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कहानी:जब दो अजनबी यात्रियों को मिली आरएसी सीट, लेकिन भला कौन जानता था कि आरएसी के ये साथी जीवन की कन्फर्म टिकट पर सफ़र करेंगे

अरुण अर्णव खरे15 दिन पहले
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  • ज़िंदगी के सफ़र में कौन, कहां मिल जाए, कोई नहीं जानता। ऊपर से देखने पर भले लगे कि योग-संयोग है, आज यहां हैं, कल कहां होंगे...
  • लेकिन कभी-कभी किसी से ऐसे तार जुड़ जाते हैं कि जीवनभर का नाता बन जाता है। तब इससे भी फ़र्क़ नहीं पड़ता कि जिस यात्रा में भेंट हुई थी, वह कन्फ़र्म्ड थी या नहीं- ज़िंदगी के टाइम-टेबल में आर.ए.सी. के दूसरे मायने भी हो सकते हैं।

शा लिनी सिंह से मुलाक़ात महज़ इत्तफ़ाक़ थी। तीन साल होने को आए, जब उससे पहली मुलाक़ात हुई थी। उसमें ऐसा कुछ नहीं था, जो पहली नज़र में ध्यान खींचता। सांवला रंग, भरा हुआ शरीर, आंखों पर गोल फ्रेम का मोटा चश्मा। जींस और टी-शर्ट में वह कुछ अधिक मोटी भी लग रही थी। साइड बर्थ के नीचे अपना सामान रखने के लिए जब वह झुकी थी तो उसकी टी-शर्ट कमर से ऊपर चढ़ गई थी। यही वो एक पल और कारण था जब मैंने उस पर एक उचाट-सी दृष्टि डाली थी। कर्नाटक सम्पर्क क्रांति की एस-5 बोगी की बर्थ नम्बर 23 के सहयात्री थे हम। हम दोनों का ही आर.ए.सी. टिकट था, जो कन्फ़र्म नहीं हुआ था। भीड़ को देखते हुए कन्फ़र्म होने की उम्मीद भी नहीं थी। चार दिन बाद दीपावली थी। बीस दिन पहले टिकट बुक कराने के बावजूद वेटिंग का टिकट आर.ए.सी. पर आकर अटक गया था। शालिनी की भी यही कहानी थी। उसने तो मुझसे भी दो दिन पूर्व रिज़र्वेशन कराया था। हैदराबाद आने के बाद यह तीसरा अवसर था, जब मैं आर.ए.सी. टिकट पर अपने घर जा रहा था। पहली दोनों यात्राएं यादगार रही थीं, ये भी रहेगी यह उम्मीद कर ही सकता था। हम सामान व्यवस्थित कर रिलैक्स हुए ही थे कि ऊपर की बर्थ वाले सज्जन भी हांफते हुए आ गए और हमारे साथ ही बर्थ पर बैठ गए। मुझे बरबस ही खिसककर बीच में बैठना पड़ा। शालिनी मेरी बाईं ओर और वह सज्जन दाईं ओर बैठे थे। दोनों से पर्याप्त दूरी होने के बावजूद सैण्डविच जैसी स्थिति थी मेरी, दो पाटों के बीच में फंसा होने-सा महसूस कर रहा था। वह सज्जन थे कि आराम से फैलकर बैठे थे। उनके हाव-भाव देखकर लग ही नहीं रहा था कि वह अपनी बर्थ पर ऊपर जाने के बारे में फ़िलहाल सोच रहे हैं। कुछ ही देर में उनके प्रति मन में अजीब-सी धारणा बनने लगी। एक तो बीच में बैठना ही कष्टदायक था और दूसरा उन सज्जन ने अपना पैर फैलाकर मेरी जांघ से टिका दिया था। बाईं ओर खिसकना मुझे असभ्यता लगी सो मैं स्वयं में ही थोड़ा सिमट गया।

