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दूसरा शीत युद्ध:चीन ने हावी होने के लिए टेक्नोलॉजी का सहारा लिया, अमेरिका को भारत जैसे देशों से गठजोड़ करना होगा

8 दिन पहले
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  • हथियारों की होड़ की बजाय दो महाशक्तियों के बीच सूचना तकनीक के मैदान में लड़ाई
  • नए राष्ट्रपति जो बाइडेन को सहयोगी देशों को कई रियायतें देना पड़ेंगी, दूसरे देशों को भी अमेरिका पर विश्वास करना होगा

चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी ने समझ लिया है कि सत्ता का रास्ता टेक्नोलॉजी से होकर गुजरता है। उसके पास बड़ा बाजार, महत्वाकांक्षा और कड़ी मेहनत करने वाले प्रतिभाशाली लोग हैं। चीन अपनी टेक्नोलॉजी के बूते निर्यात सौदे करता है। वह बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट का इस्तेमाल कर अपनी डिजिटल ताकत को आगे बढ़ाता है। उसने ग्लोबल संस्थाओं को अपने अनुकूल बनाने का अभियान छेड़ रखा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चीन पर काबू पाने के लिए अकेले अभियान छेड़ रखा है। उन्होंने, अमेरिका के कुछ सहयोगी देशों को चीनी कंपनी हुवा‌वे का 5 जी नेटवर्क खरीदने से रोकने के लिए मजबूर किया है। चीनी एप पर प्रतिबंध भी लगाए गए हैं। लेकिन, यूरोप, भारत, जापान और अन्य सहयोगी देशों का गठजोड़ बनाए बगैर चीन की चुनौती का मुकाबला करना मुश्किल है।

लंबी अवधि में ट्रम्प की रणनीति से चीन का फायदा है। उसने स्वयं की विश्वस्तरीय चिप इंडस्ट्री बनाने के प्रयास शुरू कर दिए हैं। इसमें दस साल या अधिक समय लग सकता है। यदि अमेरिका हमेशा अपने संकीर्ण हितों का ध्यान रखेगा तो सहयोगी उससे दूर जाने लगेंगे। यूरोप अमेरिकी दबाव का सामना करने के लिए तैयार नहीं है। यूरोपियन यूनियन की सबसे बड़ी अदालत दो बार अमेरिका को डेटा ट्रांसफर करने पर रोक लगा चुकी है। इसके साथ यूरोपीय देशों ने क्लाउड पर नियम लागू करने, अमेरिकी टेक्नोलॉजी कंपनियों पर डिजिटल टैक्स लगाने और विदेशी अधिग्रहण रोकने का इरादा जताया है।

अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडेन यूरोप से टकराव को सहयोग में बदल सकते हैं। टैक्स, कंपनियां खरीदने के नियम और सप्लाई चेन जैसे मामलों में सहयोग का रास्ता निकाला जा सकता है। मिसाल के लिए यूरोप का जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन हर जगह मान्य हो सकता है। खुफिया जानकारी के क्षेत्र में निकट सहयोग के जरिये अमेरिका-यूरोप का गठजोड़ चीनी हैकरों और टेक कंपनियों के सुरक्षा खतरों से बच सकता है। भारत सहित अन्य लोकतांत्रिक देशों से सहयोग के जरिये अमेरिका टेक्नोलॉजी की होड़ में आगे भी बना रहेगा। लेन-देन और सौदेबाजी की भावना से अमेरिका में बाहरी लोगों का प्रवेश आसान होगा। ध्यान रहे, अमेरिका में टेक्नोलॉजी और रिसर्च के क्षेत्र में विदेशी छात्रों की बड़ी भूमिका है। चीन में ऐसे खुलेपन का अभाव है।

