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दो कहानियां:एक बेटी का मायके से रिश्ता और ग़रीब की दुआओं के असर से रूबरू करातीं दो भावुक कहानियां

मीता एस. ठाकुर, नम्रता सरन ‘सोना’17 दिन पहले
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मायके की मिठाई

पीहर केवल बेटी का होता है। बेटे का भले वो ‘घर’ कहलाए, लेकिन मायके से जुड़ाव केवल बेटी के हिस्से में आता है, क्योंकि मायका होता ही बेटी का है। पीहर की कशिश बयां करती एक भावुक कहानी है, जो दरअसल हर बेटी की अनुभव है।

मायका शब्द कितना छोटा है, जाने किसने इजाद किया है। शब्द छोटा ज़रूर है लेकिन इसके मायने बहुत बड़े हैं। वास्तव में एक लड़की स्वयं भी ‘मायके’ के मायने तब तक नहीं जान पाती जब तक उसका विवाह नहीं हो जाता यानी कि जब तक वो ‘पराई’ नहीं हो जाती, और पराई होने की यह पीर ही उसे कभी मां-बाप से पराया होने नहीं देती।

मायका तो लड़की के दिल का एक टुकड़ा होता है जो कभी उससे अलग नहीं हो सकता। पीहर का द्वार ,पीहर की हवा, पीहर की ख़ुशबू उसके अस्तित्व का एक हिस्सा होती है। वह आंगन, जहां खेली-कूदी और बड़ी हुई, वह आंगन जहां से वह विदा हुई, उस आंगन में उसकी आत्मा बसती है। पिता की लाडली और मां की सहेली, भाई की दोस्त और छोटी बहन की मां, कितने रिश्ते होते हैं मायके के।

मैं भी जब चाहूं, अपने मायके फोन पर बातें कर सकती हूं, पर सच कहूं जो आनंद उनकी चिट्ठियों में आता था वह फोन पर नहीं आता। आज भी मां-पापा की लिखी चिट्ठियां मेरे पास मौजूद हैं। जब उनकी बहुत याद आती है तो उनकी चिट्ठियां पढ़ती हूं, उस अंतर्देशी में मानो उनका चेहरा उतर आता है, हर शब्द और वाक्य के साथ चेहरे के बदलते भाव मुझे दिखाई देते हैं, चिट्ठियां जैसे जिं़दा हो जाती हैं, और चिट्ठियों की ख़ुशबू से मेरा मन तरबतर हो जाता है। आज स्कूल से लौटी तो शरीर टूट रहा था। ठंड में तो यह शहर अलास्का बना हुआ है, बस बर्फ़ गिरने की कमी है, इतनी गलन है कि हाथ को हाथ महसूस नहीं हो रहा है।

घर के भीतर आकर पता चला कि कोई पार्सल आया है इंडियन पोस्टल से, मैं अंदाज़ा नहीं लगा पाई कि कहां से आया होगा। बहुत थकी थी इसलिए सीधे आराम करने चली गई। शाम को जब नींद खुली तो जाने क्यों मां-पापा की यादों ने मुझे घेर लिया, मुझे लगा कि बिन बादल बरसात कैसे हो रही है। इस ठंड ने निकम्मा बना दिया था काम की गति धीमी हो गई थी और ठंड तेज़। किसी तरह काम खत्म हुआ तो देखा 10:00 बज रहे हैं। मन में कहा, ‘चलो भाई, अगले दिन की तैयारी करें और सोने चलें।’ खाना खाने का आज कोई मूड नहीं था। गीत सुनने का बहुत शौक है, तो सोचा कुछ पुराने गीत सुने जाएं फिर चलते हैं। मैं हीटर के पास चेयर पर पैर जमा कर बैठ गई और हवा में गूंजती स्वर लहरी के साथ मन पीहर की तरफ़ उड़ चला।

