अमेरिका में झूठी खबरों से बचने का नया तरीका:3.5 लाख शिक्षकों के ग्रुप छात्रों को फेक न्यूज से बचने के तरीके सिखाते हैं; मुफ्त कोर्स शुरू

13 दिन पहले
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अमेरिका के कोलोराडो में छात्रों को झूठी खबरों से सावधान करने वाली महिला शिक्षकों का एक ग्रुप। - Dainik Bhaskar
अमेरिका के कोलोराडो में छात्रों को झूठी खबरों से सावधान करने वाली महिला शिक्षकों का एक ग्रुप।
  • अधिकतर स्कूली छात्र झूठे और भ्रामक प्रचार को समझ नहीं पाते हैं

कोलोराडो स्प्रिंग्स, कोलोराडो में पामेर हाईस्कूल में इतिहास की क्लास में अमेरिकी क्रांति और संसद के कामकाज की शिक्षा के बीच छात्रों को गलत सूचनाओं से बचाने के तरीके भी पढ़ाए जा रहे हैं। वोटिंग की आयु के नजदीक पहुंच रहे छात्रों को बताया जाता है कि वे फर्जी खबरों, एकतरफा जानकारी और राय को कैसे पहचानें।

शिक्षा सत्र की शुरुआत में दो सप्ताह तक ऐसे सेशन होते हैं। वे दस्तावेज के मूल स्थान का पता लगाने के गुर सीखते हैं। टिकटॉक सेलेब्रिटी और यूट्यूब वीडियो के दावों पर पैनी नजर रखने की ट्रेनिंग लेते हैं। केवल बच्चे और टीनएजर ही झूठी जानकारी से प्रभावित नहीं होते हैं। कई अध्ययनों ने बताया है कि बुजुर्गों को फेक न्यूज पहचानने में अधिक मुश्किल होती है। चूंकि युवा ऑनलाइन अधिक समय बिताते हैं इसलिए शिक्षक उन्हें बचाने की कोशिश में लगे हैं। छात्रों को समझाया जाता है कि वायरल होने से जानकारी को वैधता नहीं मिलती है, कंटेंट नकली बनाया जा सकता है और .org डोमेन वेबसाइट को विश्वसनीय नहीं बनाता है।

ऑनलाइन झूठी सूचनाओं में उफान से चिंतित मैथ्स, सोशल स्टडीज और अन्य विषयों के तीन लाख 50 हजार शिक्षकों के प्रतिनिधि शैक्षणिक समूहों ने एक गठजोड़ बनाया है। मुहिम की शुरुआत करने वाले एक ग्रुप- नेशनल मीडिया लिटरेसी एजुकेशन एसोसिएशन ने बताया, पिछले पांच वर्षों में उसके सदस्यों की संख्या दोगुनी हो चुकी है। बच्चों को फर्जी खबरों से आगाह करने के लिए कई प्रोजेक्ट चल रहे हैं। टि्वटर और गूगल ने यूजरों को गलत जानकारी देने के आम तरीकों की चेतावनी देना शुरू किया है। छात्रों के लिए मुफ्त कोर्स चलाए गए हैं।

स्वयंसेवी संगठन न्यूज लिटरेसी प्रोजेक्ट का कहना है कि 2018 से 2022 के बीच उसके मुफ्त चेकोलॉजी कोर्स का इस्तेमाल करने वाले छात्रों की संख्या 248% बढ़ी है। उसने अभी हाल में शिक्षकों को चुनावों के संबंध में झूठे और भ्रामक चुनाव प्रचार की जानकारी देने के लिए वीडियो प्लेटफार्म फ्लिप पेश किया है। छात्र ऑनलाइन जानकारियों के संबंध में अपने माता-पिता से चर्चा करने में हिचकते हैं। शिक्षाविद ग्रेसी गिलीगन ने इस वर्ष छोटे शहर मेरीलैंड में एक स्टडी की थी। उन्होंेने पाया कि उनके स्कूल डिस्ट्रिक्ट के 47% छात्र मीडिया स्रोतों की विश्वसनीयता के संबंध में अपने माता-पिता से बहुत कम बात करते हैं।

आधे से ज्यादा युवाओं ने सही समझकर झूठी खबर शेयर की

पिछले साल प्रकाशित एक स्टडी में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने 3446 हाईस्कूल छात्रों से कई किस्म के कंटेंट का मूल्यांकन करने के लिए कहा । लेकिन, वे ऐसा नहीं कर सके। उदाहरण के लिए एक वेबसाइट ने क्लाइमेंट साइंस के बारे में तथ्य बताने का दावा किया लेकिन वह जीवाश्म ईंधन इंडस्ट्री तक सीमित रही। उसने 97% छात्रों को झांसा दिया।

स्टडी में सुझाव दिया गया है कि बच्चों को मूल वेबसाइ़ट से अलग हटकर तथ्य हासिल करना पढ़ाया जाए। एक ग्लोबल स्टडी से पता लगा है कि आधे से अधिक युवाओं ने गलत जानकारी को सही समझकर शेयर किया। जबकि 33 प्रतिशत ने आवेग में आकर ऐसा किया। पोलीमर मीडिया इंस्टीट्यूट की रिसर्च के अनुसार कई लोगों ने कहा कि वे व्यस्त होने की वजह से सूचना की पुष्टि नहीं कर पाए।

टिफैनी स्यू
© The New York Times

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