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ग्लोबलाइजेशन:सप्लाई चेन में बाधा से ग्लोबल जीडीपी 1% घटा; बचाव के लिए देशों ने 700 लाख करोड़ रु. का माल स्टोर किया

10 दिन पहले
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  • कई देशों और बड़ी कंपनियों ने स्रोत बढ़ाने की रणनीति अपनाई

तीन साल पहले अंतरराष्ट्रीय कारोबार की कमजोर स्थिति को देखते हुए विशेषज्ञों ने ग्लोबलाइजेशन की गति धीमी पड़ने के अनुमान लगाए थे। वैश्विक आर्थिक एकीकरण की तेज रफ्तार 2010 के बाद रुक गई थी। फिर सभी देशों के बीच खुले कारोबार के खिलाफ जन- विद्रोह और अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध ने रंग दिखाया। माल और पूंजी का बहाव ठहर गया। कई बड़ी कंपनियों ने विदेश में पैसा लगाने के प्रस्ताव टाल दिए। वे अनुकूल समय का इंतजार करने लगीं। फिलहाल, कोई नहीं जानता कि ग्लोबलाइजेशन रुक गया है या खत्म हो रहा है। महामारी और यूक्रेन युद्ध ने कंपनियों के बोर्ड रूम और सरकारों में ग्लोबल पूंजीवाद पर नए सिरे से विचार की स्थिति पैदा की है। जरूरी चीजों की सप्लाई और मैन्युफैक्चरिंग के लिए किसी एक देश पर निर्भरता कम की जा रही है।

दुनियाभर में सप्लाई चेन बदल रही हैं। विभिन्न देशों ने वस्तुओं की कमी और महंगाई से बचाव के लिए 700 लाख करोड़ रुपए से अधिक का माल जमा कर लिया है। दरअसल, कच्चे माल और जरूरी पुर्जों की सप्लाई ठप पड़ने से ग्लोबल जीडीपी 1% घटा है। ग्लोबल कंपनियों ने चीन से वियतनाम जाना शुरू किया है। यह नए किस्म का ग्लोबलाइजेशन सक्षमता नहीं बल्कि सुरक्षा से प्रेरित है। यह ऐसे लोगों से बिजनेस को महत्व देता है जिन पर भरोसा किया जा सके या जिनसे उनके देश की सरकार के दोस्ताना रिश्ते हैं। कई कंपनियों ने चीन में मैन्युफैक्चरिंग बंद कर वियतनाम में पैसा लगाया है। हालांकि, इससे संरक्षणवाद, सरकारी दखल और महंगाई में बढ़ोतरी होगी।
1990 में ग्लोबलाइजेशन का मुख्य मंत्र सक्षमता था। सरकारों ने सभी देशों की कंपनियों से समान बर्ताव किया। दुनियाभर में शानदार सप्लाई चेन का उदय हुआ। कंज्यूमर के लिए मूल्य कम हुए। चीन सहित उभरते देशों के औद्योगीकरण से एक अरब व्यक्ति घोर गरीबी से बाहर निकले। वैसे, बेहद प्रभावशाली ग्लोबलाइजेशन के साथ समस्याएं भी हैं। अमीर देशों में बहुत कामगारों के जॉब चले गए। अभी हाल में दो अन्य चिंताएं उभरी हैं। माल आपूर्ति की व्यवस्था से लागत कम आती है लेकिन जब वे ध्वस्त होती हैं तो भारी कीमत चुकानी पड़ती है। आज सप्लाई चेन में गड़बड़ी से जीडीपी कम होने के साथ शेयरहोल्डर, कंज्यूमर प्रभावित हुए हैं। चिप की कमी से कारों के उत्पादन में गिरावट के कारण कार निर्माताओं के पास नगद धन में 80% कमी हुई है। सप्लाई चेन गुरु एपल के प्रमुख टिम कुक मानते हैं कि इन रुकावटों से कंपनी की बिक्री इस तिमाही में 62435 करोड़ रुपए या 10% कम हो सकती है। अगले दशक में खराब मौसम या एक अन्य वायरस सप्लाई चेन को अस्त-व्यस्त कर सकता है।
दूसरी समस्या है कि लागत में कमी की वजह से मानवाधिकारों को कुचलने और व्यापार का दबाव के रूप में इस्तेमाल करने वाली तानाशाह सरकारों पर कंपनियों की निर्भरता बढ़ी है। विश्व के जीडीपी में तानाशाह सरकारों की एक तिहाई हिस्सेदारी है। जिन उद्योगों पर सबसे अधिक दबाव है वे अपने कारोबारी मॉडल को नया रूप दे रहे हैं। भारत से लेकर यूरोप तक सरकारों ने रणनीतिक स्वायत्तता का रास्ता चुना है। कार इंडस्ट्री एलन मस्क की टेस्ला के समान निकल की माइनिंग से चिप डिजाइन तक हर जरूरी सामान पर अपना नियंत्रण करने के रास्ते पर चल पड़ी है। ताइवान की इलेक्ट्रॉनिक कंपनियों ने 2017 के बाद चीन में अपनी संपत्ति को 50% से घटाकर 35% किया है।
कंपनियां अपने देश में 69% पूंजी लगा रहीं

कई कंपनियां अब सक्षमता और लागत के बजाय सुरक्षा की ओर कदम बढ़ा रही हैं। विश्व की तीन हजार बड़ी कंपनियों ने 2016 के बाद अपने माल स्टोरेज को दुनिया के जीडीपी के 6% से बढ़ाकर 9% कर लिया है। कई कंपनियां दो-तीन स्रोतों से माल मंगवाने के साथ लंबी अवधि के कांट्रेक्ट कर रही हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इन्वेस्टमेंट का पैटर्न बदला है। मूल कंपनी विदेश में पैसा भेजने के बजाय 69% पैसा स्थानीय सहायक कंपनियों में लगा रही है। पश्चिमी कंपनियों ने चीन से कारोबार सीमित किया है। 2021 में वियतनाम से अमीर देशों के आयात में 70 बढ़ोतरी हुई है। पहले इसका अधिकांश हिस्सा चीन को मिलता था।

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