‘माई री मैं कासे कहूं पीर अपने जिया की, माई री।’ कोई दुख नहीं है मुझे। सब तो बढ़िया है। पति, बच्चा, मेरा अपना संसार फिर क्यों मन कलपता है, क्यों याद आती है मां-पापा की। अपनी सोच के सागर में डूबी हुई थी तभी मेरी नाक ने एक जानी पहचानी ख़ुशबू को महसूस किया। यह तो बेसन के लड्डू की ख़ुशबू है और तिल के भी लड्डू हैं। मन में एक लहर-सी उठी और मैं समझ गई की वह पार्सल जो दोपहर में आया था उसमें क्या था और वह कहां से आया था।

फिर क्या था किसी चपल बालिका की तरह मैंने उस पार्सल को बिना एक पल भी गवांए खोला, तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना नही रहा। गत्ते के डिब्बे के अंदर प्लास्टिक के 4 डब्बे थे, उन डब्बों में सलोनी, खुरमी, बेसन के लड्डू और तिल के लड्डू भरे हुए थे।

मेरा मन अंदर तक भीग गया, पिछले दो सालों से मां-पापा से नहीं मिल पाई, एक साल व्यस्तता में कट गया और दूसरा ये कोरोना ले उड़ा।

मेरी आंखें भर-भर आ रही थीं, भरी आंखों से मैंने एक लड्डू को जैसे ही मुंह में रखा तो ऐसा लगा मानो, मां ने मुझे अपने अंग में समेट लिया हो। सलोनी का टुकड़ा मुंह में रखा तो ऐसा लगा जैसे कि मानो पापा के गले लग गई हूं। क्या कोई मानेगा कि मैं रोते हुए मिठाइयां खा रही थी। मन जाने कितनी यादों से घिर गया। वह सारे पल याद आ गए जब घर में मिठाइयां बनती थीं, होली, दीपावली, राखी। मम्मी पकवान और मिठाइयां बनाकर राशन की अलमारी में रख ताला लगा दिया करती थीं। हम भाई-बहन चोरी-चुपके खुरमी, सलोनी, गुझिया और कुकीज़ पर हाथ साफ़ किया करते थे। मम्मी सब जानती थीं लेकिन फिर भी अनजान बनी रहतीं थीं। हमारे बचपन की जाने कितनी यादें और कहानियां इन मिठाइयों के इर्द-गिर्द बुनी हुई हैं। देर रात तक जब मम्मी मिठाइयां बनातीं, तो हम भाई-बहन कभी मदद करते तो कभी कुछ पाने की मंशा से आस-पास बने रहते। नमकीन बनाने का काम पापा के सिर पर होता था, क्योंकि वह नमकीन बनाने में एक्सपर्ट थे और पापा को मनाकर नमकीन हासिल करना मेरे लिए कोई बड़ा काम नहीं होता था। मेरे भाई-बहन अक्सर मुझे चिढ़ाते थे कि तुम पापा की चम्मच हो, चमचागिरी करती हो, मैं उनकी बात सुन कर इतराती।

आज घर से आई मिठाइयों ने मुझे फिर अपने बचपन की ओर धकेल दिया। इन मिठाइयों ने न केवल मेरी जिह्वा पर, बल्कि मेरे मन में मिठास घोल दी थी। अभी तक तो मैं खाना भी नहीं खा रही थी और जाने कैसे मुझे इतनी भूख लग आई। भावुक होकर मैंने घर फोन लगाया पर यह सोच कर कि सब सो गए होंगे, बेल जाते ही मैंने फोन काट दिया।

दूसरे ही मिनट प्रत्युत्तर में फोन की घंटी बजी। मम्मी का फोन था। मैंने जैसे ही फोन उठाया तो उधर से पहला वाक्य था ‘क्यों मिठाई खा रही हो ना, मैं समझ गई थी तुम ही होगी।’

फिर आगे मम्मी जाने क्या-क्या कहती रहीं ‘कैसी हो ,सब कैसा चल रहा है, घर में पति और बच्चे कैसे हैं’ पर मैं तो जैसे किसी और दुनिया में थी। मैं अपने मायके के आंगन में ही खड़ी थी बाहें पसारे, मां के अंग में समा जाना चाहती थी, आंखों से आंसू गिर रहे थे और मन तृप्त था।

