कस्तूरी की तरह आदमी सोचने लगे तो कोई भी इस दुनिया में पागल हो जाएगा।

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