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कहानी:जब एक सक्षम पुत्र अपनी वृद्ध मां से रुपए मांगने पहुंचा लेकिन एक दुविधा ने उसे घेर लिया

हरीश कुमार ‘अमित’13 दिन पहले
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  • किसी से कुछ मांगना और कुछ नहीं लेना — इन दो परिस्थितियों पर जितने कोण से सोचा जा सकता है, उसमें सबसे ज़रूरी है मांगने वाले या नहीं लेने वाले की फ़ौरी ज़रूरत का आकार।
  • इसी से तय होता है कि —मांगना कितना ज़रूरी था और लौटाने में कितनी ख़ुद्दारी थी।
  • यह कहानी इसी दोहरे-सच का सामना करती है।

मैं आकर बैठा ही था कि ट्रेन चल दी थी। न जाने क्यों ट्रेन का डिब्बा ख़ाली-ख़ाली-सा था। मैंने देखा मेरे सामनेवाली बर्थ पर साधारण-से कपड़े पहने एक स्त्री खिड़की के पासवाली सीट पर बैठी थी। जिस बर्थ पर मैं बैठा था, उसकी खिड़की वाली सीट के पास दो बच्चे बैठे थे- एक पांच-छह साल की लड़की और दूसरा तीनेक साल का लड़का। मैंने अनुमान लगाया कि वे दोनों सामने बैठी स्त्री के ही बच्चे होंगे। ट्रेन से मैं वापिस दिल्ली जा रहा था। दो दिन पहले ही अपने गांव आया था। गांव आना पांच-छह सालों बाद ही हो पाया था। आया भी अकेला ही था। आभा और टिन्नी-टिन्नू मेरे साथ नहीं आए थे। गांव आने का कार्यक्रम अचानक ही बन गया था। पिछले हफ़्ते लेडी डॉक्टर ने आभा को जल्दी ही एक ऑपरेशन करवा लेने की सलाह दी थी। मेरा गांव आना डॉक्टर की इसी सलाह का ही परिणाम था। ऑपरेशन पर क़रीब पचास हज़ार रुपए का ख़र्च होना था, जो डेढ़-दो महीने बाद मुझे दफ़्तर से वापिस मिल जाना था। फिलहाल यह ख़र्च मैं आसानी से उठा सकता था क्योंकि मेरे बैंक खाते में इससे कहीं ज़्यादा रक़म जमा थी। अपने भविष्य निधि खाते से भी मैं यह राशि निकलवा सकता था। इसके अलावा क्रेडिट कार्ड से भी हस्पताल को राशि अदा की जा सकती थी। कुल मिलाकर स्थिति यह थी कि ऑपरेशन के ख़र्च के लिए किसी से उधार मांगने की कोई ज़रूरत बिल्कुल नहीं थी। मगर फिर भी मैं गांव आया था- मां से पचास हज़ार रुपए मांगने। मां से पैसे लेने की बात दरअसल आभा के दिमाग़ की ही उपज थी। उसी ने सलाह दी थी कि मैं गांव जाकर मां से पचास हज़ार रुपए मांग लूं- यह कहकर कि इतनी रक़म ऑपरेशन पर ख़र्च होनी है। आभा की यह सलाह पहले-पहल तो मुझे बिल्कुल बचकानी और बेतुकी लगी थी, मगर जब उसने अपनी बात बार-बार दोहराई तो मुझे लगा कि ऐसा किया जा सकता है। आठ साल पहले पिता जी के अचानक गुज़र जाने के बाद मां अकेली ही गांव वाले घर में रह रही थीं। मेरी दोनों बहनों की शादी हो चुकी थी और वे दोनों अलग-अलग शहरों में रहती थीं। सरकारी नौकरी लग जाने पर पिछले पंद्रह सालों से मैं दिल्ली में रह रहा था। नौकरी की ज़रूरतों और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के कारण मेरा गांव जाना बहुत कम हो पाता था। अलबत्ता मेरी बहनें ज़रूर हर दूसरे-तीसरे महीने मां से मिलने जाया करती थीं। गांव में पिता जी के फलों के कई बाग़ थे जिनसे अच्छी-ख़ासी कमाई हो जाया करती थी। बाग़ों का ठेका जिस आदमी को दिया जाता था, वह बहुत ईमानदार था, जो संयोग से पिता जी को मिल गया था। पिछले कई