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द इकोनॉमिस्ट:पढ़िए, द इकोनॉमिस्ट की चुनिंदा स्टोरीज सिर्फ एक क्लिक पर

25 दिन पहले
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1. भारत में कोरोना वायरस की घातक तेज लहर जिस तेजी से उभरी थी, उतनी ही तेजी से उतार पर है। इधर वायरस पर नियंत्रण के प्रमुख साधन वैक्सीनेशन की धीमी गति से जनता निराश है। शुरुआती तेजी के बाद वैक्सीन अभियान लड़खड़ा गया है। अनुमान है, इस रफ्तार से साल के अंत तक 35% लोगों को ही वैक्सीन लग पाएगी। क्यों हैं टीकाकरण की धीमी रफ्तार, जानने के लिए पढ़ें पूरा लेख

भारत में संक्रमण उतार पर लेकिन वैक्सीनेशन धीमा; इस वर्ष 35 फीसदी लोगों को वैक्सीन लग पाएगी

2. कोरोना वायरस महामारी ने इनडोर हवा की स्वच्छता को स्वास्थ्य की नई प्राथमिकता बना दिया है। कोरोना वायरस महामारी पर लैंसेट कमीशन के अनुसार स्कूलों में वेंटिलेशन की स्थिति ठीक नहीं है। 100 अमेरिकी क्लास रूम की स्टडी में पाया गया कि 87 में वेंटिलेशन बहुत कमजोर है। क्या हैं वेंटिलेशन की दुनियाभर में स्थिति, जानने के लिए पढ़ें पूरा लेख...

महामारी ने इमारतों के अंदर हवा की स्वच्छता पर ध्यान खींचा, अमेरिका सहित कई अमीर देशों के स्कूलों में वेंटिलेशन कमजोर

3. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक का तर्क है कि हर देश की 60% आबादी को वैक्सीन लगाकर अगले साल की शुरुआत में महामारी के गंभीर दौर को खत्म करना संभव है। लाइफ साइंस डेटा कंपनी एयरफिनिटी के अनुसार वैक्सीन निर्माता इस वर्ष 11.1 अरब डोज बना सकते हैं। कितनी जल्दी मिल सकती है कोरोना से निजात, जानने के लिए पढ़ें पूरा लेख...

60 फीसदी आबादी के वैक्सीनेशन से महामारी का खात्मा, योजना पर 3.62 लाख करोड़ रुपए खर्च होंगे

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