इंस्पायरिंग:जब सब ठीक ना हो तो खुद से बात करें, सीनियर्स से सीखते रहें - श्रेयस अय्यर

6 महीने पहले
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  • टेस्ट डेब्यू में श्रेयस अय्यर ने शतक मारा है। ऐसा करने वाले वे 16वें भारतीय हैं।

‘मैं दक्षिण भारतीय मध्यम वर्गीय परिवार से हूं। अमूमन वहां पैरेंट्स चाहते हैं कि बच्चा अच्छा पढ़े-लिखे। मेरे पैरेंट्स बेहद कूल थे। क्रिकेट के मेरे जुनून को उन्होंने हमेशा सपोर्ट किया। बस उनका यही कहना था कि अगर तुम क्रिकेट खेल रहे हो तो पूरे दिल से खेलो, एक-एक पल को एंजॉय करो। इसमें लंबा जाना चाहते हो तो गंभीरता बनाए रखना, क्योंकि अगर तुमने फोकस खो दिया तो तुम ना तो खेल के रहोगे, ना पढ़ाई के।

मैंने उनकी बात सुनी और खेलता रहा। बात उस वक्त की है जब अंडर 19 खेलने के बाद मेरा सिलेक्शन भारतीय टीम में नहीं हुआ। मैं निराश था। मेरी एक आदत है, दौर अच्छा हो या बुरा... मैं ईश्वर से बात करता हूं। जब भी मुझे खुद को हल्का करना होता है, मोटिवेट करना होता है, मैं खुले आसमान के नीचे जाता हूं, मन की बातें कहता हूं। सारी भड़ास निकालता हूं कि मैं यह कर दूंगा, वो कर दूंगा, ये टारगेट हासिल करूंगा, वो पा लूंगा। ऐसे ही एक दिन जब हम अंडर 19 वर्ल्ड कप से बाहर हुए तो मैं रो रहा था। उसी दिन टीम के मेरे एक साथी का कॉल आया कि इंग्लैंड के एक क्लब को मेरे जैसे खिलाड़ी की जरूरत है। मैंने तुरंत कोच, सिलेक्टर्स और जानने वालों से इस बारे में बात की। सभी ने कहा मुझे जाना चाहिए।

मैं पहली बार घर से निकला। इंग्लैंड गया। वहां सब मुझे ही करना होता था। मैं टीम के एक साथी के साथ रहता था, लेकिन अपने काम आपको ही करना होते थे। वहां मैं किसी पर निर्भर नहीं हो सकता था। घर पर खाना बनाना, कपड़ों को धोना-सुखाना.. इन चीजों ने मुझे खूब सिखाया। इन कामों ने ही मुझे जिम्मेदारी सिखाई। मैं खुद को मैच्योर महसूस करने लगा। इस बदलाव ने मेरे खेल पर असर किया। क्रिकेट में मेरा फोकस बढ़ा। मैं समझता हूं यह मेरी जिंदगी बदल देने वाला दौर था।

मैं अपने खेल को 50 फीसद नेचुरल मानता हूं और 50 फीसद मेंटल। जब मैंने सेकंड सीजन में 1300 से ज्यादा रन बनाए तो मुझे उम्मीद थी कि मेरा सिलेक्शन भारतीय टीम में हो जाएगा। मैं देख रहा था कि दूसरे खिलाड़ी मुझसे आगे निकल रहे हैं और भारत के लिए खेल रहे हैं, जबकि उनका परफॉर्मेंस मुझसे कम है। मैंने सीनियर्स से बात करना शुरू की, सिलेक्टर्स से भी पूछा... कमी कहां हैं? उन्होंने मुझे बताया कि तुम अति आक्रमक खिलाड़ी हो, उच्च स्तर पर कोई तुमको अच्छी गेंद डालेगा तो तुम उसे संभाल नहीं पाओगे।मैंने इस बात को समझा। मैंने खुद को बदलाव के लिए तैयार किया और खुद से कहा कि ये भी करके देखते हैं। आपको ओपन होना होता है, अपनी कमियों के बारे में सुनने के लिए, उसमें सुधार के लिए।

मैंने खुद से बात की और इस बदलाव पर काम किया। धीरे-धीरे मुझे अहसास हुआ कि जितना मैं विकेट पर ठहरूंगा, मेरा खेल एक जैसा होता जाएगा, कंसिस्टेंट रहेगा। मैं नेचुरली आक्रामक खिलाड़ी था। मैंने कभी इस डर को हावी नहीं होने दिया कि मैं चमक खो दूंगा। मैं अपने शॉट्स में जान झौंकता रहा, मेरे इलाके में गेंद अगर आई है, तो मैं उसे मारूंगा ही।

सिलेक्शन ना होने का गुस्सा मुझमें हमेशा रहा। कई बार मैं रूड भी हुआ। लेकिन मैंने यह अहसास किया कि ज्यादा सोचने का नहीं, करते रहने का समय है। मैं जिंदगी के मजे लेता रहा, खेल को एंजॉय करता रहा। बल्लेबाजी में मजा लेना कभी नहीं छोड़ा। जब आपको मजा आता है, तो रन बनते हैं। मैंने अपना काम किया। आखिर एक दिन मेरा सिलेक्शन हुआ।

लेकिन आपको बताऊं... इंडिया डेब्यू करते वक्त ये सब कुछ मेरी आंखों से नहीं गुजरा। मैं इमोशनल नहीं हुआ क्योंकि उस वक्त मुझे लग रहा था कि ये कैप मुझे बहुत पहले ही मिल जाना चाहिए थी। इसके बाद जब-जब मुझे कैप मिली, मैंने अपने आप से सिर्फ यही कहा - ठीक है।’

(सोशल मीडिया के विभिन्न कार्यक्रमों में भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी श्रेयस अय्यर)

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