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लोकतंत्र लाचार:दुनियाभर में लोकतंत्र पर सत्ताधीशों का कहर; भारत सहित कई देशों में सरकारों की मनमानी

5 महीने पहले
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  • सैनिक विद्रोह की बजाय चुनाव जीतकर आए नेता लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए खतरा बने
  • अमेरिका में न्यायपालिका और अधिकारियों की पेशेवर कार्यशैली राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पर अंकुश लगाया

1990 के दशक में सोवियत संघ का पतन होने के बाद कई देशों में लोकतंत्र फैला लेकिन अब ट्रेंड उलटा हो गया है। अमेरिका, भारत और कई अन्य देशों में सत्ताधारी नेता लोकतांत्रिक परंपराओं को नुकसान पहुंचा रहे हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मौजूदा चुनाव को अमेरिका के इतिहास का सबसे भ्रष्ट चुनाव करार दिया है। निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडेन के लिए लगातार मुश्किलें खड़ी की जा रही हैं। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में भारतीय जनता पार्टी ने अदालतों सहित सभी संस्थाओं पर कब्जा कर लिया है। चुनाव आयोग के भी सत्ताधारी दल से प्रभावित होने की आशंका है। ब्राजील, हंगरी, पोलेंड, वेनेजुएला, तुर्की और कई देशों में सरकारें मनमानी कर रही हैं।

इकोनॉमिस्ट इंटेलीजेंस यूनिट (ईआईयू) के अनुसार 2006 के बाद पिछले साल लोकतंत्र सूचकांक सबसे बदतर रहा। कोरोना वायरस महामारी ने इस गिरावट को तेज किया है। लोकतंत्र को खतरा फौजी बगावत से नहीं बल्कि सत्तारूढ़ सरकारों से है। ऐसे देश जहां इस तरह की स्थिति अकल्पनीय थी, वहां भी नियम-कायदों और संस्थाओं में गिरावट से स्थिति बिगड़ी है। सवाल है ऐसा क्यों हुआ है? ट्रम्प सहित कई नेता लोकतांत्रिक सरकारों की विफलता के कारण सत्ता में आए हैं। अमीर देशों में कामगार वर्ग के वोटरों को यकीन हो गया कि राजनेता उनकी परवाह नहीं करते हैं। रहन-सहन के स्तर में ठहराव और बाहरी लोगों के देश में आने से वे चिंतित थे। मध्य और पूर्वी यूरोप में सरकारों ने अपने वोटरों की बजाय यूरोपियन यूनियन से जुड़े मुद्दों पर अधिक ध्यान दिया। विकासशील देशों में भ्रष्टाचार से संदेश गया कि सत्ताधारी वर्ग की दिलचस्पी केवल पैसा बनाने में है।

जनता का मूड भांपने वाले साहसी राजनेताओं ने नीतियों, कार्यक्रमों के मुकाबले पहचान की राजनीति को आगे बढ़ाया है। उन्होंने, वोटरों को भरोसा दिलाया कि उनकी तकलीफ सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। इस उथल-पुथल में पुरानी पार्टियों का सफाया हो गया। 2017 में फ्रांस में सभी पुरानी पार्टियों को कुल मिलाकर 25 प्रतिशत वोट मिले। पोलेंड में मध्यमार्गी सरकार थी लेकिन ला एंड जस्टिस पार्टी ने वोटरों को बताया कि केथोलिक ईसाई मूल्यों को यूरोपीय यूनियन से खतरा है। सत्ताधारी पार्टी ने लोगों को देशभक्ति और विदेशियों के भय के नाम पर एकजुट किया है। ब्राजील में जेयर बोलसोनारो ने वोटरों के मन में राजनेताओं के लिए असम्मान का भाव पैदा किया। ट्रम्प विदेशियों को बाहर करने, गोरों की सर्वोच्चता जैसे मुद्दों को आगे बढ़ाने पर इस कदर आमादा थे कि उन्होंने अपने दूसरे चुनाव में वोटरों के सामने कोई कार्यक्रम तक पेश नहीं किया।

केवल अपनी पहचान और लोकलुभावन राजनीति ने लोकतंत्र की समस्याओं को सुलझाने की बजाय नई समस्याएं खड़ी की हैं। ऐसी राजनीति लोकतंत्र के लिए जरूरी सहिष्णुता और संवाद से लोगों को दूर ले जाती है। कुछ देशों में नेताओं ने जनता की वफादारी से फायदा उठाते हुए उन संस्थाओं को कमजोर किया है जो उन पर नियंत्रण के लिए हैं। तुर्की में रेसेप तैयिप एर्दोगन अपनी आलोचना करने वालों को गणतंत्र का दुश्मन बताते हैं। मेक्सिको में आंद्रेस मैनुअल लोपेज सरकार के सभी अंगों को दरकिनार रखकर जनमतसंग्रह के माध्यम से सीधे जनसमर्थन जुटाते हैं। भारत में जब चुनाव आयोग ने भाजपा उम्मीदवारों के प्रति उनके प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में नरमी दिखाई तो एक चुनाव आयुक्त ने आपत्ति जताई थी। उनके परिजनों के खिलाफ कर चोरी की जांच शुरू कर दी गई। बॉक्स-कई देशों में बदलाव की हवा

