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स्वाद-आबाद:क्रिसमस के मौक़े पर देशभर में बनते हैं इस तरह के विभिन्न पकवान

पुष्पेश पंत4 महीने पहले
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  • 2100 साल पहले बेथलेहैम के आकाश पर एक असाधारण चमकीला तारा उगा था। तारे को जिसे देखकर तीन बुद्धिमान व्यक्तियों को यह पता चल गया कि जिस महापुरुष के जन्म की प्रतीक्षा वे कर रहे थे, वाे धरती पर अवतरित हो गया है।
  • शिशु यीशु के जन्म दिन को ही संसार क्रिसमस के रूप में मनाता है। लेकिन हमारी समझ में इसे मात्र ईसाइयों का त्योहार मानना ग़लत है। विविधता से भरे भारत में विभिन्न धर्मों के अनुयायी रहते हैं और सभी एक-दूसरे के त्योहार का आनंद लेते हैं।
  • ख़ासकर वो ऐसे मौक़े पर बनाए जाने वाले व्यंजनों तथा पेयों का रसास्वादन करने में तनिक देर नहीं करते। तो क्रिसमस के इस अवसर पर इस बार के स्वाद-आबाद स्तंभ में स्वाद लीजिए बड़े दिन के पकवानों का..

मज़ेदार बात यह है कि क्रिसमस के साथ जुड़ा है क्रिसमस केक और क्रिसमस पुडिंग, परंतु इस त्योहार के बाक़ी व्यंजनों के बारे में हमारी जानकारी सीमित ही रहती है।

भारत के अलग-अलग सूबों में रहने वाले बड़े दिन के मौक़े पर केक तो खाते-खिलाते ही हैं, पर इस दिन दावत की मेज़ पर अनेक स्थानीय पारम्परिक व्यंजन भी पेश किए जाते हैं।

इस मामले में हमारे ज्ञानचक्षु खोलने वाले थे हमारे पत्रकार मित्र जौन दयाल, जिन्होंने हमें ‘मेरी क्रिसमस!’ कहने से टोकते हुए कहा था- ‘भाईजान मैं पैदा और बड़ा दिल्ली में हुआ। यहीं की ज़ुबान बोलता हूं, खाना यहीं का खाता हूं- फिर यह अंग्रेज़ियत का बोझ क्यों? क्या ‘बड़ा दिन मुबारक!’ कहकर ख़ुशी ज़ाहिर नहीं कर सकते?’

केरल में ईसाई खानपान
तभी से हम यह सोचने को विवश हुए कि आख़िर हिंदुस्तान ने इस ‘विदेशी’ समझे जाने वाले त्योहार को कैसे अपना बना लिया है। यह बात याद रखने लायक़ है कि ईसाई धर्म भारत में ईसा के जीवनकाल में ही पहुंच चुका था।

केरल का सीरियाई ईसाई समुदाय तब से यहां रह रहा है, जब पवित्र रोमन साम्राज्य की स्थापना भी नहीं हुई थी और न ही रोमन कैथोलिक चर्च के प्रमुख पोप का अभिषेक हुआ था। इन लोगों का रहन-सहन, वेशभूषा सब अन्य मलयालियों जैसी है- खाने को छोड़ कर। क्रिसमस के मौक़े पर यह लोग ऐसे मांस के व्यंजन बनाने से परहेज़ करते हैं, जिनको हिंदू या मुसलमान मित्र मेहमान नहीं खाते।

केरल में क्रिसमस के मौक़े पर मटन रोस्ट तैयार किया जाता है, जिसे पुदीने की चटनी के साथ खाया जाता है। अंडे की ज़र्दी से बनाई जाने वाली नाज़ुक मिठाई मुट्टमाला, तो कभी बत्तख़ का रोस्ट भी पकाया जाता है।

अंडे की ज़र्दी से बनाई जाने वाली मिठाई मुट्टमाला
अंडे की ज़र्दी से बनाई जाने वाली मिठाई मुट्टमाला

गोआ की दावतें
गोआ पर चार सौ साल से ज़्यादा ईसाई पुर्तगाली शासन रहा। इस कारण कई लोगों को यह ग़लतफ़हमी है कि इस राज्य में सबसे महत्वपूर्ण त्योहार क्रिसमस है।

