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  • What Happens When You Leave Someone To Leave The Railway Station And The Train Does Not Take The Name Of Moving Like The Feet Of Angad, Read A Funny Satire Of Shrilal Shukla

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विरासत:क्या हो जब आप किसी को रेलवे स्टेशन छोड़ने जाएं और ट्रेन अंगद के पांव की तरह हिलने का नाम ही न ले, पढ़ें श्रीलाल शुक्ल का एक मज़ेदार व्यंग्य

11 दिन पहले
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  • आप किसी को विदा कहने जाएं और तमाम औपचारिकताएं पूरी होने के बावजूद विदा की घड़ी पूरी न हो तो सबके लिए असहज कर देने वाली स्थिति बन जाती है। न उगलते बनती है न निगलते। न छोड़ते बनती है न साथ रहते।
  • कल्पना कीजिए अगर विदा की वैसी घड़ी किसी रेलवे प्लेटफ़ॉर्म पर निर्मित हो और अंगद के पांव की तरह रेलगाड़ी चलने का नाम न ले?
  • मध्यवर्गीय विडम्बनाओं के अद्‌भुत चितेरे श्रीलाल शुक्ल की क़लम से निकला यह व्यंग्य उसी का रोचक वृत्तांत प्रस्तुत करता है।

परिचय

श्रीलाल शुक्ल
वर्ष 1925 में अतरौली में जन्म। राग दरबारी के लेखक के रूप में उनकी कीर्ति अक्षय है। पद्मभूषण, ज्ञानपीठ, साहित्य भूषण, साहित्य अकादमी, यश भारती पुरस्कारों सहित शरद जोशी, मैथिलीशरण गुप्त, व्यास सम्मानों से अलंकृत। वर्ष 2011 में निधन।

वैसे तो मुझे स्टेशन जाकर लोगों को विदा देने का चलन नापसंद है, पर इस बार मुझे स्टेशन जाना पड़ा और मित्रों को विदा देनी पड़ी। इसके कई कारण थे। पहला तो यही कि वे मित्र थे। और, मित्रों के सामने सिद्धांत का प्रश्न उठाना ही बेकार होता है। दूसरे, वे आज निश्चय ही पहले दर्ज़े में सफ़र करने वाले थे, जिसके सामने खड़े होकर रूमाल हिलाना मुझे निहायत दिलचस्प हरकत जान पड़ती है।

इसलिए मैं स्टेशन पहुंचा। मित्र के और भी बहुत-से मित्र स्टेशन पर पहुंचे हुए थे। उनके विभाग के सब कर्मचारी भी वहीं मौजूद थे। प्लेटफ़ॉर्म पर अच्छी-ख़ासी रौनक थी। चारों ओर उत्साह फूटा-सा पड़ रहा था। अपने दफ़्तर में मित्र जैसे ठीक समय से पहुंचते थे, वैसे ही गाड़ी भी ठीक समय पर आ गई थी। अब उन्होंने स्वामिभक्त मातहतों के हाथों गले में मालाएं पहनीं, सबसे हाथ मिलाया, दो-चार रस्मी बातें कहीं और फ़र्स्ट क्लास के डिब्बे के इतने नज़दीक खड़े हो गए कि गाड़ी छूटने का ख़तरा न रहे।

गाड़ी छूटने वाली थी। लोगों ने सिगनल की ओर देखा। वह गिर चुका था। अब चूंकि कुछ और करना बाक़ी न था, इसलिए उन्होंने उन लोगों में से एक आदमी से बातें करनी शुरू कीं, जो ऊपरी मन से हर काम के आदमी को दावत के लिए बुलाते हैं और जिनकी दावतों को हर आदमी ऊपरी मन से हंसकर टाल दिया करता है। हमारे मित्र भी उनकी दावत टाल चुके थे। इसलिए वे कहने लगे इस बार आऊंगा तो आपके यहां रुकूंगा।