सालों से बाग़ों का सारा काम वही संभाल रहा था और एक-एक पैसे का हिसाब करके साल में दो बार घर आकर पूरा पैसा दे जाया करता था। पिता जी के न रहने पर भी उस आदमी की ईमानदारी में कोई कमी नहीं आई थी। मां से पैसे लेने के पीछे आभा ने यह तर्क दिया था कि दिल्ली में किराए के घर में न रहकर अगर हम गांव वाले घर में रह रहे होते, तो हमें घर का किराया अदा न करना पड़ता। उसका कहना था कि पैसों को हम यह मानकर ले सकते हैं कि मां ने हमारे मकान के किराए का कुछ हिस्सा अदा किया है। आभा के इस तर्क के आगे मैं निरुत्तर हो गया था और गांव जाकर मां से पचास हज़ार रुपए मांगने के लिए तैयार भी। गांव जाने वाली इकलौती ट्रेन में एसी वाला एक ही डिब्बा होता था, लेकिन इतनी जल्दी उसमें रिज़र्वेशन मिल नहीं पाई थी। इसलिए जनरल डिब्बे में यात्रा करने के अलावा और कोई चारा नहीं था। वायुयान, एसी ट्रेन या डीलक्स बस में यात्रा करने का आदी हो जाने के कारण भीड़ भरे जनरल डिब्बे में यात्रा करना बड़ा कष्टकारी था, मगर पचास हज़ार रुपए मिल जाने की आशा ने यात्रा के सारे कष्टों को भुला दिया था। गांव पहुंचने पर मां बहुत प्यार से मिली थीं। मेरा अचानक आना उन्हें अंदर तक भिगो गया था। मां की उम्र हो चली थी, पर फिर भी घर का सारा काम-काज वे ख़ुद ही किया करती थीं। मां ने बड़े चाव से मेरा पसंदीदा खाना बनाकर बड़े प्यार से मुझे खिलाया था। खाना-वाना खाकर मैं असली मुद्दे पर आ गया था और आभा के ऑपरेशन के बारे में मां को बताने लगा था। फिर बातों-बातों में मैंने ऑपरेशन के लिए पचास हज़ार रुपयों की ज़रूरत के बारे में भी मां को बता दिया था। अगले दिन ही मां ने कपड़े की पोटली में बंधे पचास हज़ार रुपए मुझे दे दिए थे। इन्हीं विचारों में खोए-खोए मुझे पता ही नहीं चला कि ट्रेन कब एक स्टेशन पर आ रुकी। प्लेटफ़ॉर्म से आ रही आवाज़ों से मेरी तंद्रा टूटी। चाय, समोसे, पानी वग़ैरह बेचने वालों की मिली-जुली आवाज़ें सुनाई दे रही थीं। मैंने देखा कि वे दोनों बच्चे अपनी मां से खाने की कोई चीज़ दिला देने की ज़िद कर रहे थे। उनकी मां ने उन्हें कुछ ख़रीदकर नहीं दिया था। बस किसी तरह बहला लिया था। तब तक ट्रेन फिर चलने लगी थी। उसके बाद जिस स्टेशन पर भी ट्रेन रुकती, वे बच्चे अपनी ज़िद दोहराने लगते, लेकिन उनकी मां किसी-न-किसी तरह उन्हें बहला ही लेती। घर से लाई रोटी खाने को बच्चे तैयार नहीं थे। वे चाहते थे कि उन्हें प्लेटफ़ॉर्म पर बिक रही खाने की कोई चीज़ ले दी जाए। मुझे लग रहा था कि ख़स्ता आर्थिक स्थिति के कारण ही वह स्त्री बच्चों के लिए कुछ ख़रीद नहीं पा रही थी। मुझे भूख लगने लगी थी क्योंकि ट्रेन पकड़ने के चक्कर में घर से चलने से पहले मैं आधा-अधूरा नाश्ता ही कर पाया था। मेरी अटैची में खाने की बहुत सारी बढ़िया-बढ़िया चीज़ें मौजूद थीं। मुझे मालूम था कि गांव में ऐसी चीज़ें मिल नहीं पाएंगी, इसलिए गांव से वापिस दिल्ली तक के सफ़र के दौरान खाने के लिए ये चीज़ें मैंने दिल्ली से चलते वक़्त ही अटैची में रख ली थीं। मेरा मन कर रहा था कि अपनी अटैची से खाने का कोई सामान निकालकर खा लूं। इससे भूख तो मिटती ही, सफ़र की ऊब भी कुछ कम हो