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इंस्पायरिंग:लक्ष्य कैसा भी हो, यह देखें उसे हासिल करने के सफर में मजा आएगा या नहीं’ - पीवी सिंधु

9 दिन पहले
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  • सिंधु होंगी टोक्यो ओलिंपिक्स में भारत से एकमात्र फीमेल शटलर। कम उम्र में कई सफलता, सिंधु ने कैसे पाईं... जानिए उनसे

अब हर किसी की इच्छा है कि उनका बच्चा स्पोर्ट्स में जाए। पहले ऐसा नहीं था। पहले तो सभी बच्चों को लेकर दो ही सपने देखते थे, कि या तो वो डॉक्टर बने, या इंजीनियर। अब बदलाव आ चुका है। अब तो बच्चे भी खेल को बतौर कॅरिअर अपनाना चाहते हैं। यह माहौल खेल के लिए अच्छा है कि पैरेंट्स अपने बच्चों को खेल में आगे ला रहे हैं।

मैं मानती हूं बच्चों के लिए जरूरी है कि वो अपने और अपने पैरेंट्स के सपनों को हासिल करें। ऐसे मामलों में पैरेंट्स से मिला प्रोत्साहन बहुत मायने रखता है। इससे बच्चा ज्यादा मेहनत करने के लिए प्रेरित होता है। मेरे पैरेंट्स भी खिलाड़ी रहे हैं, उन्हें पता था कि बच्चे को कुछ हासिल करवाना है तो हमें भी उसके साथ चलना होगा। उन्होंने तो अपनी नौकरियों से वीआरएस भी ले लिया था। मेरे साथ वो हर जगह जाते थे। बच्चों को भी यह समझना होगा कि जिसकी तलाश में वो निकल रहे हैं, उसे हासिल करना आसान नहीं होगा... कड़ी मेहनत करनी होगी।

आपके इस सफर में वो मौके आएंगे जब आप थकेंगे और हार मानने लग जाएंगे। ये ख्याल भी आएंगे कि बस, बहुत हो गया.. अब नहीं संभव हो पाएगा। लेकिन इसी वक्त अगर आप अपने लक्ष्य को देखना और उसके बारे में सोचना शुरू करेंगे तो कभी हार नहीं पाएंगे, खुद-ब-खुद जोश से भर जाएंगे। आप यह नहीं कर सकते कि आज हार मान लें, और कल फिर शुरू कर दें। मैं मानती हूं कि लक्ष्य कोई भी तय करो, सबसे पहले यह देखो कि उसे हासिल करने के सफर में आपको मजा आएगा या नहीं। जब मजा आएगा तो ही आप खुद पर भरोसा करेंगे। यह भरोसा ही सफलता की कुंजी है।

वैसे आप कुछ भी करें, ये जरूर जान लें कि जीवन का यह आखिरी काम नहीं है। ऐसे कई लक्ष्य हासिल करने हैं। किसी में आप असफल भी होते हैंं तो कोई बात नहीं। सबसे अहम है, चलते रहना । चलते रहेंगे तो सफलता मिलेगी ही।

(दिल्ली के ‘स्मार्ट वैल्यु’ इवेंट में पीवी सिंधु)

जो हासिल हुआ उसी से लें कॉन्फिडेंस

जब मैं एक के बाद एक लगातार बड़े फाइनल्स हार रही थी, तो मुझ पर एक अलग तरह का दबाव बनने लगा था। यह दबाव सोशल मीडिया और अखबारों से झांक रहा था, जिनमें कहा जा रहा था कि मुझे फाइनल फोबिया हो गया है वगैरह...वगैरह। मैं खुद को अलग-अलग तरह से समझाती थी, ऐसे में मुझे लक का सहारा लेना भी बुरा नहीं लगता था कि इस बार ‘लक’ ने मेरा साथ नहीं दिया। हमेशा खुद से कहती थी कि ये गेम का हिस्सा है, हार और जीत चलती रहेगी। निराश होने के बजाय मैंने खुद को यह तक समझाया कि मैं सिल्वर जीत कर आ रही हूं, जबकि पहले राउंड में बाहर होकर बिना मेडल के भी वापसी हो सकती थी। महत्वपूर्ण यह है कि आप बुरे दौर में कैसे खुद को समझाते हैं और हार नहीं मानते हैं। गोल्ड नहीं पा कर निराश होने से अच्छा है, सिल्वर पाकर भी आत्मविश्वास से भरे रहना।

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