वे हंसने लगे। कहने लगे, आप ही का घर है। आने की सूचना भेज दीजिएगा। मोटर लेकर स्टेशन आ जाएंगे। तब मित्र ने कहा, इसमें तक़ल्लुफ़ की क्या ज़रूरत है। तक़ल्लुफ़ घर वालों से तो किया नहीं जाता। तब वे बोले, जाइए साहब, ऐसा ही घर वाला मानते तो आप बिना एक शाम हमारे ग़रीबख़ाने पर रूखा-सूखा खाए यों ही न निकल जाते। तब मित्र ने कहा कि ऐसी क्या बात है; आप ही का खाता हूं। तब वे हें-हें करने लगे। तभी गाड़ी ने सीटी दे दी और लोग आशापूर्वक सिगनल की ओर झांकने लगे। मैंंने इस बातचीत में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, क्योंकि मित्र को हमेशा मेरे ही यहां आकर रुकना था और हम दोनों इस बात को जानते थे। ठीक वैसे ही, जैसे मित्र दफ़्तर में आते तो समय से थे, पर जाने में हमेशा कुछ देर कर देते थे, वैसे ही समय हो जाने पर भी गाड़ी ने सीटी तो दे दी, पर चली नहीं।

इसलिए फिर रुक-रुक कर इन विषयों पर बातें होने लगीं कि मित्र को पहुंचते ही सबको चिठ्ठी लिखनी चाहिए और उस शहर में अमरूद अच्छे मिलते हैं और साहब, आइएगा तो अमरूद ज़रूर लाइएगा। पुराने नौकर ने बताया कि नाश्तेदान को बिस्तर के पीछे रख दिया है। पुराने हेड क्लर्क बोले कि बिस्तर का सिरहाना उधर के बजाय इधर होता तो अच्छा होता क्योंकि उधर कोयला उड़कर आएगा। तब हेड क्लर्क बोले कि नहीं, कोयला उधर नहीं आएगा बल्कि उधर से सीनरी अच्छी दिखेगी। तभी कैशियर बाबू आ गए; उन्होंने मित्र को दस रुपए की रेज़गारी दे दी। मित्र ने खुलेआम उनके कंधे को थपथपाया और खुले गले से उन्हें धन्यवाद दिया।

पर इस सबसे न तो कुछ होना था, न हुआ। लोग महीना-भर से जानते थे कि मित्र को जाना है। इसलिए मतलब की सभी बातें पहले ही अकेले में ख़त्म हो चुकी थीं और सबके सामने वे सभी बातें की जा चुकी थीं, जो सबके सामने कही जाती हैं। सामान रखा जा चुका था, टिकट ख़रीदा ही जा चुका था। मालाएं डाली ही जा चुकी थीं। हाथ या गले या दोनों मिल ही चुके थे। पर गाड़ी चलने का नाम तक न लेती थी। थिएटर में जब हीरो पर वार करने के लिए विलेन ख़ंज़र तानकर तिरछा खड़ा हो जाता है, उस वक़्त परदे की डो‌री अटक जाए तो सोचिए क्या होगा? कुछ वैसी ही हालत थी। परदा नहीं गिर रहा था।

चूंकि मेरे पास करने को कोई बात नहीं रह गई थी, इसलिए मैंं मित्र से कुछ दूर जाकर खड़ा हो गया और किसी ऐसे आदमी की तलाश करने लगा, जो बराबर बात कर सकता हो। जो ऐसा आदमी नज़र में आया, उसे मित्र की ओर ठेल भी दिया। उसने अपनी हमेशा वाली मुस्कान दिखाते हुए कहा, आपके जाने से यहां का क्लब सूना हो जाएगा। मित्र ने हंसकर इस तारीफ़ से इनकार किया।

उसने कहा, पहले ब्राउन साहब के ज़माने में टेनिस इसी तरह चली थी, पर अब देखिए क्या होता है। मित्र बोले, होता क्या है? आप चलाइए। तभी वे एकदम नाराज़ हो गए। तुनककर बोले, मैंं क्या चला सकता हूं जनाब, मुझे तो ये लड़के क्लब का सेक्रेटरी ही नहीं होने देना चाहते। अब कोई टिकियाचोर सेक्रेटरी हो तभी टेनिस चलेगी। मुझे तो ये निकालने पर आमादा हैं। बोलते-बोलते वे अकड़कर खड़े हो गए। मित्र ने हंसकर इस विषय को टाला। उसके बाद इनकी बातों का भी दिवाला पिट गया और बात आई-गई हो गई।

