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कहानी:आंगन में खड़ी दीवार ढहने से दोनों परिवारों के प्रेम के बीच खड़ी दीवार भी ढह गई थी...

वैभव कोठारी7 दिन पहले
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  • जुड़वां भाइयों के बीच खड़ी दीवार में आज एक संकट आ बैठा था।
  • दीवार बनने का पूरा गांव साक्षी रहा था और आज संकट में वही गुहार भी लगा रहा था।

रमन और चमन दो भाई। आयु में चमन, रमन से पांच मिनट छोटा। दोनों एक से दिखाई देते हैं। पिताजी दोनों को एक ही रंग के एक जैसे कपड़े लाकर देते। दोनों भाइयों में गहरा प्रेम था। नदी पर, खेत में, कुएं पर, पशु चराने या हतई (चौपाल) पर, जहां भी जाते, दोनों भाई साथ ही जाते। रमन बिना चमन अधूरा और चमन, रमन का पूरक। गांव वाले दोनों भाइयों के प्रेम की सौगन्ध खाते। आसपास के सात गांव में उनका गांव, ‘रमन और चमन का गांव’ नाम से प्रसिद्ध था। समय बीतता गया। दोनों भाइयों के विवाह भी एक साथ हुए। कुछ वर्षों के बाद दोनों दो-दो बच्चों के पिता बन गए थे। दादा-दादी, रमन-चमन और रमन-चमन की पत्नियों और बच्चों सहित कुल दस सदस्यों का संयुक्त परिवार। घर, धन-धान्य से भरा था। किंतु अब जैसे किसी की नज़र उनके परिवार को लग गई थी। शाम के समय जब दोनों भाई खेत से घर लौटते तो अपने बच्चों को लड़ते हुए पाते। दोनों की पत्नियां एक-दूसरे के बच्चों की शिकायत करने लगतीं। कई बार तो उनकी पत्नियां भी बच्चों की लड़ाई में शामिल होकर आपस में लड़ रही होतीं। ऐसे में दोनों भाई बिना भोजन किए ही सो जाते थे।

एक बार तो इस लड़ाई ने भीषण रूप ले लिया। पशु चराकर, जब दोनों भाई घर लौटे तो घर का सारा सामान बिखरा पड़ा था। पिता घर के बाहर सिर पकड़ कर बैठे थे। मां खटिया पर बैठी सुबक रही थीं। रमन और चमन की पत्नियों में हाथापाई हो गई थी। दोनों को ख़ूब चोट आई थी। इसी लड़ाई में घर का सारा सामान यहां-वहां टूटी-फूटी स्थिति में पड़ा था। दोनों भाई अपनी-अपनी पत्नियों के कक्ष में गए। रमन की पत्नी का सिर फूटा था, चमन की पत्नी का भी यही हाल था। दोनों की पत्नियां रो-रोकर शिकायत कर रही थीं। इन आंसुओं की बाढ़ में दोनों भाइयों का आपसी प्रेम भी बह गया। रात में ही पंचायत बैठाई गई। पंचों ने निर्णय लिया कि घर का बंटवारा कर दिया जाय। आंगन में एक दीवार बना दी जाए। पशु तथा अनाज, दोनों भाइयों में आपस में बराबर-बराबर बांट दिए जाएं। पंचों का फ़ैसला था-‘रमन तथा चमन, दोनों को एक-दूसरे के काम में हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं है। दोनों भाइयों के माता-पिता स्वेच्छा से जिसके पास रहना चाहें, रह सकते हैं।’ रात ही में कंदील की रोशनी में दीवार बनाने का काम शुरू कर दिया गया। पांढर मिट्टी की तीन फीट चौड़ी तथा बारह फीट ऊंची दीवार बना दी गई थी। सुबह होने तक घर के दो भाग हो चुके थे।

