बेमिसाल:कौन थीं फ्लोरेंस नाइटिंगेल जिनके नाम पर नर्स लेती हैं प्रतिज्ञा!

डॉ. सुमीता13 दिन पहले
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आज दुनिया में कहीं भी नर्सिंग का प्रशिक्षण पूरा होने पर नर्सों को ‘नाइटिंगेल प्रतिज्ञा’ करनी होती है। नर्सिंग के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे बड़ा मेडल ‘फ्लोरेंस नाइटिंगेल मेडल’ है। फ्लोरेंस के महत्वपूर्ण योगदानों के सम्मान में आज उनके जन्मदिन को ‘अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

ब्रिटेन के एक वैभवशाली, धनाढ्य, रसूखदार ज़मींदार दंपती, विलियम और फ्रांसिस (फेनी) नाइटिंगेल के घर 12 मई, 1820 को एक बिटिया जन्मी। इटली के फ्लोरेंस शहर में जन्म होने के कारण इस बेटी का नाम फ्लोरेंस नाइटिंगेल रखा गया। उस विक्टोरियन युग में राजनैतिक-सामाजिक रूप से प्रभावशाली लोगों के समाज में परवरिश पाती हुई फ्लोरेंस के मन में आभिजात्य जीवनशैली में रम जाने के बदले असहायों-बीमारों के लिए सेवाभावना के साथ जीवन समर्पित कर देने का दुर्दम्य भाव जाग्रत होना किसी अचम्भे से कम नहीं लगता। वे सेवा-सुश्रुषा-परिचर्या की आधुनिक रूपाकार थीं।

उन्नीसवीं शताब्दी में पेशेवराना आधुनिक नर्सिंग की संस्थापना के साथ ही आधुनिक चिकित्सा की कार्यपद्धति में आमूलचूल परिवर्तन का श्रेय भी फ्लोरेंस नाइटिंगेल को जाता है। रोगियों की जीवन रक्षा के लिए आधारभूत ज़रूरत है: स्वच्छता, और संक्रमण को फैलने से रोकना। इस महत्वपूर्ण तथ्य को उन्होंने ही पहले-पहल रेखांकित किया और लागू भी। गणितीय व सांख्यिकीय मेधा से सुसंपन्न फ्लोरेंस ने पाई चार्ट का एक विशेष रूप आविष्कृत किया था जो अब ‘पोलर एरिया डायग्राम’ के नाम से विख्यात है।

मैत्री और प्रेम
युवा फ्लोरेंस के जीवन में प्रेम और विवाह के कई मौक़े भी आए। विभिन्न कालखंडों में कवि-राजनेता रिचर्ड मोंकटन मिलंस और शिक्षाविद बेंजामिन जोवेट उनसे विवाह के इच्छुक थे, लेकिन मैत्री क़ुबूल करते हुए भी फ्लोरेंस ने विवाह को दरकिनार कर दिया ताकि उनके कार्यों में बाधाएं न आएं। राजनेता सिडनी हर्बर्ट के साथ भी आजीवन उनकी मित्रता बनी रही जिनका उनकी योजनाओं के कार्यान्वयन में अतिशय योगदान रहा।

ईश्वर की पुकार
फरवरी 1837 में फ्लोरेंस ऐसे कई आंतरिक अनुभवों से गुज़रीं, जिन्हें वे ईश्वर की पुकार मानती थीं। उनके भीतर एक नर्स के रूप में दूसरों की सेवा कर जीवन बिताने की बलवती इच्छा हिलोरें मारने लगी थी। सात वर्ष अपनी आकांक्षा को ज़ब्त करने और मां-बहन के उत्कट विरोध के बावजूद 1844 में उन्होंने नर्सिंग के विज्ञान में ख़ुद को निष्णात करने का फ़ैसला कर लिया। तब यह बहुत हीन कार्य माना जाता था।