यह याद रखने की ज़रूरत है कि आज गोआ की आबादी का बहुसंख्यक हिस्सा ईसाइयों का नहीं हिंदुओं का है। यह ठीक है कि बड़ा दिन वहां उत्साह से मनाया जाता है पर ज़्यादा आकर्षण तो फ़िएस्ता को लेकर है, जो जनवरी के मध्य तक चलता है। ​​​​

गोआवासी वैसे भी खाने-पीने में कसर नहीं करते, सो उनके लिए हर दिन बड़ा दिन रहता है। दिक़्क़त सिर्फ़ इतनी है कि जो मशहूर व्यंजन वहां लोकप्रिय हैं, जैसे कि सारपौटेल, विंडालू, ब्लड सौसेज आदि, वो मुसलमानों तथा हिंदुओं के लिए वर्जित मांस से तैयार किए जाते हैं।

अतः क्रिसमस का मज़ा लेने के लिए उनके पास स्थानीय बिबिएंका नामक परतदार केक का ही विकल्प बचा रहता है। इस केक को वनीला, नारियल, गुड़ से तैयार करते हैं।

तीन महानगरों की कहानी
बर्तानवी राज के दौर में क्रिसमस कलकत्ता, बम्बई तथा बैंगलौर में जोशोख़रोश के साथ मनाया जाता था।

1911 से पहले तक कलकत्ता ही राज की राजधानी थी, जहां गोरे हाकिम रहते थे। वहां इस मौक़े पर चायबाग़ानों पर अकेले रहने वाले ‘बौक्सवाले’ गोरे भी पहुंचते थे। अंग्रेज़ हुक्मरानों को खुश करने के लिए उतावले हिंदुस्तानियों की कमी भी इस प्रेसीडेंसी शहर में नहीं थी। केक तथा रोस्ट के अलावा तरह-तरह के कटलेट, चॉप एवं नफ़ीस पेस्ट्रियां, एक्लेयर आदि इस त्यौहार के व्यंजनों में अनायास जुड़ गए।

यह भी याद रखने लायक़ है कि अंग्रेज़ों से पहले भी बंगाल का परिचय यूरोपियों से हो चुका था- डच, फ्रांसीसी, इतालवी, आर्मेनियाई आदि, जिनसे बेकिंग का तरीक़ा और उनके त्योहारों की जानकारी बंगाली जुटा चुके थे।

आज भी इस मौसम में पार्क स्ट्रीट की मशहूर बेकरियों के नाम इस की गवाही देते है- फ्लूरी, मॉन्जीनी आदि। गर्मी से निजात पाने के लिए दार्जिलिंग था, जहां ईसाई मिशनरियों ने बेहतरीन स्कूल खोेले थे- सेंट पॉल जैसे। इनके छात्रावास में अंग्रेज़ी खाना ही मिलता था और क्रिसमस जैसे धार्मिक महत्व के त्योहार को भी यहां पारम्परिक तरीक़े से मनाया जाता था।

दिल्ली की दास्तान
बाद में जब राजधानी का स्थानांतरण दिल्ली हो गया तो गौरांग महाप्रभुओं के गुरुत्वाकर्षण का केंद्र भी बदल गया। गर्मियों में दफ़्तर शिमला ले जाए जाते थे और गोरे शासकों के प्रभाव में शिमला ही नहीं, मसूरी-नैनीताल जैसे हिल स्टेशनों में भी क्रिसमस एक बड़ा त्योहार बन गया।

अंग्रेज़ इस मौसम में बर्फ़ देखने को तरसने लगते थे। उनके स्वदेश में इन दिनों अच्छी-ख़ासी बर्फ़बारी होती थी। व्हाइट क्रिसमस का सुखद अनुभव पहाड़ों में ही सम्भव था।

एक बात और- दक्षिण भारत में नीलगिरि की पहाड़ियों पर चाय तथा कॉफ़ी की खेती करने वाले क्रिसमस से लेकर नववर्ष वाले सप्ताहांत तक जश्न मनाते थे। कभी ‘हंटिंग बॉल’ तो कभी फ़ैन्सी ड्रेस पार्टी। यही परम्परा कर्नाटक राज्य के कूर्ग प्रदेश में भी देखी जा सकती है।

केक और पुडिंग
इस दस्तावेज़ी बखान में खाने का ज़िक्र छूट रहा है। सबसे पहले केक! क्रिसमस केक तथा पुडिंग में अंतर समझने की ज़रूरत है। देखने में दोनों चॉकलेटी नज़र आते हैं पर केक ओवन में सेंका जाता है जबकि पुडिंग भाप से पकाया जाता है।

