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  • When Humans Were Defeated By Birds And A Soldier Fought A War For 29 Years, Some Incidents That Took Place Around The World Would Surprise You.

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अजब-ग़ज़ब:जब मनुष्य को पक्षियों ने हरा दिया था और एक सैनिक 29 वर्ष तक युद्ध लड़ता रहा था, दुनियाभर में घटी कुछ ऐसी घटनाएं जो आपको आश्चर्य से भर देंगी

द्विजराज4 महीने पहले
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दुनिया बहुत बड़ी है। बहुत बड़ी दुनिया में बहुत सारी घटनाओं होती हैं। सभी तो हम कभी जान नहीं सकते। बहुतेरी ऐसी भी होती हैं, जिन्हें जान पाते तो भी पहले-पहल उन पर यक़ीन नहीं कर पाते। आइए जानते हैं, ऐसी ही कुछ घटनाओं के बारे में।

जब एक शांतिप्रिय राष्ट्र ने युद्ध में भाग लिया

लिस्टेंटाइन- यूरोप में एक छोटा-सा देश। इतना छोटा कि यह दुनिया के सबसे छोटे राष्ट्रों में से एक है। और तो और इसकी अपनी कोई आधिकारिक सेना भी नहीं है।

आख़िरी बार इस देश ने अपनी सेना का उपयोग किया था वर्ष 1866 में। उस समय ऑस्ट्रो-प्रशियन युद्ध चल रहा था।

लिस्टेंटाइन ने भी अपनी सेना तैयार की। सेना में थे कुल 80 सैनिक। साज़ाे-सामान तैयार किया गया, कमर कस ली गई और सभी सैनिकों की तैनाती ऑस्ट्रिया-इटली सीमा पर ब्रेनर दर्रे पर कर दी गई। लेकिन असल में करने के लिए उनके पास कोई विशेष कार्य नहीं था।

वे ख़ूबसूरत पहाड़ निहारते, शराब-सिगरेट पीते और आराम करते। जब वे अपने इस कार्य से वापस लौटे तो उनकी संख्या 81 थी। एक इटली का सैनिक भी ख़ुश होकर उनके साथ लिस्टेंटाइन आ गया था। सबसे ख़ास बात यह कि यह आख़िरी मौक़ा था जब इस देश ने किसी युद्ध में भाग लिया था।

उसके बाद सेना को भंग कर दिया गया। देश छोटा है किंतु इतना सम्पन्न है कि कि यहां के राजा यूरोप के सबसे रईस शासक हैं।

मज़ेदार मैराथन
अमेरिका के सेंट लुइस में 1904 में ग्रीष्म ओलिम्पिक का आयोजन किया गया था। इस आयोजन की पुरुष मैराथन बेहद दिलचस्प रही थी क्योंकि इस मैराथन को आधे से भी कम प्रतिस्पर्धी पूरी कर पाए थे।

ख़ैर, स्पर्धा में चीटिंग करने वालों की भी कमी न थी। प्रथम स्थान पर दौड़ ख़त्म करने वाले फ्रेड लोर्ज़ ने बीच रास्ते में लिफ़्ट लेकर 10 मील की दूरी तय की थी और फिर दौड़कर फ़िनिश लाइन तक आए थे। लिहाज़ा उन्हें अयोग्य करार दे दिया गया था।

दूसरे स्थान पर रहे थॉमस हिक्स ने एग वाइट और चूहे मारने वाला ड्रग खा लिया था, ताकि वे तेज़ी से दौड़ पाएं, परंतु इसका प्रतिकूल असर हो गया। रेस के दौरान उनकी तबीयत बहुत अधिक ख़राब हो गई और दो ट्रेनर्स उन्हें फ़िनिश लाइन तक लेकर आए। निर्णायकों को इस बात पर कोई आपत्ति न थी और उन्होंने थाॅमस को स्वर्ण पदक से नवाज़ा।

दौड़ में क्यूबा के एंड्रिन कार्वाहाल भी शामिल थे। उन्होंने पूरे क्यूबा में दौड़-दौड़कर चैरिटी के माध्यम से ओलिम्पिक में भाग लेने के लिए पैसा इकठ्‌ठा किया था। लेकिन अमेरिका पहुंचते ही सारा पैसा जुएं में उड़ा दिया।

वे फ़ुल पैंट में ही रेस में भाग लेने पहुंचे। तब एक साथी धावक ने चाक़ू से काटकर पैंट को शॉर्ट्स बना दिया था। कार्वाहाल रेस के दौरान एक जगह नाश्ते के लिए रुके तो वहीं साे गए। सोकर उठने के बाद उन्हाेंने फिर से दौड़ना शुरू किया और इसके बावजूद चौथा स्थान हासिल करने में सफल रहे।

29 वर्ष तक जंग!

