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देशांतर:कोविड के बाद किस तरह की होगी दुनिया, क्या बदलाव होंगे और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके क्या मायने हैं

डॉ. रहीस सिंह3 महीने पहले
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  • इतिहास की पुनर्व्यंजना करने का यह उचित समय तो नहीं लेकिन कुछ विद्वान निरंतर विमर्शों में इस विषय को शामिल कर रहे हैं कि कोविड 19 के विदा लेने के बाद दुनिया कितनी बदलेगी।
  • ग्लोबल गवर्नेंस और विश्व-व्यवस्था पहले से चले आ रहे पैटर्न पर ही आगे सरकेंगे या इनमें उसी प्रकार से बदलाव आएंगे जैसे एंतोनाइन प्लेग के बाद रोमन साम्राज्य में, जस्टिनियन प्लेग के बाद बाइज़ेंटाइन साम्राज्य में और ब्लैक डेथ जैसी महामारी के बाद यूरोप में देखे गए थे।

अर्नेस्ट हेमिंग्वे के एक उपन्यास का नायक एक जगह पर कहता है कि दिवालिएपन के दो रास्ते हैं- पहला धीमा और दूसरा अकस्मात। लेकिन कई सभ्यताओं के पतन की कहानी पढ़ें तो ये दोनों ही रास्ते एक साथ दिखाई पड़ते हैं।

तथ्य बताते हैं कि सभ्यताओं का पतन क्रमिक था और ध्वंस अकस्मात। इसके बाद वे सिर्फ़ अपने निशान छोड़ पाईं, मूल्यों का तो हम केवल अनुमान लगा सकते हैं वहां पाए गए अवशेषों से।

कोविड के प्रभाव से आज की दुनिया में भी अनेक परिवर्तन हो रहे हैं। ये तब्दीलियां विश्व-व्यवस्था को कौन-सी दिशा देंगी, यह कहना मुश्किल है, लेकिन इतिहास के पन्नों पर दो तरह के विकल्पों को आसानी से देखा जा सकता है।

प्रथम है- नए धर्म का उभार और द्वितीय है पुनर्जागरण के साथ-साथ नई राजनीतिक और सभ्यतागत संरचनाओं का उदय। देखना यह है कि कोविड-19 के प्रभावों की छाया में बदलाव कैसा होगा? होगा भी या नहीं?

अब तक के विमर्शों में सम्भावनाओं से जुड़े जो विषय सामने आए हैं, वे कोविड-19 आपदा के दौर में अंतरराष्ट्रीयतावाद की उड़ती धज्जियों तथा राष्ट्र-राज्यवाद के बढ़ते फ़ैशन को केंद्र में रखकर रचे गए प्रतीत होते हैं।

इसलिए प्रमुख प्रश्नों में एक यह तो होना ही कि वैश्वीकरण अभी भी एक सच्चाई के रूप में प्रतिष्ठित रहेगा या फिर पसंद अथवा नापसंद जैसे विषय के रूप में अपनाया जाएगा? इसके अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय स्तर के कुछ नामी-गिरामी अध्येता और विचारक इस निष्कर्ष पर भी पहुंचते दिखे हैं कि विश्वव्यवस्था में शक्ति-संतुलन यथावत नहीं रहेगा, बल्कि शिफ्ट होगा।

ये मानते हैं कि कोविड-19 के बाद की दुनिया का नेतृत्व पश्चिम से पूरब की ओर खिसकेगा। यह बात मूलतः हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल रिलेशन के प्रोफ़ेसर वाॅल्ट कहते हैं। उनका मानना है कि दक्षिण कोरिया और सिंगापुर ने इस महामारी का सामना बेहतरीन तरीक़े से किया है। चीन ने भी शुरुआती गलतियों के बाद ख़ुद को सम्भाल लिया।

दूसरी तरफ़ यूरोप ओर अमेरिका महामारी के सामने लाचार दिखे। इसमें कोई संशय नहीं कि वेस्टर्न ब्रांड की साख गिरी है लेकिन क्या चीन की साख बढ़ी है? क्या चीन वास्तव में विश्व-व्यवस्था का नेतृत्व करने की योग्यता रखता है?