पर गाड़ी नहीं चली।

मित्र कुछ देर तक बेचैनी से सिगनल की ओर देखते रहे। कुछ लोग प्लेटफ़ॉर्म पर इधर-उधर टहलकर पान-सिगरेट के इंतज़ाम में लग गए। कुछ को अंतरराष्ट्रीय समस्याओं ने इस कदर बेज़ार किया कि वे पास के बुकस्टॉल पर अख़बार उलटने लगे। कुछ के मन में कला, कौशल और ग्रामोद्योगों के प्रति एकदम से प्रेम उत्पन्न हो गया। वे पास की एक दुकान पर जाकर हैंडिक्राफ़्ट के कुछ नमूने देखने लगे। तब एक पुराना स्थानीय नौकर मित्र के हाथ लग गया। उसे देखते ही अचानक मित्र के मन में समाजवादी व्यवस्था के प्रति विश्वास पैदा हो गया। वे हंसकर उसकी प्रशंसा करने लगे। वह रोकर अपनी पारिवारिक विपत्तियां सुनाने लगा।

अब मित्र बड़े करुणाजनक भाव से उसकी बातें सुनने लगे। कुछ टिकट-चेकर तेज़ी से आए और सामने से निकल गए। मित्र ने उनकी ओर देखा, पर जब तक वे कुछ बात करने की बात तय करें, वे आगे निकल गए। एक लम्बा-सा गार्ड सीटी बजाता हुआ निकला। हेड क्लर्क ने कहा, सुनिए साहब, पर यह उसने अनसुना कर दिया और सीटी बजाता हुआ आगे बढ़ गया।

पर गाड़ी फिर भी नहीं चली।

कुछ को परिस्थिति पर दया आई और वे मित्र के पास सिमट आए। पर घूम-घूमकर कई लोगों ने कई छोटे-छोटे गुट बना लिए और कला के लिए जैसे कला- वैसे बात के लिए बातें चल निकलीं। एक साहब की निगाह मित्र की फूलमालाओं पर गई। उनको उसी से प्रेरणा मिली। बोले, गेंदे के फूल भी क्या कमाल पैदा करते हैं। असली फूलमालाएं तो गेंदे के फूलों की ही बनती हैं।

बातचीत की सड़ियल मोटर एक बार जब धक्का खाकर स्टार्ट हो गई तो उसके फटफटाहट फिर क्या पूछना! दूसरे महाशय ने कहा, इंडिया में अभी तो जैसे हम बैलगाड़ी के लेवल से ऊपर नहीं उठे, वैसे ही फूलों के मामले में गेंदे से ऊपर नहीं उभर पाए। गाड़ियों में बैलगाड़ी, मिठाइयों में पेड़ा, फूलों में गेंदा, लीजिए जनाब, यही है आपका इंडियन कल्चर!

इसके जवाब में एक दूसरे साहब ने भीड़ के दूसरे कोने से चीखकर कहा, अंग्रेज़ चला गया पर अपनी औलाद छोड़ गया।

इधर से उन्होंने कहा, जी हां, आप जैसा हिंदुस्तानी रह गया, पर दिमाग़ बह गया। इतना कहकर जवाब में आने वाली बात का वार बचाने के लिए वे फिर मित्र की ओर मुख़ातिब हुए और कहने लगे, ‘बताइए साहब, गुलाब की वो-वो वैरायटी निकाली हैं कि…।’

तभी गार्ड ने फिर सीटी दी और वे चौंककर इंजिन की ओर देखने लगे। इंजिन एक नए ढंग से सी-सी करने लगा था। कुछ सेकंड तक यह आवाज़ चलती रही, पर उसके बाद फिर पहले वाली हालत आ गई, ठीक वैसे ही, जैसे दफ़्तर छोड़ने के पहले मित्र कभी-कभी कुर्सी से उठकर भी कोई नया काग़ज़ देखते ही फिर से बैठ जाते थे। इधर उस पुष्प-प्रेमी ने अपना व्याख्यान फिर से शुरू किया, हां साहब, तो अंग्रेज़ों ने गुलाब की वो-वो वैरायटी निकाली हैं कि कमाल हासिल है! सन बर्स्ट, पिंक पर्ल, लेडी हैलिंग्टन, ब्लैक प्रिंस, वाह! और अपने यहां? यहां तो जनाब वही पुराना टुइयां गुलाब लीजिए और ख़ुशबू का नगाड़ा बजाइए।

