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इंस्पायरिंग:अपनी सारी ऊर्जा इसमें लगाइए कि लोगों को आपकी जरूरत हो - रेसुल पूकुट्टी

25 दिन पहले
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  • 30 मई को 50 साल के हो रहे ऑस्कर विनर साउंड डिज़ाइनर रेसुल पूकुट्टी से जानिए संवाद का महत्व

मेरे बारे में बताया जाता है कि मैं गरीब परिवार से था, चिमनी में पढ़ा, अभावों में जीया...वगैरह। इन बातों में मुझे गौरव नहीं नजर आता.. क्योंकि 80 फीसदी भारत इन्हीं हालातों से जूझता है। यह जरूर है कि गांव में जो जिंदगी जी, उससे मुझे एक अलग तरह की मजबूती मिली।

जिन मुश्किलों से बचने की कोशिश करेंगे, वो बार-बार सामने आएंगी

हमारे गांव में सिनेमा नहीं था, लेकिन मैं शहर जाकर फिल्में देखता था। स्कूल के छह किलोमीटर के सफर को मैं उन फिल्मों की कहानियों को दोस्तों को सुना कर पूरा करता था। जब मैं असली कहानी से बोर हो जाता तो अपने मन से चीजें जोड़ता था। शायद मेरा ‘सेंस ऑफ नरेशन’ वहीं से पैदा हुआ। मैंने सारी पढ़ाई अपनी क्षेत्रीय भाषा में की, कॉलेज में मुझे अंग्रेजी का सामना करना पड़ा। मुझे काफी समय तक कुछ समझ नहीं आया। मैं जीवन में जिन चीजों से बचता रहा, उनका सामना मुझे करना ही पड़ा। गणित से बचने की कोशिश की तो बीएससी राह में आ गई। हिन्दी से बचकर मलयालम चुनी, तो फिल्मों में इससे जूझना पड़ा। फिजिक्स का प्यार मुझे साउंड तक ले गया और मैंने फिल्म इंस्टिट्यूट में एडमिशन लेने की कोशिश की। मैंने इंटरव्यू बोर्ड में सभी को प्रभावित करने की कोशिश की। असफल रहा, एडमिशन नहीं मिला। लेकिन मेरे पास प्लान ‘बी’ था। मैं वकील बन सकता था, सो दबाव नहीं था। अगली बार एडमिशन हो गया।

ज़िंदगी का पहला झटका...

एडमिशन के बाद जब मैं फिल्म इंस्टिट्यूट पहुंचा तो मुझे जिंदगी का पहला झटका लगा। यहां मैं पूरे देश से आए लोगों से पहली बार मिल रहा था। पहली बार बंगाल, ओडिशा, दिल्ली के लोगों से मिला। मुझे अहसास हुआ कि मैं उनसे बात नहीं कर पा रहा हूं। जिस भाषा को मैं जानता था, वो मेरी बात उन तक पहुंचा नहीं पा रही थी। पहली बार मुझे अहसास हुआ कि मेरी अब तक की सारी पढ़ाई व्यर्थ है, क्योंकि मैंने सही मायनों में पढ़ा ही नहीं है। मैंने परीक्षा दी, मुझे नंबर मिले, पास हो गया। हमें जो पहला प्रोजेक्ट मिला वो यह था कि आप बैठो और लोगों को देखो कि उन पर अगर आपको डॉक्यूमेंट्री स्क्रिप्ट बनाना हो तो कैसे बनाओगे। मेरे दोस्त लोगों से बात कर रहे थे लेकिन मैं नहीं कर पा रहा था। यहां मुझे अहसास हुआ कि एजुकेशन का सही मतलब दरअसल भाषा का असली मतलब जानना है।

ज़िंदगी का दूसरा झटका...

जब मैं काम तलाशने लगा तो एहसास हुआ कि इंडस्ट्री को मेरी जरुरत नहीं है क्योंकि मैं जो कर रहा हूं उसे कोई जानता ही नहीं है। मुझे अपनी सारी ऊर्जा इसमें लगानी पड़ी कि लोगों को मेरी आवश्यकता हो। आप जब एक सांचे में मिला ज्ञान लेकर स्कूल से बाहर निकलेंगे तो आपसे कहा जाएगा कि हमें आपकी कोई आवश्यकता नहीं है। ऐसे में यह सवाल आपके मन में उठेगा कि क्या वाकई हमें ऐसी एजुकेशन की जरूरत है। मैं आपको जवाब दूंगा.. है, वाकई है। क्योंकि यह मेरी जिम्मेदारी है मैं अपनी आवश्यकता इंडस्ट्री में पैदा करूं। यह आपकी जिम्मेदारी है कि आप समाज में अपनी जगह बनाएं। आपकी जिम्मेदारी है कि पहले आप अच्छे बेटे, अच्छे भाई, अच्छे पति बनें... फिर अच्छे प्रोफेशनल बनें। जब अच्छे इंसान बनेंगे तो ही आप अच्छे आर्टिस्ट बन सकते हैं।

(2012 में कोचीन के डॉन बोस्को स्कूल में ऑस्कर अवॉर्ड विजेता रेसुल पूकुट्टी)

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