पुडिंग का मिश्रण महीने भर पहले तैयार किया जाता है- अंडे की ज़र्दी, मेवे, सूखे फल, मैदा और मदिरा! जब इसमें ख़ुमार पैदा हो जाए तभी मज़ा आता है। इसका स्वाद ‘रिच प्लम फ्रूट केक’ जैसा होता है। इसके ऊपर सजावट नहीं होती।

क्रिसमस केक पर चीनी की परत बर्फ़ का भान दिलाती है। इसके ऊपर सजावटी आकृतियां भी हो सकती हैं, जैसे चॉकलेट के लट्ठे पर बैठा बच्चा, क्रिसमस ट्री वग़ैरह। आज भी बहुत सारे लोग इष्ट मित्रों में बांटने के लिए यह केक थोक के भाव घर पर बनाते हैं।

चार दशक तक हर साल हमारे मित्र क्रिस्टोफ़र सामराज की माता जी हमारे लिए एक छोटा केक ज़रूर पकाती थीं। यह रस्म उनके देहांत के साथ ही स्मृतिशेष रह गई।

बचपन में मुक्तेश्वर नामक छोटे क़स्बे के डाक बंगले के मुसलमान ख़ानसामा चौकीदार इस अवसर पर आधा दर्जन पेस्ट्रियां और ‘करी पफ़’, ‘मिंस पाइ’ आदि अपने हिंदू ख़ैरख़्वाह (हमारे पिता) के लिए पहुंचाना नहीं भूलते थे।

केक-पुडिंग पर कुछ और
‘क्रिसमस केक’ सामान्य ‘फ्रूट केक’ की ही क़िस्म का होता है पर उससे गरिष्ठ, जिसमें मेवे, किशमिश और जायफल सरीखे सुवासित मसाले डाले जाते हैं। ऊपरी परत आइसिंग वाली रहती है और इस पर ‘सांटा क्लॉज़’ या बर्फ़ से ढ़के घर का नमूना सजा होता है। आम केक की तरह इसे ओवन में पकाया जाता है।

स्कॉटलैंड में इस अवसर पर जो ‘डंडी केक’ बनाया जाता है, उसमें व्हिस्की ज़रूर पड़ती है। अमेरिका में स्विस रोल को आइसिंग से ढंकना ‘यूलटाइड लॉग’ पेड़ की लकड़ी के मोटे कटे तने की याद दिलाता है।

जर्मनी में किशमिश वाली मीठी ‘स्टाेलिन ब्रेड’ बनाई जाती है, जो केक जैसी ही होती है।

‘क्रिसमस पुडिंग’ में इस्तेमाल होने वाली तेरह प्रमुख चीज़ें ईसा और उनके बारह अनुयायियों की याद दिलाती हैं। पारम्परिक नुस्ख़े के अनुसार इस सूची में अंडे, चर्बी, चीनी, किशमिश, मेवे के साथ दालचीनी, जायफल, रम, ब्रांडी और बियर भी शामिल हैं।

मदिरा की मात्रा इस मिश्रण को ख़राब होने से बचाती है। जब ब्रिटेन के साम्राज्य में सूर्यास्त नहीं होता था, तब यह पुडिंग उसका प्रतीक बन गया था, जिसमें सभी उपनिवेशों से प्राप्त होने वाले पदार्थ उदारता से ग्रहण किए जाते थे- कनाडा के सेब, भारत और श्रीलंका के मसाले, जमैका की रम और ऑस्ट्रेलिया के किशमिश और मुनक्के!

बड़े दिन का भोज
बड़े दिन के भोज के बारे में मतभेद है। कुछ लोगों का मानना है कि खाना परिवार के के साथ 24 दिसम्बर की रात खाया जाना चाहिए, जिसके बाद गिरजाघर में रात की मास-प्रार्थना में परिवार भाग ले सकता है।

यूरोप में इसी शाम बच्चे क्रिसमस कैरौल गाने निकलते हैं- ‘होली नाइट, साइलेंट नाइट!’ लेकिन ज़्यादातर लोग 25 की दोपहर यह भोज करते हैं।

जिस बात को हम ज़ोर देकर दोहराना चाहते हैं, वह यह है कि केक-पुडिंग के अलावा देश के सभी हिस्सों में लोग इस अवसर पर अपने पारम्परिक व्यंजन ही खाने की मेज़ पर परोसते हैं।

