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बोधकथा:इशारों की भाषा समझना आसान भी होता है और कठिन भी, ऐसी ही दो हास्य कथाएं

हरिहर13 दिन पहले
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  • इशारों में अपनी बात समझाना और समझना भी एक कला ही है। इसी से सम्बंधित दो हास्य कथाएं।

किसी ग्राम में एक वृद्धा रहती थी। उस वृद्धा की यही कोशिश रहती थी कि कोई भी उसके दर से कभी भूखा न लौटे।

एक दिन की बात है एक फ़कीर बाबा उसके द्वार पर आए। वृद्धा ने बड़ी आवभगत की। भोजन का समय हो गया था इसलिए वृद्धा ने उन्हें स्वच्छ आसन पर बैठाया और भोजन पर आमंत्रित किया। बढ़िया पकवानों से थाली सजाकर उनके सामने रख दी एवं स्वयं सामने बैठकर हाथ का पंखा झुलाने लगी। यों तो थाली में अनेक व्यंजन थे, किंतु फ़कीर की नज़र सीधे पापड़ की थाली पर गई जो कि ठीक वृद्धा के पीछे रखी हुई थी। भूलवश वृद्धा थाली में पापड़ नहीं रख पाई थी। फ़कीर बाबा भोजन तो कर रहे थे किंतु उनके मन में पापड़ खाने की लालसा जाग उठी थी। यदि वे स्वयं से मांगें तो इसमें लज्जा बहुत उठानी पड़ती। वे यही सोचते रहे कि किस प्रकार वृद्धा का ध्यान इस ओर दिलाया जाए कि वे पापड़ रखना भूल गई हैं। कुछ ही देर में फ़कीर बोले, ‘अम्माजी, भोजन मिला तो मन तृप्त हो गया। आपके गांव के लोग बहुत अच्छे हैं। अभी मैं गांव की ओर आ रहा था तब की एक घटना बताता हूं। मैं पैदल आ ही रहा था कि अचानक एक बड़ा लम्बा और भयानक सांप मेरे सामने आ गया। मैं तो उसे देखकर इतना भयभीत हुआ कि प्राण सूख गए, लेकिन आपके गांव के एक सज्जन ने उसे पलभर में भगा दिया। आप यक़ीन मानिए वह सांप इतना बड़ा था कि यहां से उस पापड़ की थाली जितना लम्बा।' थाली की ओर देखते ही वृद्धा झट से बोली, ‘अरे, महाराज मैं तो आपको पापड़ रखना भूल ही गई।' इतना कहते ही झट से वृद्धा ने पापड़ उठाकर फ़कीर की थाली में रख दिए। फ़कीर ने मना करने का अभिनय किया किंतु पापड़ ले ही लिए। ...लेकिन

इशारों में कभी-कभी अर्थ का अनर्थ भी हो जाता है।

एक कथा ऐसी भी है —

एक बार की बात है। गांव में रहने वाले एक युवक का विवाह शहर की एक पढ़ी-लिखी, सुसंस्कृत स्त्री से हो गया।

एक बार बहुत समय तक गांव में रहने के बाद स्त्री अपने मायके को गई। मायके में पर्याप्त दिन गुज़ार देने के बाद गांव से पति उसे लेने शहर को गया। मायके में पत्नी ने अपने पति के बारे में बड़ी-बड़ी बातें कर रखी थीं कि वे कितने समझदार और बुद्धिमान हैं, किंतु वास्तव में उसका पति बौड़म क़िस्म का था। जब दामाद ससुराल पहुंचा तो बड़ी आवभगत हुई। सब लोगों ने उन्हें सम्मान दिया। जब भोजन का समय हुआ तो सब साथ भोजन करने बैठे। चूंकि पाहुने आए थे इसलिए विशेष भोज तैयार किया गया था जिसमें पूरी, तरकारी, लड्‌डू आदि बनाए गए थे। सबके सामने थाली में भोजन परोसा गया तो देखा कि छोटी-छोटी गोल-गोल पूरियां थीं। अब वह ठहरा अधिक भोजन करने वाला व्यक्ति और सफ़र की थकान भी थी, सो वह छोटी-छोटी पूरियों को एक ही बार में उदरस्थ करने लगा। ससुराल की स्त्रियां मुंह दबाकर हंसने लगीं। उसकी स्त्री को बड़ी लज्जा अाई कि उसकी इस हरकत के कारण वह हंसी का पात्र बन रही है। उसने सोचा कि जैसे ही मेरी ओर देखें तो इशारे से बोलूं। जैसे ही पति ने चूल्हे के पास बैठी पत्नी की ओर देखा तो पति को दो उंगलियां दिखाकर इशारे से बोली कि दो टुकड़े तो करके खाओ! पति को बड़ा हर्ष हुआ कि उसे कितनी समझदार और व्यवहारकुशल पत्नी मिली है। जानती है कि मुझे भूख लगी है और मैं थका हुआ हूं इसलिए कह रही है कि एक पूरी से क्या होगा, एक बार में दो-दो पूरियां खाओ। ऐसा इशारा समझकर वह दो पूरियों के बीच में सब्ज़ी को रखकर मज़े से खाने लगा। यह देखकर तो पत्नी को और ग़ुस्सा आया और उसने अपना सिर पीट लिया कि भगवान किस व्यक्ति से पाला पड़ गया है। पत्नी को सिर पीटता देखकर पति ने सोचा कि पत्नी कह रही है कि अन्न तो ईश्वर का प्रसाद होता है इसलिए भोजन को हमेशा अपने माथे से लगाकर खाना चाहिए। ऐसा जानकर वह दो पूरियों के बीच सब्ज़ी रखता और उसे पहले सिर से लगाता और फिर खाता। ससुराल वाले मुंह दबाकर हंसते रहे और बेचारी पत्नी सिर पीटकर रह गई।

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