बात केवल मिठाई की नहीं थी, मन के तारों की थी जो मायके के साथ जुड़े हुए थे, मां और पापा के साथ जुड़े हुए थे। और मेरे मन के तार झंकृत हो चुके थे। ये ज़ायके से तृप्त मन मायके की बदौलत संभव है।

दवा के पैसे देकर दुआ ली अनिल और निशा ने। पेंटर दादा की मजबूरी को उन्होंने समझा और उनके हालात की ख़बर विधाता ने ली।

‘हालात पता नहीं कब सुधरेंगे, कोर्ट पिछले एक साल से बंद पड़े हैं, अकाउंट भी ख़ाली हो चला है। आधिकारिक आंकड़े तो पता नहीं पर सुना है कि कोरोना काल में तकरीबन 150 वकीलों ने या तो आत्महत्या कर ली या मानसिक दबाव के चलते हार्टअटैक या ब्रेन हेमरेज की वजह से मौत के मुँंह में चले गए। आज तो मेरे पर्स में भी सिर्फ़ दो सौ रुपए बचे हंै। क्लाइंट भी आते नहीं कि वकील साब फीस मांगेंगे। अभी सभी परेशान हैं। अब तो ईश्वर का ही सहारा है’ अनिल ने एक लंबी सांस भरते हुए कहा।

‘जिन्हें आपने उधार पैसे दे रखे हैं, उनसे बोलिए कि वे पैसे वापिस करें, और वो पेंटर दादा, जो इस पूरे कोरोना काल मंे सौ-दो सौ मांगकर कम से कम चार हज़ार ले चुके हैं, उन्हें कहिए कि जल्दी पैसे लौटाएं, घर में राशन भी ख़त्म होने को है’ निशा कुछ झुंझलाती हुई बोली।

‘निशा, पेंटर दादा को मैंने उधार नहीं दिए हैं, वो बेचारे कहां से लाएंगे, उनका कहीं काम भी तो नहीं लग रहा, मैंने उनसे कहा नहीं, पर ये पैसे मैं उनसे वापिस नहीं लूंगा’ अनिल ने कहा। ‘बाबूजी....’अचानक दरवाज़े पर पेंटर दादा की आवाज़ से दोनों चौंके। ‘हां दादा, बोलो...’ अनिल ने पूछा। ‘बाबूजी, अगर सौ रुपए मिल जाते तो बहुत मेहरबानी होगी, तबीयत ख़राब है, इंजेक्शन लगवाना है। बाबूजी आप सब पैसे लिखते जाइए, काम लगते ही मैं सब चुका दूंगा, अभी बहुत ज़रूरत है, सौ रुपए दे दीजिए’ पेंटर दादा हाथ जोड़कर बोले। बहुत बीमार दिख रहे थे। ‘क्या करूं, बटुए में सिर्फ़ दो सौ हैं’ पसोपेश में निशा की तरफ़ देखते हुए अनिल ने धीरे से कहा। ‘दे दीजिए, जो होगा सो देखेंगे’ निशा ने जैसे उसके मनचाही बात कह दी। ‘ये लो दादा, पर इंजेक्शन ज़रूर लगवा लेना’ अनिल ने पैसे देते हुए कहा। ‘जी बाबूजी, भगवान आपकी सब मुराद पूरी करे’ आशीष देता हुआ दादा चला गया। ‘ट्रिंग ट्रिंग...’ मोबाइल बजा। ‘हेलो...’ ‘नमस्ते, वकील साब, रामेसर बोल रहा हूं, रमनगाम से, भोपाल आ रहा हूं, आपके लिए एक बोरा गेहूं और एक कट्टी चावल ला रहा हूं, आपकी फीस भी दे जाऊंगा, फसल के पैसे आ गए हैं, सोचा आप भी तकलीफ़ में होंगे, सो आज आ रहा हंू। भाभीजी के लिए सूखी चने की और मेथी की भाजी भी लाऊंगा, जै राम जी की।’ ‘देखा निशा, दुआओं का असर।’

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