इस क्रम एक विषय यह भी आया कि वैश्वीकरण का अंत होगा और दुनिया आक्रामक राष्ट्रवाद की ओर बढ़ेगी। इसके नतीजे अच्छे नहीं होंगे। यह स्थापित तथ्य है कि किसी महायुद्ध या महामारी के बाद दुनिया के पुनर्निर्माण के लिए सहयोग और सहकार की ज़रूरत होती है। अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बिना शांतिप्रिय और स्थिर दुनिया नहीं हो सकती।

इसलिए एकजुटता ही आज का नया स्वार्थ होना चाहिए। लेकिन ऐसा दिख नहीं रहा है।

नेशन फ़र्स्ट की नीति बेहतर है लेकिन समादर भी अनिवार्य तत्व होना चाहिए, जो इस समय दिखाई नहीं दे रहा है फिर वह चाहे अमेरिका हो, चीन हो या फिर अन्य यूरोपीय देश। यह वैश्विक शांति और स्थिरता की दृष्टि से अनुकूल नहीं है।

इस बात की भी सम्भावना अधिक है कि ‘नेशन फ़र्स्ट’ की छाया में आक्रामक राष्ट्रवाद का निर्माण हो और इसका सहारा लेकर राष्ट्रों के अंदर निरंकुशता को बढ़ावा मिले। इसके उदाहरण चीन, तुर्की, रूस आदि देशों में देखे भी जा सकते हैं।

इस बात की सम्भावना भी अधिक जताई जा रही है कि उन देशों में व्यापक निगरानी व्यवस्था को लागू करना आसान हो जाएगा, जो अब तक इससे इन्कार करते रहे हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि ओवर द स्किन निगरानी की जगह अंडर द स्किन निगरानी आ जाएगी और सर्विलांस राज की शुरुआत होगी।

फलतः सरकारें और कम्पनियां हमारी भावनाओं का अंदाज़ा पहले ही लगाने में सफल हो जाएंगी। इसलिए यह भी सम्भव है कि वे हमारी भावनाओं से खिलवाड़ करें और वे जो चाहें हमें बेच दें, वह चाहे कोई उत्पाद हो या कोई लीडरशिप अथवा तंत्र।

आख़िर में बात पैटर्न पर आ टिकती है। जैसा कि दूसरी सदी में एंतोनाइन प्लेग के समय रोमन साम्राज्य में दिखा था या जस्टिनियन प्लेग की सदियों में बाइज़ेंटाइन साम्राज्य अथवा ब्लैक डेथ के समय यूरोप में दिखा था।

उल्लेखनीय है कि जब एंतोनियन प्लेग आया तो रोम के शासन ने इसके लिए ईसाइयों को ज़िम्मेदार ठहराया और जब ईसाई प्रभुत्व वाले यूरोप में 14वीं सदी के दौरान ब्लैक डेथ नाम की महामारी आई तो इसका दोष यहूदियों पर मढ़ा गया। अब जब कोरोना महामारी आई तो इसका ठीकरा 5जी तकनीक, अमेरिकी सेना, चीन और यहूदियों के माथे फोड़ा जा रहा है।

लेकिन इस बात की अनदेखी की जा रही है कि एंतोनियन और जस्टिनियन प्लेग फैलने के बाद पूरे यूरोप में ईसाई धर्म का प्रसार हुआ था किंतु ब्लैक डेथ महामारी के बाद लोगों की रुचि धर्म में कम हो गई, जिससे पुनर्जागरण काल आया और आधुनिक यूरोप का निर्माण हुआ। इस आधार पर तो इस बार भी जिस पर आरोप लगे हैं, वह अपनी रीढ़ सीधी कर दुनिया के सामने लीडरशिप का दावा करेगा?

कुछ देर के लिए मान लेते हैं कि आने वाले समय में दुनिया में बड़ी तब्दीली आएगी और शक्ति संतुलन पश्चिम से पूरब की ओर खिसक जाएगा। लेकिन कहां? बीजिंग की ओर? यह कैसे सम्भव है? इस प्रश्न के पीछे दो कारण हैं।

पहला यह कि कोविड-19 के दौरान चीन किन महान उत्तरदायित्वों से प्रेरित होकर अपनी सक्रियता दिखा रहा था? दूसरा यह कि एक ऐसा देश, जो लोकतंत्र में विश्वास ही न रखता हो, वह लोकतांत्रिक मूल्यों और मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के साथ दुनिया को आगे ले जाने का दावा कैसे कर सकता है?