अमेरिका में न्यायाधीशों और अधिकारियों की पेशेवर सोच और कार्यशैली के कारण संस्थाएं सुरक्षित हैं। जब ट्रम्प ने इन संस्थाओं में तोड़फोड़ के प्रयास किए तो वे नाकाम हो गए । दरअसल, असंख्य लोगों ने अपने कर्तव्य का निर्वाह किया इसलिए ट्रम्प को सफलता नहीं मिली है। लोकलुभावन राजनीति ने दुश्मनी और राजनीतिक गतिरोध के जरिये अमेरिका का नुकसान किया है। लेकिन, लोकतंत्र में नई शुरुआत करने की क्षमता है। हंगरी और पोलेंड के शहरों में लोगों ने दमन और पूंजापतियों को बढ़ावा देने की राजनीति को ठुकराया है। पिछले साल यूरोपियन यूनियन के चुनाव में लोकलुभावन राजनीति करने वाले नेताओं की स्थिति कमजोर हुई है।

ऐसा लगता है, परिवर्तन शुरू हो चुका है। भारत इतना विराट और विविध है कि एक पार्टी के लिए उस पर शासन करना मुश्किल है। लोकतंत्र अपने-आप को दूसरे विचार के अनुरूप ढालता भी है। अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी को हिस्पेनिक और अश्वेतों के वोट मिले हैं। ब्रिटेन में पिछले साल सत्ताधारी कंजरवेटिव पार्टी ने मिडलैंड्स में लेबर पार्टी के गढ़ ढहाए हैं। जनता भी लोकंतत्र के पक्ष में आगे आती है। बेलारुस में हर रविवार हजारों लोग तानाशाह शासक की अवज्ञा करते हुए सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। हांगकांग,सूडान और थाईलैंड में भी जनता अपने शासकों के दमन के खिलाफ मैदान में उतरी है।

भारत में एक पार्टी का साम्राज्य कायम होने का अंदेशा

भारत में न्यायपालिका, चुनाव आयोग सहित कई सरकारी संस्थाएं सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी का दबाव महसूस कर रही हैं।

  • सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार अर्नब गोस्वामी की जमानत याचिका पर फौरन सुनवाई की। दूसरी ओर अदालतों में 60 हजार मामले जमानत के लिए लंबित हैं। जम्मू-कश्मीर के 550 लोगों की हैबियस कार्पस याचिकाएं सुनवाई की प्रतीक्षा में हैं।
  • सुप्रीम कोर्ट संवैधानिक मामलों की सुनवाई भी टालती है। राजनीतिक दलों को चंदा देने वाले चुनावी बांड की वैधता, जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बनाने, नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ 140 याचिकाओं सहित कई बड़े सवालों पर न्यायाधीशों ने विचार नहीं किया है।
  • हाईकोर्ट के पूर्व जज अजित प्रकाश शाह कहते हैं, इस सरकार ने निजी आजादी को बहुत अधिक नुकसान पहुंचाया है। लेकिन, अदालतें- खासकर सुप्रीम कोर्ट असहमति को हिंसक और अंधाधुंध तरीके से कुचलने पर मूक दर्शक बनी हुई हैं।
  • ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में कानून के वाइस डीन तरुनाभ खैतान कहते हैं, आपातकाल के समय खतरा एकदम स्पष्ट था। कई तरह से संविधान को नष्ट किया गया था। अब हम भेड़ के वेश में भेड़िया देख रहे हैं। धीरे-धीरे तानाशाही की ओर बढ़ रहे हैं। हम एक पार्टी शासन के अलावा एकाधिकारवादी सरकार देख रहे हैं।
  • सरकार ने निजी स्वतंत्रता का हनन करने के लिए कई कदम उठाए हैं। 1967 में बने यूएपीए कानून में संशोधन कर सरकार को किसी भी व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करने का अधिकार दिया गया है। 2019 में सूचना के अधिकार कानून को कमजोर कर दिया है।
  • भाजपा के समर्थक इस धारणा को गलत बताते हैं कि मोदी सरकार में लोकतंत्र कमजोर हुआ है। दक्षिण पंथी मैग्जीन स्वराज्य के संपादक राघवन जगन्नाथन कहते हैं, हमारे लोकतंत्र में खामियां हैं लेकिन यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। यह केवल सत्तारूढ़ लोगों से ही संबंधित नहीं है।
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