बात दूसरे विश्वयुद्ध के समय की है। जापान ने कई जगहों पर अपने ख़ुफ़िया अफ़सरों को भेजा था, उनमें से एक थे हीरु ओनोडा।

हीरु गुरिल्ला युद्धनीति में सिद्धहस्त थे। उन्हें 1945 की शुरुआत में फिलीपींस के लुबैंग आइलैंड पर भेजा गया। उन्हें अपने अधिकारियों द्वारा आख़िरी आदेश मिला था- रुको और लड़ो। हीरु ने इस आदेश का पालन 29 वर्षों तक किया!

जी हां। 1945 में युद्ध तो ख़त्म हो गया किंतु घने जंगल वाले जज़ीरे पर हीरु और उनके साथियों को पता ही नहीं चला कि जापान ने समर्पण कर दिया है।

अलबत्ता उन्हें एक पत्र भेजा गया था, जिसमें युद्ध ख़त्म होने का ज़िक्र था, किंतु उन्होंने उसे शत्रुओं की चाल माना और जंगल में छिपते-छिपाते हुए मोर्चा सम्भाले रखा।

29 वर्ष बाद 1974 में हीरु को ढूंढा गया। उन्हें लेने उनके पूर्व कमांडर फिलीपींस पहुंचे। उन्हें तब तक भी यक़ीन था कि जंग अभी ख़त्म नहीं हुई है।

कमांडर ने आधिकारिक रूप से उन्हें सेवामुक्त किया और तब जाकर वे जापान में अपने घर लौटे। टोक्यो में हीरु का एक हीरो की तरह स्वागत हुआ था।

मानव और पक्षी का ऐतिहासिक युद्ध
वर्ष 1932 में ऑस्ट्रेलिया सरकार ने एमू पक्षी के ख़िलाफ़ युद्ध की घोषणा कर दी थी। एमू विश्व का दूसरा सबसे बड़ा पक्षी है और ये मुख्यत: ऑस्ट्रेलिया में पाया जाता है।

कारण यह था कि ऑस्ट्रेलिया के कैम्पियन ज़िले में 20 हज़ार एमू पक्षियों ने खेती की ज़मीन को भारी नुक़सान पहुंचा दिया था। 10 हज़ार राउंड गोला-बारूद के साथ छोटी-सी सैन्य टुकड़ी को भेजा गया। पहला हमला हुआ। लेकिन एमू किसी तरह से जान बचाकर भागने में क़ामयाब हो गए थे।

उन्होंने ख़तरा भांप लिया और छोटे-छोटे समूहों में विभाजित हाेकर अलग-अलग दिशाओं में दौड़ लगा दी। जैसे ही गोलाबारी शुरू होती, वे तेज़ी से भागते हुए ख़ुद काे बचा लेते।

दूसरे दिन घात लगाकर पक्षियों पर वार किया गया। किंतु मारे गए एमू की संख्या एक दर्जन भी न थी। मशीन गनों को ट्रक पर लादकर जवान एमू के पीछे लग गए, किंतु एमू को नहीं पकड़ पाए। कारण, एमू के समूहों में एक नेता होता था, जो आस-पास नज़र रखता था और बाक़ी सदस्य गेहूं खाने में व्यस्त होते थे।

हमला होने की स्थिति में समूह का नेता तब तक सामने रहता था, जब तक सभी सदस्य सुरक्षित दूरी पर न पहुंच जाते थे। तमाम कोशिशों के बाद भी सेना को कोई ख़ास सफलता नहीं मिली।

अंतत: सरकार को घुटने टेकने पड़े और और एमू पक्षियों ने मनुष्य पर एक ऐतिहासिक जीत दर्ज की।

टोपियों की लूट
18 वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में बेंजामिन होर्निगोल्ड नामक अंग्रेज़ी समुद्री लुटेरे ने अपने दल के साथ एक यात्री जहाज़ पर आक्रमण कर दिया। थोड़ी ही देर में लुटेरों ने जहाज़ को अपने नियंत्रण में ले लिया और सभी बंदियों को जहाज़ के ऊपरी तल पर एक ओर खड़ा कर दिया गया।

यात्री मान चुके थे कि यह उनके जीवन का आख़िरी दिन था! तभी दस्युओं के समूह में से एक लुटेरा सामने आया। उसने ऊंची आवाज़ में कहना शुरू किया- ‘सभी यात्री अपनी हैट (टोपी) उतारकर हमें दे दो। किसी ने भी होशियारी करने की कोशिश की तो उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा।’

सभी डरे-सहमे यात्रियों ने उन्हें हैट उतारकर दे दी। टोपियां बटोरकर लुटेरे ख़ुशी-ख़ुशी जाने लगे। यात्रियों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा।

एक यात्री ने थोड़ा साहस कर घिघियाते हुए पूछा- ‘हुज़ूर, सिर्फ़ टोपी! बात समझ में नहीं आई?’ एक लुटेरा रौबदार आवाज़ में बोला-‘बात यूं है कि कल रात हमने बहुत ज़्यादा शराब पी ली थी और सभी ने अपनी हैट उछालकर खो दी, इसलिए हम बस ये हैट ही लेने आए थे।’ इतना कहकर वह लुटेरा भी अपने जहाज़ पर वापिस चला गया।

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