ध्यान रहे कि जब कोरोना वैश्विक महामारी का आकार ग्रहण कर रही थी, तब चीनी सोशल मीडिया में इस तरह की कहानियां आ रही थीं कि यह महामारी अमेरिकी मिलिटरी जर्म वॉरफ़ेयर प्रोग्राम के ज़रिए फैली है।

वहीं प्रेस फ्रीडम ऑर्गनाइजेशन पीईएन अमेरीका की सीईओ सुज़ेन नोसेल ने फ़ॉरेन पॉलिसी वेबसाइट पर एक आर्टिकल में लिखा कि चीन को इस बात का डर था कि शुरुआती तौर पर इस संकट को नकारने और कुप्रबंधन से सामाजिक अव्यवस्था और आक्रोश पैदा हो सकता है। ऐसे में बीजिंग ने बड़े पैमाने पर आक्रामक तरीक़े से घरेलू और ग्लोबल प्रोपेगैंडा कैम्पेन शुरू दिया।

इसके माध्यम से चीन ने बीमारी को लेकर अपनी सख़्त अप्रोच को छिपाने, वैश्विक स्तर पर इस बीमारी के फैलने में अपनी भूमिका को दबाने और पश्चिमी देशों और ख़ासतौर पर अमेरिका के ख़िलाफ़ अपनी एक बढ़िया इमेज गढ़ने के प्रयास शुरू कर दिए।

इसके साथ ही चीन ने अपना माॅडल भी बेचा। अमेरिका में ही नहीं, बल्कि यूरोप में भी राष्ट्रपति ट्रम्प की आलोचना का एक दौर शुरू हो गया। लेकिन ट्रम्प प्रशासन ने इसकी क्षतिपूर्ति के लिए चाइनीज़ टेक्नोलॉजी (हुआवेई विवाद) और ईरान व दूसरे क्षेत्रीय मसलों को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया।

यही वजह है कि कैम्पबेल जैसे नीतिकारों ने कोरोना महामारी से अमेरिका का सम्बंध उसी तरह सुनिश्चित किया, जैसा कि स्वेज़ का ब्रिटेन से था। उन्होंने फ़ाॅरेन अफ़ेयर्स मैगज़ीन में लिखा कि स्वेज़ कैनाल पर कब्ज़े की 1956 में ब्रिटेन की नाकाम कोशिश ब्रिटेन की ताक़त के ख़त्म होने का अहम पड़ाव थी और इसने यूनाइटेड किंगडम का एक ग्लोबल पावर के तौर पर दर्जा ख़त्म कर दिया था।

आज अमेरिकी सरकार को समझना चाहिए कि अगर अमेरिका इस वक़्त की ज़रूरत को पूरा करने में नाकाम रहता है तो कोरोना वायरस अमेरिका के लिए एक स्वेज़ कैनाल जैसी घटना साबित हो सकता है। वास्तव में कोरोना वायरस के सामने अमेरिका ने भी संघर्ष किया लेकिन वह जीता नहीं।

जिस अमेरिका को दुनिया के दूसरे हिस्सों में एक परफ़ेक्ट नेशन के तौर पर देखा जाता था, वह तस्वीर अब बदल रही है। क्या अमेरिका में दो नई कोविड-वैक्सीन के सफल परीक्षण से उसके वर्चस्व की यथास्थिति बहाल होगी?

जो भी हो, ये स्थितियां विश्व को एक अनिश्चित दिशा प्रदान करने वाली लगती हैं। ऐसे में इस बात की सम्भावना अधिक है कि दुनिया युद्धोन्माद की ओर बढ़े। पहले से ही अमेरिका और चीन के बीच चल रहा संघर्ष बहुआयामी हो गया है।

महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि चीन नई विश्व व्यवस्था क़ायम करना चाहता है और अमेरिका अपनी पूर्व स्थिति को बचाए रखना चाहता है। यह संघर्ष कभी मुद्रा युद्ध के रूप, कभी व्यापार युद्ध के रूप में, कभी वैश्विक संस्थाओं के बराबर नई संस्थाओं की स्थापना या स्थापना हेतु प्रतिस्पर्धा के रूप में दिखेगा, जो स्वस्थ आर्थिक प्रतिस्पर्धा को या तो प्रभावित करेगा या फिर ग्लोबलाइज़ेशन के विपरीत नए क़िस्म के संरक्षणवाद को बढ़ावा देगा।