दोनों भाई अलग हो चुके थे और उनके क्रियाकलाप भी। जिस दिन रमन खेत पर जाता, उस दिन चमन पशु चराने। यदि चमन नदी पर होता तो रमन कुएं पर। चौपाल में भी दोनों भाई कभी साथ दिखाई नहीं देते। इस बीच दोनों के कपड़ों के रंग भी एक-दूसरे के विपरीत हो गए थे। खेलते समय यदि रमन के बच्चों की गेंद चमन के आंगन में आ जाती तो गोल से चौकोर होकर ही वापस लौटती। चमन के आंगन से उड़ी पतंग रमन के आंगन में आती तो काग़ज़ की पुड़िया बन जाती। कौआ भी यदि रमन के घर से रोटी लेकर चमन के आंगन में खाने लगता तो कंकर मारकर उड़ा दिया जाता। यही हाल चमन के घर से रोटी लेकर रमन के आंगन में खाने पर होता। समय यूं ही बीतता गया। एक उमसभरी शाम की बात है। रमन पशु चराकर तथा चमन खेत से लौट रहे थे। तभी उन्हें अपने घरों से लोगों के चिल्लाने की आवाज़ें सुनाई दीं। किसी अनहोनी की आशंका से वे तेज़ी से अपने घर की ओर पैर बढ़ाने लगे। दोनों जब अपने-अपने घर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि गांव वालों की भीड़ उनके आंगन में थी। पूछने पर पता चला कि एक छः फीट लम्बा नाग आंगन के बीच की दीवार में जाकर बैठ गया है। ‘दीवार तोड़कर सांप को बाहर निकालना होगा’- गांव वालों ने कहा। लेकिन रमन और चमन दीवार तोड़ने देने को राज़ी नहीं हो रहे थे। सरपंच ने उन्हें समझाया-‘असली नाग है, ऊपर से घायल भी। मंगत तेली ने लाठी मारी थी। घायल सांप तो बदला लेगा मंगत तेली से। मंगत के बच्चे अभी छोटे हैं, ऐसे में मंगत को कुछ हो गया तो? सांप को पकड़ना ही होगा, मंगत तेली के बच्चों के हित में। दीवार तोड़नी पड़े तो तोड़ेंगे, बाद में पंचायत के ख़र्च से बनवा भी देंगे।’ अंधेरा घिरने लगा था। कंदील की रोशनी में बनी दीवार, कंदील की रोशनी में ही तोड़ी जाने लगी। जैसे ही दीवार का कोई हिस्सा गिरता, धूल का गुबार उठता और कुछ देर तक हवा में उड़ती धूल के कारण किसी को कुछ दिखाई नहीं देता। सांप दीवार के किस हिस्से में बैठा है - ये किसी को भी नहीं पता था। पांढर मिट्टी से बनी दीवार में जगह-जगह दरारें पड़ गई थीं। जैसे ही दीवार का एक हिस्सा गिराया जाता, सांप बड़ी फुर्ती से दीवार के दूसरे हिस्से की दरार में जा बैठता। रामसिंग गेती से दीवार तोड़ रहा था और वसंत फावड़े से मिट्टी हटा रहा था। गांव के अन्य लोग एक हाथ में लाठी और दूसरे हाथ में कंदील लिए सांप के बाहर आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। सरपंच बड़ी बेचैनी से इधर-उधर टहलते और कभी रमन-चमन के पिता के पास खटिया पर जाकर बैठ जाते। सांप के फुफकारने की आवाज़ सबको सुनाई दे रही थी, जैसे चेतावनी दे रहा हो। मंगत तेली का डर के मारे बुरा हाल था। वो मन-ही-मन सारे देवताओं का नाम जप रहा था। सरपंच बार-बार हिदायत दे रहे थे- ‘ध्यान रखना सांप किसी भी समय बाहर आ सकता है। जैसे ही दिखाई दे, उसकी फन को लाठी से दबाना, भागने नहीं देना। फिर बोरी में पकड़ लेना।’ महिलाएं और बच्चे बहुत डरे हुए थे। बुज़ुर्ग महिलाएं सांप से जुड़े अपने अनुभव और किस्से आपस में सुना रही थीं- ‘फलाने को खेत में सांप ने काट लिया था, मुंह से झाग आया और तुरंत मर गया।’ उनकी बातें सुनकर बच्चे और अधिक डर रहे थे। थोड़ी-थोड़ी करके लगभग पूरी दीवार ही मिट्टी का ढेर हो चुकी थी। दीवार का अंतिम हिस्सा तोड़ना बाकी था। सबको पूरा यक़ीन था कि ये हिस्सा तोड़ते ही सांप बाहर आ जाएगा और फिर भागने का प्रयास करेगा। सभी सावधान हो गए। रामसिंग बड़ी सतर्कता से दीवार का अंतिम हिस्सा तोड़ने लगा था। गांव वालों ने लाठियां मज़बूती से पकड़ ली थीं।

‘एक आदमी सांप को लाठी से दबाकर रखना ताकि वो भाग न सके और बाकी लोग उसे घेर लेना फिर दो लोग बोरी में पकड़ना’-सरपंच ने रणनीति बनाई। दीवार का अंतिम हिस्सा तोड़ते ही सांप दिखाई दिया। वो जान बचाकर कभी रमन के आंगन में भागता तो कभी चमन के। सांप को लाठी से दबाकर रखने का प्रयास विफल हो गया था। सांप ज़ोर से फुफकारता और सभी पीछे हट जाते। आंगन में भागमभाग मची थी। अफरा-तफरी में सांप दोनों की पत्नियों की ओर लपका। सांप को अपनी ओर आता देख उनके प्राण हलक में आ गए थे। वो डर के मारे आंगन के कोने में दुबक गईं। मौत का ख़ौफ, दोनों की आंखों में साफ़ दिखाई दे रहा था। सांप उन दोनों की ओर तेज़ी से बढ़ रहा था। तभी सरपंच ने लकड़ी का पटिया अड़ाकर उसे रोका और बेहद फुर्ती से दो लोगों ने उसे बोरे में पकड़ लिया। रमन और चमन की पत्नियां अपनी मौत को पकड़े जाते देख रही थीं।

आंगन के बीच की दीवार धराशायी हो चुकी थी। कोने में रमन और चमन की पत्नियां मौत के डर से, एक-दूसरे से लिपटी हुई थीं। इस भागमभाग में दोनों भाइयों ने कब एक-दूसरे का हाथ कसकर थाम लिया, ये उन्हें भी पता न चला। दोनों भाइयों के कपड़े व चेहरे पांढर मिट्टी से सने थे। दोनों फिर से एक रंग में दिखाई दे रहे थें। सरपंच ने कहा-‘सुबह ये दीवार फिर से बनवा दी जाएगी। ‘नहीं,अब हम ये दीवार दुबारा नहीं बनने देंगे’ - चार आवाज़ें एक साथ गूंजीं।

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