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ज्ञानकोश:धृतराष्ट्र और पांडु के भाई थे विदुर, नीति और शास्त्र के विद्वान होने के कारण कहलाए महात्मा विदुर

9 दिन पहले
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  • 'विदुर नीति’ महाभारत युद्ध के पूर्व विदुर द्वारा धृतराष्ट्र को दिया गया नीति और धर्म का उपदेश है।
  • युद्ध के परिणामों को लेकर शंकित धृतराष्ट्र और विदुर के बीच जो संवाद हुआ वह महाभारत ग्रंथ के उद्योग पर्व में वर्णित है।
  • इसे ही कहा जाता है ‘विदुर नीति’...

मूर्ख कौन है
मूर्ख वह है जो शत्रु से मित्रता करता है और मित्रों-शुभचिंतकों को दुःख देता है, उनसे ईर्ष्या-द्वेष रखता है। हमेशा बुरे कार्यों में लिप्त रहता है। इसी तरह, अनावश्यक कर्म करने वाला, सभी पर संदेह करने वाला, आवश्यक व शीघ्र किए जाने वाले कार्यों को विलंब से करने वाला भी मूर्ख कहलाता है।

आयु कम करने वाले
अत्यधिक अभिमान, अति वाचालता, त्याग का अभाव, क्रोध, अपने बारे में ही सोचना यानी स्वार्थ और मित्रद्रोह, ये छह तीखी तलवारें हैं जो मनुष्यों की आयु को काटती हैं और उन्हें सौ वर्ष तक जीने नहीं देतीं। ये ही मनुष्यों का वध करती हैं, मृत्यु नहीं।

दु:खी रहने वाले
ईर्ष्यालु, औरों से घृणा करने वाला, असंतुष्ट, क्रोध करने वाला, शंकालु और दूसरों पर आश्रित रहने वाला– ये छह प्रकार के व्यक्ति हमेशा दु:खी रहते हैं।

दोष का भागी
मानव अकेला पाप करता है और उसका आनंद कई लोग उठाते हैं। आनंद उठाने वालों को कोई अंतर नहीं पड़ता, किंतु पाप करने वाला दोष का भागी बनता है।

झुकना ही बुद्धिमानी
जो धातु बिना गर्म किए मुड़ जाती है, उसे आग में नहीं तपाया जाता। जो काष्ठ ख़ुद झुका होता है, उसे कोई झुकाने का प्रयत्न नहीं करता। इसलिए बुद्धिमान मनुष्य को अधिक बलवान के सामने झुक जाना चाहिए। जो अपने से ज़्यादा बलवान के सामने झुकता है, वह एक तरह से इंद्रदेव को ही प्रणाम करता है।

उन्नति चाहते हैं तो
जो मनुष्य अपना और जगत का कल्याण अथवा उन्नति चाहता है, उसे तंद्रा, अधिक निद्रा, भय, क्रोध, आलस्य और प्रमाद इन छह दोषों को सदा के लिए त्याग देना चाहिए।

बचना चाहिए इनसे
ये दस प्रकार के व्यक्ति धर्म और नीति संबंधी बातों को महत्त्वहीन समझते हैं– नशे में धुत्त, लापरवाह, विक्षिप्त, थका हुआ, क्रोधित, भूख से पीड़ित, जल्दबाज़, लालची, भयभीत तथा कामांध। ये सभी विनाश की ओर ले जाते हैं, अत: ऐसे लोगों के साथ रहने से बचना चाहिए।

धन के दो दुरुपयोग
परिश्रम और नीतिगत ढंग से अर्जित धन के दो दुरुपयोग कहे गए हैं- पहला, कुपात्र को देना और दूसरा, सुपात्र को आवश्यकता पड़ने पर भी न देना ।

ज्ञानी की पहचान
ज्ञानी वह है जिसके कर्तव्य, सलाह और पहले से लिए गए निर्णय को केवल कार्य संपन्न होने पर ही अन्य लोग जान पाते हैं, जो किसी विषय को शीघ्र समझ लेता है किंतु उसके बारे में धैर्यपूर्वक सुनता है, जो अपने कार्यों को कामना से नहीं बल्कि बुद्धिमानी से पूरा करता है, और किसी के बारे में बिना पूछे व्यर्थ की बात नहीं करता है। एक अन्य स्थान पर विदुर कहते हैं− अपनी योग्यता से अच्छी तरह परिचित और उसी के अनुसार कल्याणकारी कार्य करने वाला ही सच्चा ज्ञानी कहलाता है। उसमें दुःख सहन करने की शक्ति होती है और वह विपरीत परिस्थिति में भी धर्म-पथ से नहीं डिगता।

भविष्य से आकलन
जो वृद्धि आगे चलकर नाश का कारण बनने वाली हो, उसे अधिक महत्व नहीं देना चाहिए और जो क्षय आगे चलकर प्रगति का कारण बनने वाला हो, ऐसे क्षय का भी आदर करना चाहिए।

प्रशंसा योग्य गुण
इन आठ गुणों से मनुष्य की प्रशंसा होती है– बुद्धि, कुलीनता, मानसिक संयम, ज्ञान, वीरता, कम बोलना, दान देना और दूसरे के उपकार को याद रखना।

स्वर्ग के भी ऊपर
शक्तिशाली होते हुए भी क्षमा कर देने वाला और निर्धन होते हुए भी दान देने वाला– ये दो प्रकार के व्यक्ति स्वर्ग के भी ऊपर स्थान पाते हैं।

किसकी रक्षा किससे
धर्म की रक्षा सत्य से, विद्या की रक्षा अभ्यास से, सौंदर्य की रक्षा स्वच्छता से और कुल की रक्षा सदाचार से होती है।

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