जाती, लेकिन उन बच्चों के कारण कुछ खाने की अपनी इच्छा मैं दबाए बैठा था। हालांकि न मैं उन्हें जानता था और न वे मुझे, पर उनके सामने कुछ खाने की बात सोचकर ही मैं एक अजीब-से संकोच से भर जाता था। यह भी लग रहा था कि बच्चों के सामने कुछ खा लेने से उनकी मां की भावनाएं आहत होंगी क्योंकि वह अपने बच्चों के लिए खाने की कोई चीज़ ख़रीद नहीं पा रही थी। स्टेशन आते-जाते रहे और बच्चों की ज़िद पर उनकी मां का उन्हें बहलाना, पुचकारना, समझाना या फिर हल्के-से डांटना जारी रहा। मैं काफ़ी देर तक अपनी भूख को दबाए बैठा रहा, लेकिन धीरे-धीरे आख़िरकार ऐसी स्थिति आ गई कि भूख को और बर्दाश्त कर पाना मुझे बड़ा मुश्किल लगने लगा। बड़े असमंजस की स्थिति में पड़ गया था मैं। पास में इतना सारा खाने का सामान होने के बावजूद मेरी आंतें भूख के मारे कुलबुला रही थीं। तभी मैंने देखा कि वह स्त्री सीट पर बैठे-बैठे ऊंघने लगी है। वे दोनों बच्चे भी उनींदे-से उसी स्त्री वाली बर्थ पर लेट गए थे। अपनी अटैची से कुछ निकालकर खा लेने का यह मुझे बढ़िया मौक़ा लगा। मैंने अटैची को सीट के नीचे से निकालकर अपने घुटनों पर रख लिया फिर उसे खोलकर उसमें से क्रीम वाले बिस्कुट और आलू के चिप्स का एक-एक पैकेट निकाल लिया। उसके बाद अटैची को अपनी सीट के नीचे खिसका दिया। पहले चिप्स खाने की इच्छा थी, इसलिए मैंने उसके पैकेट को खोलना शुरू किया। पैकेट खोलने की खड़खड़ाहट से वे दोनों बच्चे जाग गए और मेरी तरफ़ देखने लगे। तभी छोटा बच्चा बर्थ से उतरकर मेरी ओर बढ़ने लगा। उसका दायां हाथ भी आगे की तरफ़ फैला हुआ था मानो वह मुझसे खाने की किसी चीज़ की उम्मीद कर रहा हो। पैकेट से कुछ चिप्स निकालकर मैं उसे देने ही वाला था कि तभी बड़ी बच्ची भी तेज़ी से बर्थ से उतरी और उसने आगे बढ़कर छोटे बच्चे को थाम लिया। फिर वह कहने लगी, मांगते नहीं हैं किसी से कभी! बच्ची की बात सुनते ही मेरी आंखों के सामने मां के आगे फैली हुई अपनी हथेली घूम गई। पैंट की चोर जेब में रखे पचास हज़ार रुपयों के भारी बोझ तले मेरा मन बुरी तरह दबने लगा। तभी गाड़ी की गति धीमी पड़ने लगी। अगला स्टेशन आने वाला था। कुछ ही देर बाद अपनी अटैची हाथ में लिए मैं रेलवे स्टेशन से बाहर निकल रहा था- वापिस गांव जाकर मां को पचास हज़ार रुपए लौटाने के लिए। मुझे अच्छी तरह मालूम था कि इस वक़्त गांव जाने के लिए भीड़ भरी बस के अलावा और कोई साधन नहीं मिलेगा, लेकिन ऐसी बस में सफ़र करने में मुझे कोई हिचक नहीं हो रही थी। आंखों के आगे भीख की मुद्रा में मां के आगे फैली मेरी हथेली लगातार नाचे चली जा रही थी। मुझे अच्छी तरह पता था कि हथेली का यह नाच तब तक ख़त्म नहीं होगा जब तक मैं मां को रुपए लौटा नहीं देता।

(हरीश कुमार 'अमित'

वर्ष 1958 में दिल्ली में जन्म। हिंदी और पत्रकारिता की पढ़ाई। कविता, ग़ज़ल, कहानी, बाल साहित्य की दस पुस्तकें प्रकाशित। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का नियमित प्रकाशन। आकाशवाणी से भी प्रसारण। चिल्ड्रंस बुक ट्रस्ट सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं से पुरस्कृत।)

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