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आशा-जनक:जब कोई काम पूरे दिल से, निष्ठा से, पूरे समर्पण से किया जाए तो वह पूजा बन जाता है- महात्रया रा

महात्रया रा16 दिन पहले
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1 नींबू लें और उसे बीच में से काट लें। उसे दबाकर उसका रस गिलास में निकाल लें। उसमें ज़रूरत के अनुसार चीनी और चुटकीभर नमक डालें- काला नमक हो तो और भी अच्छा रहेगा। गिलास में ठंडा पानी भर लें और चम्मच से अच्छी तरह मिला लें। शिकंजी तैयार है। यह आसानी से तैयार की जा सकती है, लेकिन फिर भी दो अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा बनाई गई शिकंजी का स्वाद एक जैसा नहीं होगा। नींबू, चीनी, नमक और पानी के अलावा कोई अदृश्य चीज़ भी होती है जो शिकंजी बनाते समय प्रयोग की जाती है- और वही स्वाद में फ़र्क़ पैदा कर देती है। हम जो कुछ भी बनाते हैं, तैयार करते हैं, उसमें एक अदृश्य घटक डालते हैं, और यह घटक ही बेहतर और बेहतरीन, साधारण व असाधारण और अच्छे व उत्कृष्ट के बीच अंतर पैदा कर देता है। जो भी काम किया गया है, वह प्रेम और प्रसन्नता के साथ किया गया है या उदासीनता, भावशून्यता व अरुचि के साथ? इसी पर सब निर्भर करता है। कोई भी काम हो, उसे करने में हृदय का, भावना का पुट होना ही वह अदृश्य चीज़ है। जो काम किया गया, उसमें हृदय का, भावना का पुट क्या 101 प्रतिशत रहा है- यही है निर्णायक प्रश्न। एक बार मैंने अपनी बेटी से कह ही दिया- ‘कुट्‌टी, तुम कुकिंग या तो प्रेम और प्रसन्नता से किया करो या फिर मत किया करो। मुझे स्वाद के फ़र्क़ से यह महसूस हो जाता है।’ परोसे गए भोजन में या तो जीवंतता होती है या वह बेजान-सा लगता है। और यह फ़र्क़ इस पर आधारित होता है कि उसे बनाने में हृदय का, भावना का कितना प्रयोग किया गया है। निष्ठा और समर्पण ऐसे गुण नहीं हैं, जो केवल पूजास्थल और ईश्वर की वेदिका के लिए बचाकर रख दिए जाने के लिए हों। जो कुछ भी हम करें, निष्ठा और समर्पण के साथ ही करें… जो कुछ भी हम करें, उसमें हृदय का, भावना का योगदान 101 प्रतिशत हो तो वह निष्ठा व समर्पण हो जाता है। धर्म के अर्पण में आप वह देते हैं, जो आप दे सकते हैं। लेकिन निष्ठा व समर्पण में तो आप ख़ुद को ही अर्पित कर देते हैं। समर्पण की पवित्रता के साथ किया गया कोई भी काम पूजा बन जाता है। एकाग्रता, ख़ुशी और प्रेम, निष्ठा व समर्पण के सह-उत्पाद हैं। सिर्फ़ निष्ठा व समर्पण से ही यथार्थता, कौशल एवं प्रभामण्डल की प्राप्ति होती है। थकान और निष्ठा विपरीत ढंग से बराबर होते हैं। जब हम अपना हर काम निष्ठा के साथ करने लगते हैं, केवल तभी हम प्रकृति का यह अघोषित विधान जान पाते हैं कि- ‘मनुष्य थकने के लिहाज़ से नहीं बनाया गया है।’ आप यदि किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जो थकना नहीं जानता, तो समझ लें कि आप एक ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जिसके लिए हर कार्य निष्ठा की, उपासना की अभिव्यक्ति है और उसका प्रत्येक कार्य पूजा है।

ज़िंदगी को जश्न बनाने के लिए

जीवन को कोल्हू के चक्कर की तरह बना लेना कोई ज़रूरी तो नहीं है। जीवन का उबाऊ होना भी ज़रूरी नहीं है। जीवन सालभर के ऋतु-चक्र को पूरा करके उसकी पुनरावृत्ति करते रहने जैसा भी नहीं है। जीवन थोपा हुआ होना भी ज़रूरी नहीं है। जीवन कोई आजीवन कारावास भी नहीं है। जीवन, मात्र जीवित रहने से कुछ ज़्यादा भी है। हर वर्ष कोई नई निपुणता प्राप्त करें और देखें कि जीवन कितना जीवंत है। जीवन में ऐसा कोई समय, ऐसी कोई अवस्था न आने दें, जिन दिनों आप एक सक्रिय छात्र की तरह कुछ न कुछ सीख न रहे हों। सीखने के लिए ऐसी असंख्य चीज़ों की सूची वास्तव में बहुत लंबी है। सदैव खोजी बने रहें। प्रयोग-परीक्षण करते रहें। कोशिश करते रहें। अपनी उत्सुकता, जिज्ञासा और कौतूहल को बनाए रखें। कोई ऐसा काम करने की कोशिश करें, जो आपने पहले न किया हो। नए-नए व्यंजन बनाने में हाथ आज़माएं। उन वस्त्रों को पहनें, जिन्हें पहनने में आप सकुचाते रहे हैं। कोई नई हेयर स्टाइल आज़माएं। ऐसे स्थानों पर जाएं जहां आप अभी तक न गए हों। यदि आप पुरुष हैं तो एक दिन रसोई संभालें। किसी रविवार को एक छोटा-सा पति-सम्मेलन करें और पत्नियों को अतिथि-रूप में भोजन परोसें। किसी दिन आंख पर पट्‌टी बांधकर रहें, किसी दिन अपने वाहन के बजाय सार्वजनिक वाहनों का प्रयोग करें, कार्यस्थल पर किसी दिन भूमिकाएं बदलकर देखें- कैसा रहे कि प्रबंध निदेशक एक दिन रिसेप्शन पर बैठे? इस सूची का भी कोई छोर नहीं है। जीवन के साथ सृजनात्मक रहें। बस ऐसे ही कुछ न कुछ करते रहें। आपकी सारी सफलताओं, उपलब्धियों और हासिल किए गए तमाम मुक़ामों से भी ज़्यादा है जीवंत जीवन जीने के लिए अपने आपसे अक्सर यह प्रश्न पूछते रहना कि- पिछली बार कब मैंने किसी काम को पहली बार किया था? जीवन को जश्न बना लें। हर दिन अपनी उपस्थिति दर्ज कराएं। जीवन बड़ा बनाएं। जीवंत रहने के लिए जोश में रहें।

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