बात यहीं पर थी कि इस बार गार्ड ने सीटी दी। बहस थम गई। पर कुछ देर गाड़ी में कोई हरकत नहीं हुई। इसलिए वे दूसरे महाशय भी भीड़ को फाड़कर सामने आ गए। अकड़कर बोले, हां साहब, ज़रा फिर से तो चालू कीजिए वही पहले का दिमाग़ वाला मज़मून। मेरा तो भई, दिमाग़ हिंदुस्तानी ही है, पर आइए, आपके दिमाग को भी देख लें।

तब मित्र महोदय बड़े ज़ोर से हंसे और बोले, हातिम भाई और सक्सेना साहब में यह हमेशा ही चला करता है। याद रहेंगे, साहब, ये झगड़े भी याद रहेंगे।

इस तरह यह बात भी ख़त्म हुई। झगड़े को मजबूरन मैदान छोड़ना पड़ा। उधर सिग्नल गिरा हुआ था। इंजिन फिर से ‘सी-सी’ करने लगा था। पर गाड़ी अंगद के पांव-सी अपनी जगह टिकी थी।

भीड़ के पिछले हिस्से में दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर धीरे-धीरे किसी मित्र को समझा रहे थे, जनाब, जि़ंदगी में तीन-बटे-चार तो दबाव है, कोएर्शन का बोलबाला है, बाक़ी एक-बटे-चार अपनी तबीयत की ज़िंदगी है। देखिए न, मेरा काम तो एक तख़त से चल जाता है, फिर भी दूसरों के लिए ड्राइंग-रूम में सोफ़े डालने पड़ते हैं। तन ढांकने को एक धोती बहुत काफ़ी है, पर देखिए बाहर जाने के लिए यह सूट पहनना पड़ता है। यही कोएर्शन है। यही जि़ंदगी है। स्वाद ख़राब होने पर भी दूध छोड़कर कॉफ़ी पीता हूं, जासूसी उपन्यास पढ़ने का मन करता है पर कांट और हीगेल पढ़ता हूं, और जनाब गठिया का मरीज़ हूं, पर मित्रों के लिए स्टेशन आ कर घंटों खड़ा रहता हूं।

वे और उनके श्रोता, दोनों रहस्यपूर्ण ढंग से हंसने लगे और फिर मुझे अपने नज़दीक खड़ा पाकर ज़ोर से ठहाका लगाया, ताकि मुझे उनकी निश्छलता पर संदेह न हो सके।

गाड़ी फिर भी नहीं चली।

अब भीड़ तितर-बितर होने लगी थी और मित्र के मुंह पर एक ऐसी दयनीय मुस्कान आ गई थी, जो अपने लड़कों से झूठ बोलते समय, अपनी बीवी से चोरी-छिपे सिनेमा देखते समय या वोट मांगने में भविष्य के वादे करते समय हमारे मुंह पर आ जाती होगी। लगता था कि वे मुस्कराना तो चाहते हैं पर किसी से आंख नहीं मिलाना चाहते।

तभी अचानक गार्ड ने सीटी दी। झंडी हिलाई। इंजिन का भोंपू बजा और गाड़ी चलने को हुई। लोगों ने मित्र से उत्साहपूर्वक हाथ मिलाए। फिर मित्र ही डिब्बे में पहुंचकर लोगों से हाथ मिलाने लगे। कुछ लोग रूमाल हिलाने लगे। मैंं इसी दृश्य के लिए बेचैन हो रहा था। मैंंने भी रूमाल निकालना चाहा, पर रूमाल सदा की भांति घर पर ही छूट गया था। मैंं हाथ हिलाने लगा।

एक साहब वज़न लेने वाली मशीन पर बड़ी देर से अपना वज़न ले रहे थे और दूसरों का वज़न लेना देख रहे थे। गार्ड की सीटी सुनते ही वे दौड़कर आए और भीड़ को चीरते हुए मित्र तक पहुंचे। गाड़ी के चलते-चलते उन्होंने उत्साह से हाथ मिलाया। फिर गाड़ी को निश्चित रूप से चलती हुई पाकर हसरत से साथ बोले, ‘काश, कि यह गाड़ी यहीं रह जाती।’

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