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  • With The Package Of Rs 77 Lakh Crore, Consumer Spending On Boom, People Are Spending More Than Usual 10 October 2021

अर्थव्यवस्था की हालत:77 लाख करोड़ रुपए के पैकेज से कंज्यूमर खर्च उफान पर, लोग सामान्य से अधिक खर्च कर रहे

6 दिन पहले
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  • दुनियाभर में कामगारों और जरूरी सामान के अभाव से विकास दर पर असर

2007-08 के वित्तीय संकट के बाद दुनिया की अर्थव्यवस्था खर्च की कमी से जूझ रही थी। लोगों ने अपने कर्ज चुका दिए थे, सरकारों ने किफायत शुरू कर दी थी और प्राइवेट कंपनियों ने निवेश रोक दिया था। अब बेतहाशा खर्च हो रहा है। मांग इतनी है कि चीजों की सप्लाई नहीं हो पा रही है। ट्रक ड्राइवरों को बोनस दिया जा रहा है, बंदरगाहों में सामान से लदे जहाज खड़े हैं। तेल,गैस के मूल्य ऊंचाइयों पर हैं। इसका मुख्य कारण कोविड-19 महामारी है। दुनियाभर में सरकारों ने 77 लाख करोड़ रुपए के सहायता पैकेज दिए हैं। इस वजह से कंज्यूमर सामान्य के मुकाबले वस्तुओं पर अधिक खर्च कर रहे हैं। महामारी के दौरान इलेक्ट्राॅनिक वस्तुओं की मांग बढ़ी लेकिन माइक्रोचिप्स की कमी से कई देशों में औद्योगिक उत्पादन सुस्त पड़ गया है।

एशिया के कुछ भागों में डेल्टा वैरिएंट फैलने से कपड़ा कारखाने बंद हैं। अमीर देशों में दूसरे देशों से कामगारों का आना बंद है। लोगों के बैंक खाते सरकारी मदद से भरे पड़े हैं। कारोबारियों,उद्योगपतियों को कामगार नहीं मिल रहे हैं। कमी का सामना कर रही अर्थव्यवस्था के दो परिणाम स्पष्ट हैं। पहला है,कार्बन उत्सर्जन में कमी। कोयला की जगह ऊर्जा के नए स्रोत अपनाने से यूरोप खासकर ब्रिटेन में प्राकृतिक गैस की सप्लाई पर असर पड़ा है। वहां इस सप्ताह गैस के दाम 60% बढ़ गए।

कुछ प्रदेशों में स्वच्छ पर्यावरण के लक्ष्य का पालन करने से चीन के बहुत बड़े हिस्से में बिजली कटौती चल रही है। कोयले से बिजली बनाने वाले प्लांट कम उत्पादन कर रहे हैं। जहाज से माल ढुलाई और तकनीकी उपकरणों के बढ़े मूल्यों की वजह से उत्पादन क्षमता बढ़ाने के खर्च में बढ़ोतरी हुई है। दूसरा परिणाम टैक्स और टैरिफ के रूप में सरकारों की संरक्षणवादी नीतियां हैं। अमेरिका ने चीनी माल पर भारी टैरिफ लगा रखे हैं। कई देशों ने ऐसा किया है।

वर्तमान स्थिति 1970 की याद दिलाती है जब कई देशों में पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें थीं। मूल्य वृद्धि दो अंकों में थी और विकास दर सुस्त पड़ी थी। 50 साल पहले राजनेताओं ने मूल्य नियंत्रण जैसे उपायों से महंगाई का मुकाबला करने की गलत नीति अपनाई थी। आज आम राय है कि रिजर्व बैंकों को स्थिति संभालनी चाहिए। इस समय महंगाई, मुद्रास्फीति बेकाबू होने के आसार नहीं हैं। अगले साल वैक्सीनों की पहुंच बढ़ने और कोरोना वायरस के नए इलाज से सामान्य स्थितियों में बाधा कम पड़ेगी। कंज्यूमर माल की तुलना में सेवाओं पर अधिक खर्च करेंगे।

फिर भी, कमी की अर्थव्यवस्था के पीछे सक्रिय ताकतें बेअसर नहीं होंगी। राजनेता खतरनाक और गलत दिशा में जाने वाली नीतियां लागू करेंगे। अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले दबाव से कार्बन उत्सर्जन घटाने के प्रयासों और ग्लोबलाइजेशन के लिए खतरा पैदा हो सकता है।

छह साल में निजी निवेश आधे से भी कम हो गया
अमेरिका मेंं राष्ट्रपति जो बाइडेन की सरकार ने इस सप्ताह पुष्टि की है कि वह चीन पर पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा लागू टैरिफ (औसतन 19%) कायम रखेगी। आर्थिक राष्ट्रवाद ने भी कमी की अर्थव्यवस्था में इजाफा किया है। यूरोपियन यूनियन से अलग होने के कारण ब्रिटेन में ट्रक ड्राइवरों की कमी हुई है। भारत द्वारा आयात में कटौती से कोयले की कमी हुई है। 2015 के बाद व्यापार को लेकर चल रहे तनाव की वजह से प्राइवेट कंपनियों का निवेश आधे से कम रह गया है।

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