मुझे असहज स्थिति में देख शालिनी ने मौन तोड़ा- ‘टेक इट ईज़ी... आप थोड़ा मेरी ओर सरककर आराम से बैठ सकते हैं।’ थैंक्स कहते हुए मैं उसकी तरफ़ खिसक गया। शालिनी ने बात को आगे बढ़ाया-‘कहां तक जाएंगे आप?’ ‘दिल्ली, और आप?’ ‘जाना तो मुझे मेरठ तक है, दिल्ली से बस से जाऊंगी।’ ‘हैदराबाद में जॉब करती हैं आप?’ मैंने पूछा। बातचीत का सिलसिला मैंने क्यों आगे बढ़ाया, यह मुझे स्वयं समझ में नहीं आया। ‘जी, एफ़.एम. में रेडियो जॉकी हूं। डब्ल्यू.एल.सी. से मास कम्युनिकेशन में इसी साल पोस्ट ग्रेजुएशन किया था, सो यहीं जॉब करने लगी... फ़िलहाल कुछ दिन की छुट्टियां, फिर अगले माह लखनऊ में दूसरा रेडियो चैनल जॉइन करना है।’ ‘ओह, बहुत इंट्रेस्टिंग काम है आपका, मेरी कलीग प्रिया रेड्डी भी वीकएंड पर एक चैनल में पार्ट टाइम करती है, शायद आप जानती होंगी।’ ‘हां, कई बार मिली हूं उससे, तो आप भी मणि सॉफ्टवेयर सोलूशन्स में काम करते हैं?’ ‘जी, प्रिया के साथ ही ग्राफ़िक डिज़ाइनर हूं वहां, एक बार उसके कहने पर मैं भी उसके ब्राडकास्टिंग ऑफ़िस गया था, गुडमॉर्निंग हैदराबाद कार्यक्रम में कविताएं सुनाने।’ ‘वाह, क्या बात है... आप लिखते भी हैं... नाइस मीटिंग... इतनी बातें कर डालीं पर न नाम बताया और न ही पूछा- हाऊ क्लम्ज़ी एम आई... एनी वे... आई एम शालिनी सिंह फ्रॉम मेरठ!’ उसने अपना हाथ बढ़ाते हुए कहा। ‘मैं दीपेंद्र आर्य, ग़ाज़ियाबाद से। नोएडा के जेपी इंस्टीट्यूट से कम्प्यूटर साइंस से बीई करने के बाद साल भर से हैदराबाद में हूं... लोगों को मेरी तुकबंदी अच्छी लगती है।’ मैंने उसका बढ़ा हुआ हाथ थामते हुए कहा। उसकी हथेली बहुत कोमल और विद्युतीय तरंगों से आवेशित लगी। मन हुआ कुछ देर ऐसे ही उसका हाथ अपने हाथ में लिए रहूं। वह मेरी ओर अपलक देख रही थी। पहली बार मुझे उससे नज़रें मिलाकर अपने भीतर तुलिप की सैकड़ों कलियां महमहाती हुई प्रतीत हुईं। गोल चश्मे के भीतर से झांकती आंखों में अनुराग का सरोवर छलछलाता-सा लगा मुझे। ‘दीपेंद्र, नाइस नेम... शॉर्ट में दीप कह लो या दीपू... सुनकर ही स्वीट-सा लगता है... एक मेरा नाम है शालिनी... शॉर्ट में बोलो तो शाली हो जाता है स्साला!’ यह कहते हुए खिलखिलाकर हंस दी। उसकी यह बेबाकी मन को बहुत भली लगी, कोई बनावटीपन नहीं, एकदम निश्छल और निर्मल। ‘शाली क्यों, शालू भी तो हो सकता है।’ मैंने उसकी बातों में रुचि लेते हुए उत्तर दिया। बग़ल में बैठे उन सज्जन ने हमारी बातें सुनकर बुरा-सा मुंह बनाया।

बातों का सिलसिला जो शुरू हुआ तो यह भी ध्यान नहीं रहा कि ब्रेकफ़ास्ट करना है जिसे मैंने आते समय श्रद्धा टेम्प्टेशन रेस्तरां से पैक कराया था। बाजू में बैठे सज्जन तब तक अपने दोनों पैर पसार चुके थे और बीच-बीच में कभी दायां तो कभी बायां पैर मेरी जांघों पर रख देते। मैं कसमसाता तो वह अपना पैर खींच लेते लेकिन थोड़ी देर बाद फिर वही कथानक मंचित होने लगता। मैंने उन्हें हिलाया और कहा- ‘हमें ब्रेकफ़ास्ट करना है अंकल, आप अपनी बर्थ पर चले जाइए, प्लीज़।’ उन्होंने कहा कुछ नहीं लेकिन घूरते हुए ऊपर की सीट पर चले गए। उनके ऊपर जाते ही शालिनी बोली- ‘ये रेलवे भी अजब-ग़ज़ब है, इतनी लम्बी यात्रा के लिए भी आर.ए.सी. टिकट जारी कर देता है, मतलब आपकी सीट रिज़र्व है यदि कोई अपना टिकट कैंसिल करा ले तो... वरना दो व्यक्ति सीट शेयर करते हुए या तो यात्रा का आनंद लें या कष्ट भोगें... दिन की यात्रा में ऊपर वाले यात्री को भी साथ में बिठाओ।’ ‘सही कहा आपने... पर कभी-कभी कोई चारा भी तो नहीं होता, मजबूरी में यात्रा करनी ही पड़ती है, मेरी क़िस्मत तो बहुत ज़ोरदार है इस मामले में... केवल आर.ए.सी. पर यात्रा करना ही लिखा है उसमें... पांचवीं-छठी बार आर.ए.सी. पर यात्रा कर रहा हूं,’ मैंने कहा। कुछ देर इधर-उधर की बातें होती रहीं। बातों ही बातों में जाना कि उसकी सगाई होने वाली है। सुनकर अच्छा नहीं लगा, दिल में कुछ टूटता-सा प्रतीत हुआ। शालिनी ने आगे बताया कि अभिलाष उसके पिताजी के दोस्त का बेटा है, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर है। शादी के बाद लखनऊ पोस्टिंग हो जाएगी, उसके चाचा सीएम के ओ.एस.डी. हैं। कभी मिली नहीं उससे पर वीकएंड पर चैटिंग हो जाती है। पढ़ाकू है, परसाई पर पीएचडी की है, व्यंग्य में रुचि है, पत्र-पत्रिकाओं में छपता रहता है। उसने मुझे भी सगाई में आने के लिए निमंत्रित किया। दिन का सफ़र जैसे-तैसे कट गया। ऊपर वाले सज्जन वॉशरूम जाने के बहाने नीचे उतरते और हमारे साथ बैठ जाते। ऐसा कई बार हुआ। मुझे बीच में बैठना पड़ता और वह कुछ ही देर में अपनी टांग फैलाकर मेरे ऊपर रख देते। मैं उनकी ओर देखता तो अपने घुटने सहलाने लगते। कहते कुछ नहीं लेकिन उनकी आंखों में अजीब-सा लिज़लिज़ापन दिखाई देता। रात का सफ़र मैंने सीट के एक कोने में दुबके हुए पूरा किया। मेरे आग्रह पर शालिनी लेट गई थी और आराम से सोती रही। दिल्ली आने से पूर्व उसने मुझे हिलाते हुए कहा- ‘गुडमॉर्निंग आर.ए.सी.!’ उसकी मनोहारी आवाज़ कानों में पड़ते ही आलस जाता रहा और एक स्फूर्ति की लहर पूरे शरीर में दौड़ गई। उसकी आवाज़ का आरोह-अवरोह बहुत देर तक मन को आलोड़ित करता रहा। दिल्ली में हम दोनों एक ही टैक्सी से आनंदविहार आईएसबीटी तक गए, जहां से उसे मेरठ जाना था और मुझे ग़ाज़ियाबाद। कुछ दिनों तक हमारी आपस में बातें होती रहीं। धीरे-धीरे बातचीत का सिलसिला कम होते-होते बंद हो गया। अभिलाष से उसकी सगाई हो गई थी। मैं तो जा नहीं सका लेकिन सगाई की कुछ तस्वीरें उसने भेजी थीं। देखकर आश्चर्य हुआ, तस्वीरों में वह बहुत आकर्षक और ख़ुश लग रही थी। स्काई-ब्लू लहंगे में उसका मोटापा छुप गया था। तीन साल हो गए थे शालिनी सिंह से मिले हुए। मैं उसे भूल तो नहीं पाया था लेकिन उसके बारे में जानकारी भी नहीं थी मुझे, कहां है, कैसी है। मैंने भी हैदराबाद की जॉब छोड़कर गुड़गांव में नई जॉब जॉइन कर ली थी। मैं उस दिन हुडा सिटी सेंटर मेट्रो स्टेशन से ग़ाज़ियाबाद जाने के लिए