बीबीसी के वरिष्ठ पत्रकार सतीश इस दिन अपने दस्तरख़्वान पर दिल्ली के क़बाबों की बेहतरीन नुमाइश सजाते हैं और तरह-तरह के नायाब पुलाव चुनवाते हैं। हमारी मित्र फरियल बांग्लादेशी मुसलमान हैं उनके पति हिंदू। उनके यहां यह फ़र्क़ करना कठिन हो जाता है कि दावत ईद की है या बड़े दिन की! रान मुसल्लम, रोस्ट मुर्ग़ी या बत्तख़, बिरयानी, क़बाब-मछली का कलिया।

एंग्लो इंडियंस की रसोई
मात्र एक अपवाद रहा है- एंग्लो इंडियन समुदाय का, जो गोरे अंग्रेजों तथा भूरे हिंदुस्तानियों के बीच असहज संकर-संतानों की कड़ी थे।

एंग्लो इंडियन ज़्यादातर रेल विभाग में, पुलिस में, पब्लिक स्कूलों में काम करते थे। इनकी कुछ बस्तियां मशहूर थीं- जबलपुर, बैंगलोर, सिकंदराबाद। इनकी रसोई के ख़ास व्यंजन पूरब तथा पश्चिम को जोड़ने का प्रयास करते थे। ​​​​​​​मुर्ग़ी रोस्ट के अलावा ‘बैड वर्ड करी’ (कोफ्ते) ‘पिलाफ़ राइस’ (जाफ़रानी सुवासित चावल) आदि।

चाहे यह बड़ा दिन कहीं भी मना रहे हों, इनके व्यंजन इस अखिल भारतीय मेनू से ही चुने जाते थे। आज़ादी के बाद बड़ी संख्या में इनका आव्रजन ऑस्ट्रलिया-कनाडा आदि देशों को हुआ है और आज यह खाना तारा छाप होटलों के भोजन महोत्सवों में ‘राज का खाना’ कहकर बेचा जाता है।

पूर्वोत्तर में क्रिसमस पर्व
ज़रा रुख़ करें पूर्वोत्तरी राज्यों का। वहां नागालैंड, मेघालय, मिजोराम की बहुसंख्यक आबादी ईसाइयों की है। पर जहां तक खानपान का प्रश्न है, उनकी ज़ुबान पर अपने जनजातीय ज़ायक़े ही चढ़े हैं।

लिहाजा यहां पर बड़े दिन की दावत भी किसी दूसरे क़बाइली जलसे की तरह आयोजित की जाती है। लगभग यही ज़मीनी हक़ीक़त मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा के आदिवासी बहुल अंचल की है।

पहाड़ों पर क्रिसमस
शिमला, कुमाऊं, मसूरी की ठंड हो या नीलगिरि अथवा कूर्ग की- बड़े दिन के आसपास इसे दूर भगाने के लिए ‘रम पंच’ तथा ‘हॉट टाॅडी’ जैसे पेय अतिथियों के स्वागत के लिए तैयार रखे जाते हैं।

इनमें मदिरा नाम मात्र की होती है- चाय, फलों का रस, गरम मसाले तथा शहद ही इसे तृप्ति दायक बनाते हैं।

...और अंत में
बड़े दिन पर खाने-पीने की टोकरियों के आदान-प्रदान वाला दस्तूर बड़ा कष्टदायक है। अंग्रेज़ों को वह इसलिए रास आता था कि वह विलायत से आई सौग़ात को मिल-बांटकर निबटाते थे। हमने दीवाली पर इसका जो अंधानुसरण आरम्भ किया है, वह काम के आदमियों को घूस देने जैसा लगता है।

अब आप ख़ुद ही तय करें कि आम और ख़ास का यह त्याेहार आप इस बार कैसे मनाने जा रहे हैं।

(जेएनयू से अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्राध्यापक के रूप में सेवानिवृत्त हुए पुष्पेश पंत की गहरी पकड़ यों तो इतिहास, संस्कृति और विदेश नीतियों पर है, किंतु भोजन-रसिक और भारतीय पाक-कला के विशेषज्ञ के रूप में उनका एक अलहदा अंदाज़ नज़र आता है। उनकी पुस्तक ‘इंडिया : द कुकबुक’ को न्यूयॉर्क टाइम्स ने साल की बेहतरीन किताबों में शुमार किया था। )

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