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नरिंदर सिंह कपानी को नोबेल देने की मांग:फाइबर ऑप्टिक्स के जनक, कपानी की मृत्यु के बाद फिर एक बार सामने आया दावा

9 दिन पहले
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  • उनके कारण ऑप्टिकल रिसर्च को सरकारों और कंपनियों ने महत्व दिया। मृत्यु के बाद उनकी उपलब्धियों को मान्यता देने का अभियान शुरू हुआ

1940 के दशक में नरिंदर सिंह कपानी देहरादून में जब हाईस्कूल में पढ़ रहे थे तब उनके साइंस शिक्षक ने बताया कि प्रकाश केवल सीधी रेखाओं में आगे बढ़ता है। हालांकि, बॉक्स कैमरा के साथ वर्षों बिताने के बाद उनकी समझ में आ गया था कि प्रकाश को लैंस और प्रिज्म के जरिये विभिन्न दिशाओं में भेजा जा सकता है। 1952 में इंपीरियल कॉलेज लंदन में दाखिला लेने के बाद उन्हें अहसास हुआ कि एेसा सोचने वाले वेे अकेले नहीं हैं। यूरोप में कई वर्षों से शोधकर्ता रोशनी को लचीले ग्लास फाइबर के माध्यम से भेजने के तरीकों का अध्ययन कर रहे थे। डॉ. कपानी ने साइंटिस्ट हेरॉल्ड हॉपकिंस के साथ मिलकर इस विषय पर रिसर्च आगे बढ़ाई। 1954 में दोनों ने नेचर पत्रिका में अपनी खोज का एलान किया। उन्होंने बताया कि किस तरह हजारों बेहद पतले ग्लास फाइबर को एक सिरे से दूसरे सिरे तक जोड़ा जा सकता हैैै।

डॉ. कपानी, हॉपकिंस और एक अन्य शोधकर्ता के रिसर्च पेपर के आधार पर फाइबर ऑप्टिक्स का जन्म हुआ है। संचार की इस टेक्नोलॉजी के माध्यम से दुनियाभर में हर दिन फोन कॉल, टेलीविजन शो और अन्य काम होते हैं। आने वाले वर्षों मेंं पत्रकारों ने डॉ. कपानी को फाइबर ऑप्टिक्स के जनक की उपाधि दे दी। कई लोगों ने तो यहां तक दावा किया कि फाइबर ऑप्टिक्स की खोज के लिए 2009 का नोबेल पुरस्कार चार्ल्स काव की बजाय उन्हें दिया जाना था। 3 दिसंबर को रेडवुड सिटी, कैलिफोर्निया में 94 साल की आयु में डॉ.कपानी की मृत्यु के बाद यह दावा एक बार फिर सामने आया है।

56 रिसर्च पेपर लिखे

डॉ. काव की बजाय डा. कपानी को नोबेल पुरस्कार दिए जाने के दावे पर बहस हो सकती है लेकिन फाइबर ऑप्टिक्स के क्षेत्र में उन्होंने असाधारण काम किया है। विज्ञान पत्रकार जेफ हेक्ट ने एक इंटरव्यू में कहा था, उन्होंने ऐसी टेक्नोलॉजी को आगे बढ़ाया है जिसे लंबे समय तक सच की बजाय साइंस फिक्शन माना जाता था। हेक्ट ने फाइबर ऑप्टिक्स के इतिहास पर अपनी किताब-सिटी ऑफ लाइट में लिखा है, डॉ. कपानी ने 1955 से 1966 के बीच फाइबर ऑप्टिक्स पर 56 शोधपत्र लिखे। उन्होंने इस विषय पर किताब भी लिखी थी।

पंजाब के मोगा में जन्मे डॉ. कपानी ने आगरा यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया। इसके बाद वे इंग्लैंड चले गए। वहां उन्होंने, ऑप्टिक्स टेक्नोलॉजी में दुनियाभर में नाम कमा चुके डॉ. हॉपकिंस के साथ काम शुरू किया। हालांकि, नेचर में शोधपत्र प्रकाशित होने के बाद दोनों अलग हो गए। प्रोफेसर हॉपकिंस ने डॉ.कपानी पर अपना योगदान बढ़ा-चढ़ाकर बताने का आरोप लगाया था। 1960 में वे अपने परिवार के साथ कैलिफोर्निया आ गए। डॉ. कपानी ने पालो आल्टो में अपनी कंपनी ऑप्टिक्स टेक्नोलॉजी की शुरुआत की। 1967 में कंपनी शेयरबाजार में आई लेकिन वह घाटे के कारण बंद हो गई। उन्होंने,1973 में नई कंपनी केपट्रॉन और 1999 में के2 ऑप्ट्रोनिक्स खोली। उन्होंने, कैलिफोनिया यूनिवर्सिटी, सांताक्रुज में 1977 से 1983 तक पढ़ाया।

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