खाद्य संकट:एक साल में गेहूं के मूल्य 59% बढ़े, डेढ़ अरब लोगों को पेट भर खाना मिलने की संभावना नहीं

एक महीने पहले
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  • यूक्रेन युद्ध, जलवायु परिवर्तन के कारण अनाज की पैदावार प्रभावित

यूक्रेन पर रूसी हमले के कारण युद्ध के मोर्चे से बहुत दूर करोड़ों लोगों की जिंदगी खतरे में पड़ गई है। कोविड-19, जलवायु परिवर्तन और तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से कमजोर पड़ चुकी दुनिया की खाद्य व्यवस्था को युद्ध तहस-नहस कर रहा है। यूक्रेन से अनाज और तेल बीजों का निर्यात लगभग बंद है। रूस से भी रुकने का खतरा है। दोनों देश विश्व की जरूरत की 12% कैलोरी की सप्लाई करते हैं। पिछले साल से अब तक गेहूं के मूल्य 53% बढ़ चुके हैं। 16 मई को भारत द्वारा निर्यात रोकने की घोषणा के बाद इनमें छह प्रतिशत की और बढ़ोतरी हो गई।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने आगाह किया है कि दुनियाभर में खाने-पीने की चीजों की कमी कई साल तक जारी रहेगी। मुख्य खाद्य वस्तुओं की अधिक कीमतों के कारण 44 करोड़ से लेकर एक अरब 60 करोड़ लोगों को पर्याप्त खाना मिलने की संभावना नहीं है। लगभग 25 करोड़ व्यक्ति भुखमरी की कगार पर हैं। अगर युद्ध लंबा खिंचा और रूस, यूक्रेन से अनाज की सप्लाई सीमित रही तो करोड़ों लोगों के गरीबी के जाल में फंसने का खतरा है। राजनीतिक अशांति बढ़ेगी, बच्चों की शारीरिक वृद्धि प्रभावित होगी और भुखमरी फैलेगी।
रूस और यूक्रेन विश्व को 28% गेहूं, 29% जौ, 15% मक्का और 75% सनफ्लॉवर तेल सप्लाई करते हैं। लेबनान, ट्यूनीशिया के आधे और लीबिया, मिस्र के दो तिहाई अनाज की सप्लाई रूस और यूक्रेन से होती है। यूक्रेन 40 करोड़ लोगों को अनाज की सप्लाई करता है। युद्ध ने इस सप्लाई को अस्त-व्यस्त कर दिया है क्योंकि यूक्रेन ने हमले को विफल करने के लिए समुद्र में बारूदी सुरंगें बिछा रखी हैं। उधर, रूस ने ओडेसा बंदरगाह की नाकेबंदी कर दी है। वहां से यूक्रेन के माल की लदाई होती है। हालांकि, युद्ध से पहले ही विश्व खाद्य कार्यक्रम ने सचेत किया था कि 2022 भयानक वर्ष होगा। जलवायु परिवर्तन का असर अनाज की पैदावार पर नजर आने लगा है। विश्व के सबसे बड़े गेहूं उत्पादक चीन ने कहा है कि पिछले वर्ष भारी बारिश की वजह से बुवाई देर से हुई है। इस कारण अब तक की सबसे खराब फसल होगी। विश्व के दूसरे बड़े उत्पादक भारत में भीषण गर्मी से पैदावार घटी है। अमेरिका और फ्रांस में भी गेहूं की पैदावार कम हुई है। अफ्रीका के कई देश 40 साल के सबसे बदतर सूखे से प्रभावित हैं।
खाद्य संकट से सबसे अधिक गरीब लोग प्रभावित होंगे। उभरते देशों में हर परिवार अपने बजट का 25% और अफ्रीका में 40% फूड पर खर्च करता है। मिस्र में लोगों की कैलोरी में ब्रेड का हिस्सा 30% रहता है। संकट के बदतर होने का अंदेशा है। यूक्रेन ने युद्ध से पहले ही पिछले साल की पैदावार का निर्यात कर दिया था। मूल्य बढ़ने के बावजूद रूस अब भी अपना अनाज बेच रहा है। यूक्रेन के जो अनाज भंडार नष्ट नहीं हुए हैं, उनमें मक्का और जौ की फसल पूरी भरी है। किसानों के पास अपनी अगली फसल का भंडारण करने की जगह नहीं होगी। अगर कालासागर की नाकेबंदी खत्म हो जाए तो अनाज की सप्लाई में राहत मिल सकती है। इस समय यूक्रेन में ढाई करोड़ टन मक्का और गेहूं फंसा पड़ा है। इतने अनाज से दुनिया के सभी कम विकसित देशों में लोगों का साल भर पेट भरा जा सकता है। भारत, चीन सहित अन्य देश रूस और यूक्रेन से अनाज की सप्लाई शुरू कराने के प्रयास करें तो दुनिया का खाद्य संकट काफी हद तक दूर किया जा सकता है।
युद्ध से 46 लाख करोड़ रुपए की आमदनी प्रभावित होगी

विश्व बैंक का अनुमान है कि यूक्रेन युद्ध से दुनिया की 46 लाख करोड़ रुपए की आय प्रभावित होगी। विश्व खाद्य संगठन के अनुसार रूस और यूक्रेन 50 देशों की गेहूं की 30% जरूरत पूरी करते हैं। 26 देशों के लिए यह आंकड़ा 50% से अधिक है। अनाज की पैदावार के लिए फर्टिलाइजर महत्वपूर्ण जरूरत है। रूस नाइट्रोजन, पोटाश और फास्फेट आधारित खाद का मुख्य सप्लायर है। प्रतिबंध से सप्लाई पर असर पड़ा है। अनाज की पैदावार पर मौसम परिवर्तन ने गंभीर असर डाला है। ब्रिटेन के मौसम कार्यालय का अनुमान है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण भारत में इस वर्ष जैसी भीषण गर्मी आगे भी पड़ने की आशंका है। अमेरिका में बारिश कम होने से गेहूं की 40% फसल बहुत कमजोर होने का अनुमान है। यूरोप में भी कम वर्षा से गेहूं की फसल कमजोर हो सकती है।

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