इसी साल के उत्तरार्ध में जर्मनी में कैसरस्वर्थ-एम-राइन में लूथरन धार्मिक समुदाय के भ्रमण के दौरान वंचितों-बीमारों की सेवा में रमे पादरी पास्टर थियोडोर फ्लिडनर और उनके द्वारा प्रशिक्षित पादरिनों से उनकी मुलाक़ात हुई। इस मुलाक़ात ने फ्लोरेंस के जीवन की दिशा तय कर दी। यहां के अनुभवों पर 1851 में ‘द इंस्टीट्यूशन ऑफ कैसरस्वर्थ ऑन द राइन, फॉर द प्रैक्टिकल ट्रेनिंग ऑफ डेकनेसेस’ उनकी पहली प्रकाशित पुस्तक थी। यहीं से उन्होंने चार महीनों की मेडिकल ट्रेनिंग ली जिसके आधार पर 1860 में लंदन के सेंट थॉमस हॉस्पिटल में उन्होंने अपना नर्सिंग कॉलेज शुरू किया।

यूरोप का भ्रमण
1838 में अपने परिवार के साथ फ्लोरेंस यूरोप-भ्रमण को गई थीं। इस दौरान पिता के माध्यम से पेरिस में उनकी मुलाक़ात ब्रिटिश मूल की मैरी क्लार्क से हुई। ब्रिटिश कुलीन घरानों की महिलाओं को सिरे से नापसंद करने वाली क्लार्क की फ्लोरेंस से ख़ूब निभी जबकि फ्लोरेंस उनसे 27 वर्ष छोटी थीं। फ्लोरेंस के व्यक्तित्व और जीवन पर क्लार्क के विचारों और 40 सालों तक निर्बाध चलने वाली दोस्ती का बहुत प्रभाव पड़ा। ख़ासकर स्त्रीवादी चिंतन के क्षेत्र में। ‘स्त्रियां भी पुरुषों के बराबर हो सकती हैं’ जैसा विचार फ्लोरेंस में क्लार्क के माध्यम से ही आया था।

लेडी विद लैम्प
फ्लोरेंस नाइटिंगेल का सर्वप्रमुख योगदान क्रीमिया के भयावह युद्ध में घायल सैनिकों की परिचर्या थी जिसने उन्हें वैश्विक पटल पर प्रसिद्धि दिलाई। यह 1854 के नवंबर की बात है जब उन्हें उनकी 38 नर्सों की टोली के साथ घायल सैनिकों की देखभाल के लिए युद्ध सीमा क्षेत्र में मिलिट्री अस्पताल में भेजा गया था। विषम परिस्थितियों में फ्लोरेंस और उनकी नर्सिंग टीम सूझबूझ और लगन के साथ दिनरात सेवा-शुुश्रूषा में लगी रहीं। वे अंधियारी रातों में भी लैम्प के सहारे रोगियों और घायलों को एक बार देखने ज़रूर जाती थीं। यहीं से उनकी ख्याति ‘लेडी विद द लैम्प’ के रूप में फैली।

नारीवाद का चेहरा
फ्लोरेंस न सिर्फ़ महिलाओं की आत्मनिर्भरता की बेजोड़ हिमायती बनी रहीं, बल्कि उनके लिए करियर का नया क्षेत्र ही खोल दिया। वे महिलाओं द्वारा सहानुभूति बटोरने और प्रचलित रुटीनी ज़िंदगी को ढोते चले जाने की प्रवृत्ति की ज़ोरदार मुखालिफ़त करती रहीं। उनके सामाजिक सुधार कार्यों में ब्रिटिश समाज के सभी वर्गों में स्वास्थ्य को लेकर बेहतरी के कार्य, भारत में हंगर रिलीफ़ कार्यक्रम, महिलाओं के लिए अत्यंत क्रूर प्रॉस्टीट्यूशन लॉ को ख़त्म करने, कार्यस्थलों पर महिलाओं की भागीदारी के तरीक़ों को बढ़ावा देने जैसे कार्य शामिल रहे हैं। महिलाओं का जीवन सुधारने की दिशा में उनके कार्यों की महत्ता ही थी कि 1920 और 1930 के दशक में वे स्त्रीवादी आंदोलनों की आइकॉन मानी गईं जबकि 90 वर्षों के उनके सुदीर्घ जीवन का अवसान 13 अगस्त, 1910 में ही हो चुका था।

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