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इंस्पायरिंग:एक वक्त था...मनोज बाजपेयी को वड़ा-पाव भी महंगा लगता था पर उन्हें भूख सिर्फ काम पाने की थी

एक महीने पहले
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  • मनोज बाजपेयी ने हाल ही में एक और नेशनल अवॉर्ड अपने नाम किया है

नेपाल सीमा के पास, बिहार के बेलवा गांव में 23 अप्रैल 1969 को जन्मे मनोज बाजपेयी में बचपन से आत्मविश्वास की कोई कमी नहीं थी। किसान के इस परिवार में उनके पांच भाई-बहन और थे, सो सभी पर ध्यान रखना मां-पिता के लिए संभव नहीं था। बच्चों को खुली आजादी थी कि वो जो चाहे, सो करें। यह बातें बचपन से मनोज के साथ ऐसी जुड़ीं कि अभी तक कायम हैं। फिल्म चुनने की बात हो या आत्मसम्मान की, मनोज कभी समझौता नहीं करते।

केवल नौ साल की उम्र में उन्होंने तय कर लिया था कि एक्टर ही बनना है। अमिताभ बच्चन की फिल्मों को वो तब से देखा करते हैं जब से गांव के झोपड़ीनुमा स्कूल में पढ़ा करते थे, और तब तक देखते रहे जब तक दिल्ली में खुद नाटक करने लग गए। गांव के पास के एक शहर में जब कॉलेज में पढ़ने गए तो राजनीति और गुटबाजी में उनके दो साल ज़ाया हो गए। पिता ने सलाह दी कि वो शहर छोड़ दें। दिल्ली यूनिवर्सिटी आने के फैसले में पिता उनके साथ थे और उनकी फीस के लिए 200 रुपए भी उन्होंने ही दिए थे।

17 साल की उम्र में दिल्ली आकर मनोज ने खूब थिएटर किया। वो उनकी बैच के सबसे व्यस्त स्टूडेंट हुआ करते थे। उन तीन साल में मनोज ने करीब 400 नाटक किए। दिल्ली से बाहर निकलने में उन्हें निर्देशक अनुभव सिन्हा का साथ मिला। अनुभव और मनोज, दिल्ली के मंडी हाउस में साथ थे। अनुभव, दिल्ली से मुंबई आकर निर्देशक पंकज पराशर को असिस्ट करने लगे। पंकज को एक सीरीज के लिए एक्टर चाहिए था तो अनुभव ने मनोज को मुंबई बुलवाकर निर्देशक के आगे पेश किया। मनोज को रोल मिल तो गया, लेकिन वो सीरीज कभी बन ही नहीं पाई।

मनोज ने तय किया कि वो अब वापस नहीं जाएंगे। पांच दोस्तों के साथ मुंबई की एक चाॅल को उन्होंने ठिकाना बना लिया। एक बार तो उन्हें मिले तीन प्रोजेक्ट एक ही दिन में उनके हाथ से चले गए। एक दफा पहले ही शॉट के दौरान उन्हें स्टूडियो से निकलने को कह दिया गया और असिस्टेंट डायरेक्टर ने उनकी तस्वीरें भी फाड़ दी थीं। चॉल का किराया नहीं भर पा रहे थे और वड़ा-पाव तक उन्हें महंगा लगने लगा था। लेकिन उनकी यह भूख काम पाने की भूख से छोटी थी। वे लगातार कोशिश करते रहे और लगभग चार साल के स्ट्रगल के बाद उन्हें महेश भट्ट के टीवी सीरियल ‘स्वाभिमान’ में काम मिला। 1994 में उन्हें इसमें काम करने के लिए 1500 रुपए प्रति एपिसोड मिलते थे।

फिल्मों में उनकी एंट्री शेखर कपूर की ‘बैंडिट क्वीन’ से हुई। फिर ‘द्रोहकाल’, ‘दस्तक’, ‘दौड़’, ‘तमन्ना’ जैसी फिल्मों में रोल मिलते रहे। 1998 में आई राम गोपाल वर्मा की ‘सत्या’ को मनोज अपना असल डेब्यू मानते हैं और इसी फिल्म ने उनकी जिंदगी बदल दी। ‘भीखू म्हात्रे’ के रोल से वो पूरे देश में पहचाने गए। इस रोल के लिए उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का नेशनल अवॉर्ड भी मिला।

उस जमाने में साइनिंग अमाउंट सूटकेस में दिए जाते थे, वो बताते हैं कि उन्होंने ऐसे कई सूटकेस लौटाए क्योंकि रोल उनकी पसंद के नहीं थे। यह इंकार उन्होंने तब किया जब हालात उनके विपरीत थे। ‘शूल’, ‘पिंजर’, ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ और ‘अलीगढ़’ जैसी फिल्मों से उन्होंने अपना स्तर ऊंचा किया।

2019 में ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आई वेब सीरिज़ ‘द फैमिली मैन’ ने उन्होंने एक बार फिर ‘सत्या’ वाली सफलता दिखाई है।सफलता के बारे में एक दफा मनोज ने कहा था ‘पहली सफलता के बाद जब मैंने अपना पहला घर खरीदा तब मैं जान गया था कि मैं इंडस्ट्री में बना रहूंगा। सपने जब सच होने लगते हैं तो मेहनत मायने नहीं रखती।’

यह भी जानिये

- नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से मनोज तीन बार रिजेक्ट हुए थे।

- एक दौर ऐसा आया था जब वो डिप्रेशन के कारण आत्महत्या के करीब पहुंच गए थे, तब उनके दोस्तों ने साथ दिया और रात में उन्हें अकेला नहीं छोड़ते थे।

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