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तालिबान की दहशत:तालिबान ने अफगान गांवों में की वसूली शुरू, व्यवसायियों को बना रहे निशाना

8 दिन पहले
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  • कई इलाकों पर कब्जा, लोगों के छोटे-बड़े विवादों का निपटारा

अफगानिस्तान के गृहयुद्ध के मुख्य मोर्च पर जाने के लिए राजधानी काबुल से बहुत अधिक दूर जाने की जरूरत नहीं है। शहर के बाहर 20 किलोमीटर दूर एक पुलिस चौकी के आसपास तालिबान की मौजूदगी देखी जा सकती है। तालिबान लड़ाके रात में चौकी पर गोलीबारी करते हैं। वे नजदीकी गांवों में रहते हैं। वहां उनका साम्राज्य है। देश के कई ग्रामीण इलाके तालिबान के कब्जे में हैं। तालिबान लड़ाके व्यवसायियों और अन्य लोगों से जमकर पैसा वसूल करते हैं। वे 1990 के अपने शासनकाल के समान अब अपनी न्याय व्यवस्था चलाने लगे हैं। इधर, अमेरिका अफगानिस्तान से बाहर निकलने की जल्दी में है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कह चुके हैं, वे क्रिसमस तक सभी अमेरिकी सैनिकों की वापसी चाहते हैं। अमेरिका ने जनवरी के मध्य तक सैनिकों की संख्या घटाकर 2500 करने की घोषणा की है।

दोहा, कतर में शांति वार्ता से फायदा उठाकर तालिबान ने सैनिक तौर पर अपनी स्थिति मजबूत की है। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि बातचीत शुरू होने के बाद नागरिकों की मौतें कम नहीं हुई हैं। देश के कई भागों में हिंसा बढ़ी है। तालिबान ने व्यापारियों को सुरक्षा देने के नाम पर वसूली तेज कर दी है। काबुल के बाहर एक गैस कंपनी के मालिक ने बताया कि पिछले साल के मुकाबले उसके टैंकरों की सुरक्षा बेहतर हुई है। तालिबान का अधिक सड़कों पर नियंत्रण है। ईरान की सीमा पर हेरात से काबुल आने वाली हर गाड़ी के लिए वे 455 डॉलर लेते हैं। जब तालिबान टैक्स नहीं लेते थे तब वे रॉकेट ग्रेनेड फेंकते थे। व्यवसायी बताते हैं,अब हम टैक्स देकर खुश हैं।

तालिबान के प्रभाव क्षेत्रों में समानांतर सरकार चलती है। जाबुल प्रांत में रहने वाले किसान पीर मुहम्मद बताते हैं, उनके गांव में 134 परिवार हैं। हर परिवार तालिबान के 2500 रुपए सालाना टैक्स देता है। इसके बदले में तालिबान उनकी हिफाजत करते हैं। विवादों का निपटारा करते हैं। स्थानीय तालिबान नेता विवाद सुलझाते हैं। जमीन जैसे बड़े विवाद जिला प्रमुख के पास जाते हैं। जिला प्रमुख के साथ हमेशा पांच मुल्ला और हथियारबंद लड़ाके रहते हैं। वे दोनों पक्षों के दावे सुनकर फौरन फैसला देते हैं। इस फैसले को कोई रद्द नहीं कर सकता है।

ब्रिटिश संस्था ओवरसीज डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट के रिसर्चर एशले जेकसन कहते हैं, तालिबान कब्जे के इलाके में सरकारी स्कूल और क्लीनिक चलते हैं। तालिबान इलाकों में कुछ स्वयंसेवी संगठन भी काम करते हैं। वे तालिबान के स्थानीय कमांडर द्वारा नियुक्त अधिकारी के तालमेल से गतिविधियां चलाते हैं। कुछ एनजीओ विदेशी सहायता से चलते हैं। ये लोगों को शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराते हैं। तालिबान इन सेवाओं का श्रेय लेता है।

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