निकला था। राजीव चौक स्टेशन से मुझे दूसरी मेट्रो पकड़नी थी। मैं ब्लू लाइन प्लेटफ़ॉर्म पर मेट्रो के आने का इंतज़ार कर रहा था कि शालिनी सिंह दिख गई। बहुत दुबली और सांवली लग रही थी। मैं उसे पहली नज़र में पहचान ही नहीं पाया। उसने भी मुझे देखकर अनदेखा किया। इसी बीच ट्रेन आ गई। भीड़ कुछ ज़्यादा ही थी लेकिन मुझे सीट मिल गई। इत्तफ़ाक़ से शालिनी मेरे पास ही सपोर्ट पाइप पकड़े खड़ी हुई थी। बात मैंने ही शुरू की- ‘आप शालिनी ही हैं न, लगता है पहचाना नहीं मुझे।’ ‘ओह!... आप दीपेंद्र... आर.ए.सी. पार्टनर।’ उसकी बात सुनकर मैं मुस्करा दिया और अपनी सीट से उठ बैठा- ‘आप बैठिए, मेट्रो में आर.ए.सी. सीट नहीं होती, पूरी सीट आपकी।’ वह भी हंस दी। उसकी हंसी में पुरानी खनक नहीं थी, एक फीकापन था। शोरगुल होने से अधिक बात नहीं हो पाई। सिटी सेंटर पर उतरकर हम दोनों साथ हो लिए। ‘आजकल कहां हैं आप? लखनऊ, इलाहाबाद, दिल्ली, नोएडा? अभिलाष जी कैसे हैं?’ मैंने जानना चाहा। ‘इनमें से कहीं नहीं- गुड़गांव के एक स्कूल में पढ़ा रही हूं आजकल।’ शालिनी ने बताया- ‘शहरों को गुडमॉर्निंग कहते-कहते ऊब होने लगी थी सो वो नौकरी छोड़ दी।’ उस दिन इतनी ही बात हुई। वह गुड़गांव में है जानकर अच्छा लगा। उससे नियमित रूप से बात भी होने लगी। वीकएंड पर कभी-कभी मिलने भी लगे। जब भी मिलते आर.ए.सी. का ज़िक्र एक बार ज़रूर होता। यह ज़िक्र करते हुए उसके चेहरे पर पुरानी आभा लौटती प्रतीत होती। कुछ बार की मुलाक़ात में बहुत-सी बातें पता लगीं। सगाई के एक माह के भीतर ही उसकी और अभिलाष की शादी हो गई थी। वह उनके लिए बहुत लकी साबित हुई। पंद्रह दिनों में ही विदेश मंत्रालय में छह माह से लटकी उनकी फ़ाइल क्लीयर हो गई और सूरीनाम में उन्हें पांच साल के लिए फ़ैलोशिप मिल गई, अभिलाष तबसे वहीं पर हैं।’

‘आप नहीं गईं साथ में?’ पूछा था उससे। उसने बात बदल दी थी- ‘आपने शादी नहीं की अब तक?’ उस दिन शालिनी ने जवाब नहीं दिया था लेकिन धीरे-धीरे वह खुलने लगी। अभिलाष उससे शादी के लिए इच्छुक नहीं थे। वह रजनी नाम की एक लड़की से विवाह करना चाहते थे लेकिन परिवार के दबाव और छोटी बहन की शादी में आने वाले व्यवधान को ध्यान में रखकर शालिनी से शादी की थी। यह उसे बाद में पता चला कि रजनी भी फ़ैलोशिप पर उनके साथ सूरीनाम गई है। जानकर कुछ दिन अवसाद में रही- समूचे शहर की सुबह को ख़ुशनुमा बनाने वाली आवाज़ अपनी चहक खोने लगी थी। उसने जॉब के साथ ही लखनऊ भी छोड़ दिया और गुड़गांव चली आई। तलाक़ का प्रकरण अंतिम चरण में है। उसकी बात सुनकर दु:ख हुआ लेकिन दिल में सुकून का भाव भी अनुभव किया। कितना अजीब है ये मन। उसकी सगाई की बात सुनकर उस दिन ज़रा भी अच्छा नहीं लगा था, पर तब दिमाग़ ने मन को झिड़क दिया था कि सगाई से तुमको क्या... आर.ए.