कुछ लोगों का तर्क है, ऐसे सहयोग के लिए किसी संधि या नाटो या डब्ल्यूटीओ जैसी संस्था की जरूरत होगी। लेकिन इसकी स्थापना में समय लगेगा। जी 7 देशों के समूह जैसी व्यवस्था के विस्तार से आसानी होगी। हालांकि, यह व्यवस्था आसानी से नहीं बनेगी। अमेरिका को समझना होगा कि अब दूसरे विश्व युद्ध के समान उसका प्रभुत्व नहीं है। उसे प्राइवेसी, करों और औद्योगिक नीति जैसे मामलों में दूसरे देशों को रियायतें देना पड़ेंगी। सहयोगियों को भी अमेरिका पर विश्वास करना पड़ेगा। ट्रम्प के शासनकाल में यह भरोसा खंडित हुआ है। अमेरिका और दूसरे देशों के बीच सहयोग बढ़ने की स्थिति में सबका फोकस चीन से टेक्नोलॉजी में होड़ पर रहेगा। इससे ग्लोबल वार्मिंग, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में चीन से समझौते का रास्ता खुलेगा। दुनिया अधिक सुरक्षित रहेगी।

नए तरह का शीत युद्ध और नए हथियार

अमेरिका और चीन के बीच दूसरा शीत युद्ध पहले शीत युद्ध से अलग है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत संघ की प्रतिद्वंद्विता का फोकस वैचारिक और परमाणु हथियारों पर था। नया युद्ध क्षेत्र सूचना तकनीक-सेमी कंडक्टर, डेटा, 5 जी मोबाइल नेटवर्क,इंटरनेट, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और क्वांटम कंप्यूटिंग से संबंधित है। पहले शीत युद्ध ने अलग तरह की दुनिया बनाई थी। दूसरे युद्ध के पात्र एक-दूसरे से जुड़े हैं। 2001 में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) से जुड़ने के बाद चीन ग्लोबल अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन गया।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भांप लिया कि चीन अमेरिका की डिजिटल श्रेष्ठता के लिए गंभीर चुनौती है। उनके कड़े रुख की वजह से चीनी और अमेरिकी आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर अलग होने लगे हैं। सप्लाई चेन भी टूट रही है। अमेरिका की पहल के कारण कई कंपनियों ने चीन में उत्पादन बंद कर दिया है। एपल भारत में प्लांट लगा रही है। ताईवानी चिप कंपनी टीएसएमसी ने अमेरिका में फैक्टरी लगाने की घोषणा की है। लेकिन, ट्रम्प यह नहीं समझ पाए कि इस लड़ाई में केवल चीन और अमेरिका ही मायने नहीं रखते हैं।

भारत, यूरोपियन यूनियन, जापान और कुछ अन्य देशों की विश्व के आईटी सिस्टम में महत्वपूर्ण भूमिका है। इसमें अल्फाबेट (गूगल),एपल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी विराट टेक्नोलॉजी कंपनियां भी शामिल हैं। अगर लोकतांत्रिक देश डिजिटल दुनिया के एक जैसे नियम नहीं बनाते हैं तो चीन दुनिया के बड़े हिस्से में अपने नियम लागू करेगा। स्वेच्छाचारी और तानाशाह शासकों को सुविधा और सहारा देने वाली टेक दुनिया बनेगी।

तकनीक का साम्राज्य

सूचना तकनीक (आईटी) में अमेरिका का प्रभुत्व लंबे समय से है। हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर में वह बहुत आगे है। फौजी ड्रोन, उपग्रह और सिस्टम अमेरिकी सेना को किसी भी प्रतिद्वंद्वी से अधिक ताकतवर बनाते हैं। उसकी एक टेक कंपनी का मूल्य 14.80 लाख करोड़ रुपए है। तीन अन्य कंपनियांं सात लाख करोड़ रुपए से अधिक मूल्यवान हैं। चीन के पास भी अपार डिजिटल संसाधन हैं। अलीबाबा और टेनसेंट आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और क्लाउड कंप्यूटिंग में बहुत आगे हैं।

बॉक्स-जी-7 देशों जैसा गठजोड़

अक्टूबर में तीन थिंक टैंकों-सेंटर फॉर न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी, जर्मनी के मेरिक्स और जापान के एशिया पेसिफिक इनीशिएटिव ने लोकतांत्रिक देशों का टेक्नोलॉजी गठबंधन बनाने का सुझाव दिया है। यह जी-7 देशों जैसा होगा। इसमें भारत सहित कुछ अन्य देशों को शामिल किया जा सकता है। इसकी नियमित बैठकों का आयोजन किया जाएगा। गठजोड़ से एनजीओ और टेक्नोलॉजी कंपनियों को जोड़ने का सुझाव दिया गया है।

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