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  • Everyone's Mindset Is Different, But Each Time A Changing Mindset Puts It Into Thinking. Something Similar Happened With Swastik.

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लघुकथा 'स्टेटस':सभी की मानसिकता अलग होती है, लेकिन हर बार बदलती मानसिकता सोच में डाल देती है; कुछ ऐसा ही हुआ स्वास्तिक के साथ

पुखराज सोलंकी3 महीने पहले
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  • बूते के मुताबिक जीना स्टेटस के ख़िलाफ़ नहीं होता।
  • उस दिन स्वास्तिक ने यह बात अपने पिता को अनूठे ढंग से समझा दी।

रविवार का दिन था और सुमित अपने बारह वर्षीय बेटे स्वास्तिक के साथ अपने दोपहिया वाहन पर घर का सामान लाने निकला। सामान की लिस्ट पीछे बैठे स्वस्तिक के हाथ में थी। तभी फलों के एक ठेले को देखकर स्वास्तिक बोला, ‘रुकिए पापा! हमारी लिस्ट में केला, सेब, और पपीता भी है। क्यूं न यह सामान हम इस ठेले वाले से खरीद लें।’

बेटे की बात सुनकर उसका मन रखने के लिए सुमित ने ठेले के पास वाहन खड़ा किया और केले, सेब और पपीते के भाव पूछकर वाहन आगे बढ़ा लिया। स्वास्तिक ने सोचा शायद वह ठेले वाला कुछ महंगा लगा रहा है, इसीलिए पापा ने वहां से फल नहीं ख़रीदे। स्वास्तिक यह सब सोच ही रहा था कि सुमित ने एक सुपर मार्केट के आगे वाहन रोका और पार्क कर दिया। पिता-पुत्र दोनों अंदर चले गए।

अंदर जाकर स्वास्तिक ने लिस्ट निकाल कर अपने पापा को दी और वो एक-एक करके सभी सामान बास्केट में डालते रहे। जब वे स्टोर के सब्ज़ी और फल वाले हिस्से में पहुंचे तो सुमित को वहां से फल ख़रीदते देखकर और रेट लिस्ट देखकर स्वास्तिक बोला, ‘पापा, इन सब फलों के उस ठेले वाले ने बहुत कम दाम बताए थे, फिर भी आप वहां से न ख़रीदकर यहां महंगे होने के बावजूद ख़रीद रहे हैं ऐसा क्यूं ?’

‘बेटा, कोई देखेगा तो क्या कहेगा। वैसे भी दस-बीस रुपये सस्ते के चक्कर में ठेले, थड़ी, फुटपाथ से कुछ ख़रीदना ठीक नहीं लगता। हमें शोभा नहीं देता।’ कहते हुए बेटे का हाथ पकड़ कर सुमित कैश काऊंटर की ओर बढ़ा। लेकिन बेटा अपनी ही सोच में पड़ा था।

जब वे स्टोर से बाहर अपनी वाहन पार्किंग तक आए तो एक फटेहाल महिला ने उनकी ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा, ‘बेटा, कुछ दे दो। भगवान भला करेगा।’ सुमित ने जेब हाथ डाला और उस महिला के हाथ में एक सिक्का थमाकर स्कूटी स्टार्ट करने लगा। तभी स्वास्तिक ने भी अपनी जेब टटोली और एक पचास का नोट निकालकर उस महिला के हाथ में थमा दिया।

यह देख सुमित कुछ बोलता उससे पहले स्वास्तिक बोल पड़ा, ‘पापा, कोई देखेगा तो क्या कहेगा, वैसे भी किसी ग़रीब को एक-दो के सिक्के देना हमारे स्टेटस को शोभा नहीं देता। यह मेरा जेबख़र्च है, जो आप हर रविवार मुझे देते हैं।’ मासूम बेटे के मुंह से अचानक निकले इन शब्दों ने सुमित को स्टेटस के सही मायने समझा दिए। घर लौटते वक्त सुमित ने उसी ठेले के पास अपना दोपहिया वाहन रोका और कुछ फल खरीदे, जो लिस्ट में नहीं लिखे थे।

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