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अरब देशों में स्वास्थ्य संकट:अधिकतर अरब देशों में डॉक्टरों की कमी, कम वेतन का अभाव है बड़ा कारण

8 दिन पहले
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  • अच्छे वेतन के अभाव में बड़ी संख्या में डॉक्टर दूसरे देशों में जा रहे हैं

विश्व के अन्य देशों के समान मध्य पूर्व के देशों में भी कोरोना वायरस के मरीज बढ़ रहे हैं। लेबनान में 80 प्रतिशत से अधिक आईसीयू बिस्तर भरे हैं। ट्यूनीशिया में कर्फ्यू लगा दिया गया है। अन्य देशों ने भी ऐसे ही उपाय किए हैं। लेकिन, डॉक्टरों की कमी महसूस की जा रही है। हालांकि, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का कोई वैश्विक मापदंड तो नहीं है। फिर भी, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने प्रति दस हजार लोगों पर 45 कुशल स्वास्थ्य कर्मियों-डॉक्टर, नर्स और मिडवाइव्स-का सुझाव दिया है। नौ अरब देश इस पैमाने पर खरे नहीं उतरते हैं। 2018 में मिस्र में प्रति दस हजार लोगों पर पांच से कम डॉक्टर थे। 2014 में यह संख्या 11 थी। इस अवधि में सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की संख्या एक तिहाई कम हुई है। पर्याप्त पैसा न मिलने के कारण बड़ी संख्या में डॉक्टर दूसरे देशों में जा रहे हैं।

अरब देशों में काफी डॉक्टर पढ़कर निकलते हैं। मिस्र में हर साल सात हजार डॉक्टर ग्रेजुएट निकलते हैं। आबादी के अनुपात में यह अमेरिका से 15 प्रतिशत अधिक है। मेडिसिन के मुकाबले नर्सिंग में कम लोग जाते हैं। कई देशों में दूसरे देशों से नर्स आती हैं। ग्रेजुएट होते ही डॉक्टर बाहर जाने की कोशिश करते हैं। मिस्र में नए डॉक्टर का वेतन हर माह 9500 से 11 हजार रुपए है। ट्यूनीशिया में सरकारी अस्पताल में काम करने वाले अनुभवी डॉक्टर को साल भर में एक लाख दस हजार रुपए मिलते हैं। किसी अमीर खाड़ी देश में हर माह इतना पैसा मिलता है।

अरब देशों के सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं का अभाव है। इराक में प्रति दस हजार लोगों पर अस्पतालों में 13 बिस्तर हैं। सऊदी अरब में 22 और तुर्की में 28 हैं। लंबे समय से चल रहे युद्ध ने इराकी स्वास्थ्य सेवाओं को तहस-नहस कर डाला है। विश्व बैंक का अनुमान है, 2017 में इराक में स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रति व्यक्ति 15 हजार रुपए खर्च किए थे। क्षेत्र में यह औसत 34 हजार रुपए है। 2014 की बगावत के बाद मंजूर मिस्र के संविधान में स्वास्थ्य सुविधाओं पर जीडीपी का तीन प्रतिशत सालाना खर्च करने का प्रावधान है। 2018 में जीडीपी का केवल 1.4 प्रतिशत खर्च किया गया।

कोरोना वायरस से निपटने में सरकार की अक्षमता की शिकायत करने वाले डॉक्टरों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। वहां कोविड-19 से 200 स्वास्थ्य कर्मियों की मौत हुई है। लेबनान में ब्लडप्रेशर से लेकर पेरासिटामॉल तक की गोलियां का संकट है। पिछले साल 400 डॉक्टर बाहर जा चुके हैं। किसी समय मध्य पूर्व के देशों में अमीर लोग इलाज कराने लेबनान जाते थे। प्राइवेट क्लीनिक और अस्पतालों में पश्चिमी देशों शिक्षा प्राप्त डॉक्टर काम करते थे। एक सर्जन ने बताया कि उसका मासिक वेतन 15 हजार रुपए महीना है। उधर, ट्यूनीशिया में 40 प्रतिशत और मिस्र में 50 प्रतिशत डॉक्टर विदेशों में काम करते हैं।

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