यह भी सम्भव है कि अब जो इकोनाॅमिक ब्लाॅक्स या मार्केट ब्लाॅक्स बनें, वे विशुद्ध आर्थिक न हों बल्कि उनमें जियो-पाॅलिटिकल हित भी शामिल हों।

यह स्थिति शीतयुद्ध जैसी बनेगी, जिससे वाॅर वेपन प्रतिस्पर्धा भी शुरू हो सकती है और युद्धोन्मादी वातावरण भी। चूंकि कोविड महामारी से वैश्विक जीडीपी ग्रोथ निगेटिव स्थिति में जा सकती है, यह स्थिति राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं के साथ-साथ कम्युनिटी इकोनाॅमीज़ को भी प्रभावित करेगी, इसलिए सामाजिक एवं क्षेत्रीय संघर्षों की सम्भावनाएं बढ़ेंगी।

एक बात और, अमेरिका तथा चीन के बीच टकराव एकरेखीय (लीनियर) नहीं है, बल्कि बहुआयामी (मल्टी डायमेंशनल) है, जिसमें जियोपोलिटिक्स है, जियोस्ट्रैटजी है, वाॅर टैक्टिक्स हैं और एकाधिकारवाद के साथ-साथ नवसाम्राज्यवाद के लिए युद्ध भी।

अगर पिछले दो दशकों की स्थितियों को देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि वैश्विक राजनीति ध्रुवीकरण की ओर बढ़ रही है। इसकी शुरुआत अमेरिकी वित्तीय संकट के समय से मानी जा सकती है अथवा उस दौर से जब अरब स्प्रिंग हुई। यानी अमेरिका ही नहीं बल्कि अमेरिकी वर्चस्व वाले देश भी संकट से गुज़रे। यही नहीं, अमेरिकी सैन्य गठबंधन वाले देशाें में निराशा का भाव पैदा हुआ और नाटो टूटने की कगार पर पहुंच गया।

परिणाम यह हुआ कि अरब स्प्रिंग के बाद लीबिया, मिस्र, ट्यूनीशिया जैसे देशों में जो सरकारें बनीं, वे कट्टरता का प्रतिनिधित्व कर रही थीं, जो अमेरिकी अपेक्षा के विपरीत थीं।

इसके बाद रूस के नेतृत्व में यूरेशियन इकोनाॅमी ब्लाॅक की शुरुआत हुई, जो ईयू की प्रतिद्वंद्विता में बना। इसका एक परिणाम यह रहा कि रूस ने यूक्रेन से क्रीमिया को छीन लिया। शंघाई सहयोग संगठन ताक़तवर हुआ।

दूसरी तरफ़ अमेरिका ने इंडो पैसिफ़िक में क्वाड्रिलैटरल की स्थापना की है, जिसका छुपा उद्देश्य चीन को रोकना है। इस सबके बीच एक ध्रुव ऐसा दिख रहा है जो माॅस्को-बीजिंग बाॅण्ड द्वारा ताक़त पा रहा है और दूसरी तरफ़ वॉशिंगटन अकेला है। अब अमेरिका को रिबैलेंसिंग या स्ट्राइकिंग में एक विकल्प का चुनाव करना होगा।

पहला उसके हाथ से लीडरशिप को छीन लेगा और दूसरा ध्रुवीकरण और युद्ध को बढ़ावा देगा। ऐसी स्थिति में शांति के बजाय अस्थिरता की ओर दुनिया जाती अधिक दिख रही है।

देखना होगा कि कोविड का प्रभाव अल्पकालिक होगा अथवा दीर्घकाल तक जाएगा। वैश्वीकरण समाप्त हो जाएगा या जारी रहेगा? पुरानी मान्यताएं टूटेंगी या बनी रहेंगी? अगर टूटेंगी तो नई व्यवस्था मानवीय मूल्यों से संचालित होगी या डाटा एल्गोरिदम से? अभी ऐसे बहुत-से प्रश्नों के उत्तर और संशयों के समाधान होने हैं। लेकिन इतना तय है कि विश्व-व्यवस्था कोई नया अवतार अवश्य लेगी।

(लेखक परिचय :

डॉ. रहीस सिंह

विदेश नीति सम्बंधी मामलों के विशेषज्ञ। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में विदेश-सम्बंधों के बारे में उनके आलेख प्रकाशित। इतिहास और राजनय पर उनकी पुस्तकें भी प्रकाशित हैं।)

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