सी. के साथी हो इससे ज़्यादा कुछ नहीं। छब्बीस-सत्ताईस घण्टों का सफ़र है, फिर वह कहां, तुम कहां, किसको पता है। आज दिमाग़ मन को समझा रहा था, तुम पहली मुलाक़ात में ही चाहने लगे थे उसे। तभी उसकी सगाई की बात सुनकर तुम्हें ठेस लगी थी, उसका हाथ थामकर तुम कितना सोच में पड़ गए थे... आनंदविहार आईएसबीटी पर उसे विदा करते हुए तुम कितने नर्वस थे। तुम्हें लगा था कोई अपना दूर जा रहा है... उसकी सगाई में जाने से भी डर लगा था तुम्हें... नहीं देखना चाहते थे तुम उसे किसी और के साथ... बहुत भाग लिए प्रश्नों से, अब उत्तर तलाशने की कोशिश करो... कितनी ख़ुशमिज़ाज थी वह... कितना खिलंदड़पन था उसकी आवाज़ में, बोलती थी तो कानों में संतूर-सा बजने लगता था... और अब, बोलती ही नहीं, हां... हूं... कहकर रह जाती है। बहुत ख़ाली हो गई है अंदर से... थोड़ा-थोड़ा रोज़ बिखर रही है। पूरी तरह बिखर जाए, इससे पूर्व संभाल लो उसे... कह दो अपने दिल की बात। जीवन-यात्रा में ग़लत सहयात्री मिल गया था उसे, उसके साथी ने अपना टिकट कैंसल करा लिया है। पहली बार तुम्हारा आर.ए.सी. कन्फ़र्म होने को है... बांहों में भरकर रिज़र्व कर लो उसे, तुम्हारे साथ आर.ए.सी. की यात्रा का सुखद अनुभव है उसे। दिन में तलाक़ का फ़ैसला आ चुका था। रात भर सोचता रहा। सुबह डरते हुए शालिनी को फ़ोन किया- ‘गुडमॉर्निंग आर.ए.सी.।’ ‘तुम रेडियो जॉकी नहीं बन सकते- ग्राफ़िक डिज़ाइनर ही बने रहो!’ शालिनी की आवाज़ में कोई उत्साह नहीं था... सीधा सपाट-सा जवाब था, लेकिन पता नहीं क्यूं मुझे उसका जवाब संभावनामय लगा। मुझे उसके जवाब में उस कटाक्ष की तीक्ष्णता महसूस हुई जो अपनों पर किया जाता है और अब तक हुई दर्जनों मुलाकातों में जिसे मैंने महसूस नहीं किया था। ‘पर तुम तो पैदायशी जॉकी हो, वापस लौट आओ रेडियो की दुनिया में... अपनी चहकती आवाज़ के साथ।’ मैंने डरते हुए कहा। ‘सोचूंगी।’ शालिनी ने फिर सपाट उत्तर दिया। ‘मैं कभी उस पहली गुडमॉर्निंग को भूल नहीं पाया जो तुमने ट्रेन के सफ़र में बोला था- फिर से बोल दो एक बार!’ मेरे मन का उत्साह जाता रहा था फिर भी मेरी ज़ुबान से मन की बात बाहर आ ही गई। ‘कहा न सोचूंगी... फिर ये ज़िद क्यों!’ शालिनी की आवाज़ में इस बार भी वही रूखापन था। ‘ये जि़द नहीं, इच्छा है एक बार सुनूं उस आवाज़ को... बोल दो हमारे लिए... चाहो तो हम फिर साथ-साथ होंगे, इस बार जीवन-यात्रा पर... सदा के लिए... एक ही बर्थ पर, आर.ए.सी. के झंझट से दूर... स्वेच्छा से।’ मैंने एक झटके में वह सब कह दिया जिसके बारे में मन में बहुत बार सोचा था कि कैसे कहूंगा, क्या बोलूंगा। उधर से कोई जवाब नहीं आया- एक पल, दो पल... दस पल... बीस पल... दो मिनट हो गए। मन में अकुलाहट बढ़ी, हाथ कांपे और हाथ से मोबाइल छूट गया। मैं उठाने को झुका ही था कि मृत शिराओं में जीवन का संचार करने वाली आवाज़ गूंजी- ‘गुडमॉर्निंग आर.ए.सी.।’

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