इंस्पायरिंग:जब सब अच्छा चल रहा हो, तब भी हमें प्रयोग करते रहने चाहिए - विश्वनाथन आनंद

17 दिन पहले
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  • शतरंज लेजेंड विश्वनाथन आनंद की बायोपिक पर फिर काम शुरू...

‘सफलता पाना आसान है। मुश्किल तो उसके बाद का सफर है। सन 2000 में जब मैं वर्ल्ड चैम्पियन बना, तब मुझे अपना रास्ता मालूम था, मैं कठिनाइयों को पार करते हुए अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ रहा था। इस जीत के बाद एक वैक्यूम पैदा हुआ। अब क्या बड़ा? मैंने अपना रूटीन बनाए रखा। तैयारी में कोई कमी नहीं रखी। लेकिन 2001 में एक बड़ा टूर्नामेंट हार गया। दो मैच हारने के बाद भी मैं चाह कर भी अपनी हार रोक नहीं पाया। लग रहा था कि मैं अपने न्यूनतम पर हूं। चौथी हार हुई... और मेरे जीवन का सबसे बुरा प्रदर्शन मेरे सामने था।आखिर क्या गलत हो रहा था? तमाम मेहनत के बाद वो ‘स्पार्क’ गायब था। मैं हार से इतना डर रहा था कि रिस्क लेना छोड़ चुका था। जीत का फॉर्मूला बदलना मुश्किल होता है, लेकिन प्रयोग तब भी बंद नहीं करना चाहिए जब हम सफल हो रहे हों।

हार, आपको प्रयोग करने की हिम्मत देती है। सफलता इस राह पर चलने की प्रेरणा दे ही नहीं सकती। इसके बाद मैंने तय किया कि कुछ अलग करूंगा। नए तरीकों पर काम शुरू किया। हद तब हुई जब दुबई ग्रांप्री के दूसरे ही राउंड में बाहर हो गया। यह मेरे लिए झटका था। इस टूर्नामेंट में एक अनोखा नियम था। अगर आप हार भी जाते हैं तो फाइनल के लिए कोशिश कर सकते हैं। मेरे सामने दो रास्ते थे, सात दिन टॉर्चर सहूं या खूब रिलैक्स होकर मजे से शतरंज खेलूं... मैंने दूसरा रास्ता चुना। मैंने खेल शुरू करने का अपना तरीका बदला और रिजल्ट की चिंता करना छोड़ दिया। दुबई के बाद प्राग गया। मुझे जीतने वालों में गिना भी नहीं जा रहा था। ये मेरे लिए जागने का वक्त था। मुझे यहां हारने या टूर्नामेंट से बाहर होने का डर नहीं था। मैं तो बस खुद के साथ अच्छा वक्त बिताना चाहता था और इवेंट से सीखना चाहता था।

इस टूर्नामेंट को जीतने में मुझे जरा भी दिक्कत नहीं हुई। तो प्राग में क्या सही हुआ? मैंने चैलेंज को एंजॉय करना शुरू किया। मैं पसंदीदा खिलाड़ियों में नहीं था इसलिए मुझे मेरे आलोचकों को आकर्षित करना था। खुद को जरा-सा बेहतर बनाना अपने आप में चैलेंज मैंने केवल उन बातों पर काम किया जो शतरंज का भला कर सकती थीं। कोच के साथ काम करना बंद किया। टूर्नामेंट्स में अकेले जाना शुरू किया। तब मुझे वो स्पार्क मिला जो मेरे अंदर खो रहा था।

बदलाव के लिए 2002 के इवेंट छोड़े। नए लोगों के साथ काम किया। नए खिलाड़ियों से नई स्टाइल समझी। लेकिन सबसे बड़ा सबक यही था कि जब सब अच्छाचल रहा हो, तो भी प्रयोग करते रहना चाहिए। अपने अच्छे फॉर्म में खुद का आकलन कभी ना छोड़ें। जब आप बदलाव के लिए तैयार नहीं होते हैं तो यह पहली निशानी है कि कुछ गड़बड़ाने वाला है।’ (2007 में चेन्नई में विश्वनाथन आनंद)

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- खुद की आलोचना करते रहना सबसे अहम है।

- हर चैलेंज को सीखने के लिहाज से देखना चाहिए। अपने आपको बदलते रहें।

- आपका हर परफॉर्मेंस, सफलता और असफलता नाम के दो पिलर्स के बीच झूलता है।

- आपके अंदर मौजूद जुनून ही फर्क पैदा करने की क्षमता रखता है।

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