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काहिरा के तहरीर चौक पर जुटे थे लोग:अरब स्प्रिंग का एक दशक, पर मध्यपूर्व में अब भी तानाशाही

8 दिन पहले
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  • 2011 में हुआ प्रसिद्ध अरब आंदोलन असफल रहा, लेकिन इस क्षेत्र में लोकतंत्र की भूख पैदा हुई

एक दशक पहले मिस्र की राजधानी काहिरा के तहरीर चौक पर हजारों लोगों की भीड़ जुटी थी। अमेरिका समर्थित राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को गद्दी से हटाने के लिए लोग सड़कों पर उतर आए थे। मिस्र पर पूरी दुनिया की निगाहें थीं। वॉशिंगटन में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को भी होस्नी मुबारक को सत्ता छोड़ने के लिए कहना पड़ा था। इस आंदोलन के दस साल बाद भी उस टकराव की सुलगती चिंगारियां मौजूद हैं। आंदोलन के दौरान पूरे क्षेत्र में लोकतंत्र की जगी उम्मीद को पूरी तरह कुचल दिया गया था। आंदोलन के बाद से अमेरिका मध्य-पूर्व में कमजोर हुआ और ईरान, रूस, तुर्की, सऊदी अरब ज्यादा ताकतवर हुए। हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि मिस्र आंदोलन के बाद से पूरे क्षेत्र में स्वतंत्रता और लोकतंत्र के एक नए युग की उम्मीद बढ़ी है। 2013 में सेना द्वारा सत्ता हथियाने से पहले जनता की चुनी हुई सरकार महज एक साल सत्ता में रही। उस सरकार में मंत्री रहे अम्र डराग के मुताबिक उस आंदोलन की सबसे अच्छी बात यह रही कि लोगों को अब पता चल चुका है कि उनकी कोई मदद नहीं कर सकता। उन्हें अपनी मदद खुद ही करनी होगी। जिन देशों की ओर लोग समाधान के लिए देखते थे, वे असल में खुद समस्या का कारण हैं। इस क्षेत्र मेंं बदलाव के खिलाफ खड़ी कई ताकतों के हित एक से हैं, इसलिए किसी भी सकारात्मक बदलाव के खिलाफ ये लोग मिलकर खड़े हो जाते हैं। होम्स में रहने वाली सीरियाई लेखक मोहम्मद सालेह के अनुसार अरब स्प्रिंग के बाद मध्य-पूर्व के हालात बद से बदतर हो गए हंै। बस एक ही बदलाव आया है कि अब सीरिया पर नियंत्रण के लिए विदेशी सेनाओं की मौजूदगी ज्यादा है। सीरिया पहले से ज्यादा बंट गया है। उस आंदोलन से जुड़े रहे लोगों का मानना है कि आंदोलन असफल होने के कई कारण रहे। उनके मुताबिक पश्चिम से मिलने वाला समर्थन टुकड़ों-टुकड़ों में था, दूसरी ताकतों का हस्तक्षेप ज्यादा था। लोग अमेरिका को भी पर्याप्त मदद नहीं करने के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। लीबिया में लोगों को तकनीकी समर्थन देने वाले बशर इलताल्ही के मुताबिक उस समय हम लोग परिपक्व नहीं थे, हमें ना संघर्ष का पता था, ना ही लोकतंत्र को अच्छी तरह जानते थे। इसलिए असफलता हाथ लगी।

बेन हबार्ड और डेविड डी किर्कपेट्रिक
© The New York Times

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